भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

२५२ | कंब रामायण

सूर्य जब इस स्वर्णमय उन्नत पर्वत पर पहुँचता है, तब यह पर्वत ऐसा लगता है, जैसे यह स्वर्ण-मुकुट धारण कर रहा हो ।

नारियो के तिलक-समान हे सुन्दरी ! बाँसो से बिखरे हुए मुक्ता-माणिक्यमय शिलाओ पर इस प्रकार पडे हैं, जिस प्रकार लालिमा से युक्त आकाश पर तारे चमक रहे हो।

सूक्ष्म रंध्रों से युक्त बाँसुरी की ध्वनि और शीतल तथा मधुर स्वरवाली वीणा की ध्वनि से भी अधिक मधुर वचनो से युक्त, हे शुक-समान सुन्दरी ! सर्वत्र लाल पुष्पो से भरे हुए पलाश-वृक्षो का वन ऐसा लगता है, जैसे (सारा वन) अग्नि की ज्वाला मे जल रहा हो।

'कांदल' पुष्प को ककण पहनाया गया हो, यो अति सुन्दर करो से शोभायमान हे सुन्दरी ! बडे हाथियो के बच्चे अपूर्व तपस्या से सम्पन्न ऋषियो के लिए अपनी सूँडो मे दूर-दूर के निर्झरो से पानी भरकर लाते हैं और उन ऋषियो के कमंडलुओं में भर देते हैं।

आम की फाँक-जैसे सुन्दर नयनोवाली कलापी-तुल्य हे सुन्दरी ! लम्बी तथा झुकी हुई पूँछवाले तथा द्रवित चित्तवाले वानर, वार्द्धक्य से पीडित तथा मन्द दृष्टिवाले व्याकुल मुनियो को जाने का मार्ग दिखाकर उनकी सेवा करते हैं। अहो !

साँप के फन एवं रथ का उपहास करनेवाले विशाल जघन से युक्त, हे सुन्दरी ! देखो, बडे पखोवाले मयूर यज्ञोपवीत से शोभायमान वक्षवाले ब्राह्मणो के होम-कुंडों की अग्नि को अपने दीर्घ पखो से प्रज्वलित कर रहे हैं।

दीर्घ केशो से शोभायमान सुन्दर मयूर-तुल्य स्त्री-कुल का भूषण, हे देवी ! आम्र-वृक्षो पर फलो को खानेवाले वानर, लोकहित में निरत वेदज्ञ ब्राह्मणो के वक्ष पर धारण किये जानेवाले यज्ञोपवीत के लिए रेशम के कीड़ो के घोसलो एवं कपास के पौधो से आवश्यक रेशे ला देते हैं।

नारियो की सृष्टि के लिए आदर्श बनी हुई, हे लक्ष्मी-तुल्य सुन्दरी ! वानर, आम्र, पनस और कदली-वृक्षो से बड़े-बड़े पके हुए अति मधुर फल चुन-चुनकर (मुनियो को) ला देते हैं और जंगली सअर कदो को उखाड़कर ला देते हैं।

तुम्हारे कर मे रखने योग्य, लाल मुखवाले तोते, पर्वत के 'तिनै' धान्य, ज्वार, सेम आदि की बीजो एव झुकनेवाले बाँस मे उत्पन्न होनेवाले चावल को, असत्यरहित ऋषियों के आश्रमो मे जाकर दे आते हैं।

बड़े-बड़े अजगर, जो चिघाड़नेवाले और दाँतो से युक्त बड़े हाथियो को भी निगलने की शक्ति रखते हैं, ज्ञानियो के समान इद्रिय-दमन करके यहाँ रहते हैं और जटा-धारी मुनियो के मार्ग मे सीढियाँ बनकर पड़े रहते है।

देखो, सूर्य के किरणो को ढकनेवाले अनेक स्वर्णमय विमान$^१$ यहाँ आते जाते रहते हैं, मानो वे (विमान) जल के सोतो से युक्त पर्वत पर अपूर्व तपस्या करनेवाले तथा (भगवान् के ध्यान मे) अपने दोनो नयनो से यो आनन्दाश्रु बहानेवाले, जैसे जल का घड़ा ही उडेल रहे हों, ऋषियों को मोक्ष-लोक मे ले जाने के लिए ही यहाँ आते हो।


१. ये विमान चित्रकूट पर्वत पर संचरण करनेवाले देवों के हैं, जो ऐसे लगते हैं, मानों मुनियो को मोक्ष-लोक में ले जाने के लिए आये हुए हों।