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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

२५२ | कंब रामायण

सूर्य जब इस स्वर्णमय उन्नत पर्वत पर पहुँचता है, तब यह पर्वत ऐसा लगता है, जैसे यह स्वर्ण-मुकुट धारण कर रहा हो ।

नारियो के तिलक-समान हे सुन्दरी ! बाँसो से बिखरे हुए मुक्ता-माणिक्यमय शिलाओ पर इस प्रकार पडे हैं, जिस प्रकार लालिमा से युक्त आकाश पर तारे चमक रहे हो।

सूक्ष्म रंध्रों से युक्त बाँसुरी की ध्वनि और शीतल तथा मधुर स्वरवाली वीणा की ध्वनि से भी अधिक मधुर वचनो से युक्त, हे शुक-समान सुन्दरी ! सर्वत्र लाल पुष्पो से भरे हुए पलाश-वृक्षो का वन ऐसा लगता है, जैसे (सारा वन) अग्नि की ज्वाला मे जल रहा हो।

'कांदल' पुष्प को ककण पहनाया गया हो, यो अति सुन्दर करो से शोभायमान हे सुन्दरी ! बडे हाथियो के बच्चे अपूर्व तपस्या से सम्पन्न ऋषियो के लिए अपनी सूँडो मे दूर-दूर के निर्झरो से पानी भरकर लाते हैं और उन ऋषियो के कमंडलुओं में भर देते हैं।

आम की फाँक-जैसे सुन्दर नयनोवाली कलापी-तुल्य हे सुन्दरी ! लम्बी तथा झुकी हुई पूँछवाले तथा द्रवित चित्तवाले वानर, वार्द्धक्य से पीडित तथा मन्द दृष्टिवाले व्याकुल मुनियो को जाने का मार्ग दिखाकर उनकी सेवा करते हैं। अहो !

साँप के फन एवं रथ का उपहास करनेवाले विशाल जघन से युक्त, हे सुन्दरी ! देखो, बडे पखोवाले मयूर यज्ञोपवीत से शोभायमान वक्षवाले ब्राह्मणो के होम-कुंडों की अग्नि को अपने दीर्घ पखो से प्रज्वलित कर रहे हैं।

दीर्घ केशो से शोभायमान सुन्दर मयूर-तुल्य स्त्री-कुल का भूषण, हे देवी ! आम्र-वृक्षो पर फलो को खानेवाले वानर, लोकहित में निरत वेदज्ञ ब्राह्मणो के वक्ष पर धारण किये जानेवाले यज्ञोपवीत के लिए रेशम के कीड़ो के घोसलो एवं कपास के पौधो से आवश्यक रेशे ला देते हैं।

नारियो की सृष्टि के लिए आदर्श बनी हुई, हे लक्ष्मी-तुल्य सुन्दरी ! वानर, आम्र, पनस और कदली-वृक्षो से बड़े-बड़े पके हुए अति मधुर फल चुन-चुनकर (मुनियो को) ला देते हैं और जंगली सअर कदो को उखाड़कर ला देते हैं।

तुम्हारे कर मे रखने योग्य, लाल मुखवाले तोते, पर्वत के 'तिनै' धान्य, ज्वार, सेम आदि की बीजो एव झुकनेवाले बाँस मे उत्पन्न होनेवाले चावल को, असत्यरहित ऋषियों के आश्रमो मे जाकर दे आते हैं।

बड़े-बड़े अजगर, जो चिघाड़नेवाले और दाँतो से युक्त बड़े हाथियो को भी निगलने की शक्ति रखते हैं, ज्ञानियो के समान इद्रिय-दमन करके यहाँ रहते हैं और जटा-धारी मुनियो के मार्ग मे सीढियाँ बनकर पड़े रहते है।

देखो, सूर्य के किरणो को ढकनेवाले अनेक स्वर्णमय विमान$^१$ यहाँ आते जाते रहते हैं, मानो वे (विमान) जल के सोतो से युक्त पर्वत पर अपूर्व तपस्या करनेवाले तथा (भगवान् के ध्यान मे) अपने दोनो नयनो से यो आनन्दाश्रु बहानेवाले, जैसे जल का घड़ा ही उडेल रहे हों, ऋषियों को मोक्ष-लोक मे ले जाने के लिए ही यहाँ आते हो।


१. ये विमान चित्रकूट पर्वत पर संचरण करनेवाले देवों के हैं, जो ऐसे लगते हैं, मानों मुनियो को मोक्ष-लोक में ले जाने के लिए आये हुए हों।

अयोध्याकाण्ड २५३

अग्नि मे तप्त, तैल से अर्चित अति तीक्ष्ण बरछे-जैसे अंजनाच्चित एव यम को भी व्याकुल करनेवाले नयनो से शोभायमान, हे सुन्दरी ! देखो, ( बच्चे देने की ) पीडा से युक्त हथिनियो को हाथी अपनी सूँड़ो का सहारा दे रहे हैं।

विष-स्वभाववाले नयनो से युक्त हे देवी ! तुम्हारी कटि को देखकर उसे बिजली समझकर, फनवाले सर्प डर जाते हैं और तड़पकर बिल में घुस जाते हैं । मदपूर्ण घटवाले हाथी, मेघ-गर्जन को सुनकर सिंह-गर्जन समझकर डर जाते हैं और अस्त-व्यस्त हो भागने लगते हैं।

गृहस्थी में रहकर ही सप्त व्रतों का पालन करनेवाले चक्रवर्ती के पुत्र ( राम ) ने, आभरणो से भूषित (सीता) देवी को इस प्रकार के अनेक दृश्य, उनका वर्णन करके दिखाये। फिर, उनका स्वागत करने के लिए सम्मुख आये हुए मुनियो को नमस्कार करके उन पाप-रहित मुनियो के अतिथि बने।

महिमामय सुन्दर तुलसी-मालाधारी भगवान् ( विष्णु ) ने वैर से युक्त अंधकार-सदृश राक्षस-कुल के विनाश की कामना करके कालनेमि¹ नामक राक्षस पर ही अपना चक्र चलाया है, इस प्रकार ( का दृश्य उपस्थित करते हुए ) सूर्य अस्ताचल पर जा पहुँचा।

जब विष्णु का चक्र असुर ( कालनेमि ) के शरीर मे जाकर लगा था, तब उसके शरीर से निकले हुए अत्यधिक रक्त प्रवाह के समान ही आकाश में सर्वत्र लाली फैल गई और उस राक्षस के मुँह से गिरे हुए वक्र दंत के समान ही चंद्रकला प्रकाशमान हो गई।

सूर्य के अस्त होने पर, कमलपुष्प, स्त्रियो को वदन की शोभा प्रदान करके मुकुलित हो गये। आकाश-रूपी जलाशय में सर्वत्र श्वेतवर्ण कुमुद-रूपी नक्षत्र चमक उठे।

उस समय वानर और वानरियाँ वृक्षो की ओर बढे, हाथी और हथिनियाँ जलाशयों की ओर बढे, सुन्दर पक्षी घोंसलो की ओर बढे और तत्त्वज्ञान से संपन्न प्रभु (राम) मध्याकालीन कार्यों की ओर बढ़े (अर्थात्, सायकालीन कृत्यो को करने गये)।

घने दलोवाले सुगन्धित पुष्पो में से कुछ बंद हुए। निर्दोष तथा सुगंध से भरे पुष्पो मे से कुछ विकमित हुए, प्रभु के साथ, अनुज ( लक्ष्मण ) तथा अमृत-समान (सीता) देवी के कर एव नेत्र भी कमलपुष्पो के समान ही बद हुए ( अर्थात्, वे तीनो हाथ जोड़कर और नयन बद करके भगवान् का ध्यान करने लगे) ।

सध्याकाल व्यतीत होने पर (रात्रि के आगमन पर) उत्तम स्वभाववाले, लक्ष्मण ने, अनघ राम तथा उनकी सूक्ष्म कटिवाली देवी के निवास के लिए विचार करके वहाँ किस प्रकार से एक पर्णशाला बनाई, हम उसका वर्णन करेंगे।

लक्ष्मण ने छोटे-छोटे बाँस के टुकड़ो को लेकर खड़ा किया और फिर वक्रता से हीन सीधे तथा लंबे बाँसो को उनपर आड़े रखा। फिर उनपर शहतीरो की तरह बाँसो को रखकर ठाट बनाई और उनपर पत्ते विछाये।


१ कालनेमि हिरण्यकशिपु का एक पुत्र था। उसके एक सौ सिर और एक सौ हाथ थे। विष्णु के द्वारा अपने पिता के मारे जाने पर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और देवो को परास्त करके अपना पराक्रम दिखाने लगा। तब विष्णु भगवान् ने चक्र प्रयोग करके उसके सिर और हाथो को काट डाला।

२५४

कंब रामायण

छप्पर पर शालवृक्ष के पत्ते बिछाये और उन्हें मूंज से बाँध दिया। नीचे खड़े किये बाँसो के टुकड़ो के बीच में मिट्टी भरकर दीवारे खड़ी की और उनपर जल छिड़ककर ( दीवारों को ) समतल बनाया।

पर्णशाला के भीतर शास्त्रोक्त रीति से राम और सीता के ( सोने के ) लिए अलग-अलग आसन बनाये, लाल कुंकुम की मिट्टी से उन्हें लीपा और दीवारो मे भीतर की ओर नदी मे उत्पन्न रत्न और मोती चिपकाये।

( पर्णकुटीर के भीतर ) मयूर-पंखो का एक वितान लगाया। अपनी छुरी से काट-काटकर लटकनेवाले तोरण बनाकर लगाये और नदी-तट के बाँसों को काटकर उस पर्णशाला के चारों ओर एक प्राचीर ( बाड़ ) भी बनाया।

वह प्रभु, जो चतुर्मुख के हृदय मे एव हम जैसे अज्ञ लोगो के हृदयो में एक समान ही रहता है, स्वर्णमय देह कांति से युक्त लक्ष्मी-समान सीता देवी के साथ अपने अनुज के द्वारा इस प्रकार निर्मित पर्णकुटीर में प्रविष्ट हुए।

ज्ञानियो का अविद्या-रहित हृदय है, महिमामय वेद है, या पवित्र क्षीर-सागर है, या बैकुंठधाम ही है—यो कहने योग्य उस पर्णकुटीर मे अगाध प्रेम से प्राप्त होनेवाले प्रभु ( राम ), प्रेम-पूर्ण मन में आनदित होकर निवास करने लगे।

सीता देवी के, पुष्प से भी कोमल, चरण काँटो और कंकड़ो से भरे अरण्य में चले, मेरे दोषहीन भाई के करो ने यह पर्णशाला बना दी। अहो! जिन्हें कोई सहायक नही होता, उन्हें भी कौन-सी वस्तु अप्राप्य होती है? ( भाव यह है—निस्सहाय व्यक्ति के लिए उसके समीपस्थ पदार्थ ही सब आवश्यकताएँ पूर्ण करते हैं।)

यह विचार करके फिर राम ने अपने अनुज से कहा—दो पर्वतो के समान पुष्ट कंधोवाले। तुमने ऐसी सुन्दर पर्णशाला बनाना कब सीखा? उस समय उनके कमल-समान विशाल नयनो से अश्रु-बिंदु बरस पडे।

अपार संपत्ति को प्रदान करनेवाले ( दशरथ ) की आज्ञा से वन मे आकर उत्तम धर्म का पालन करते हुए मैने सूर्य के समान उज्ज्वल सत्य-रूपी यश को प्राप्त किया, ऐसा कहने मे क्या तथ्य है? मै तो अनेक दिनो से तुमको कष्ट ही देता आ रहा हूँ। इस प्रकार, राम ने बड़ी मनोवेदना के साथ कहा।

प्रभु के यह कहने पर लक्ष्मण ने चिंतित होकर उनकी ओर देखा और कहा—हे मेरे पितृ-तुल्य! ( हमारे ) कष्टों का अंकुर तो पहले ही ( अर्थात्, जब कैकेयी को दशरथ ने वर दिये ) फूट निकला था। ( भाव यह है, हमारे इन कष्टो का कारण आप नही हैं। इनका कारण कैकेयी का वर ही है, अतः आप चिंतित न हो।)

फिर, रामचन्द्र ने मन में सोचा—जो हो, अब मुझे और कुछ नही करना है। अब ( लक्ष्मण के कष्टो को देखकर ) मैं धर्म के मार्ग को छोड़कर नही जा सकता। फिर, अपने ज्येष्ठ भ्राता की सेवा मे आनन्द पानेवाले लक्ष्मण की इस मानसिक ताप को ( कि मेरे बड़े भाई वनवास का कष्ट भोग रहे हैं ) जानकर राम सोचने लगे—इस ( लक्ष्मण ) के मानसिक कष्ट को दूर करना असम्भव है।

अयोध्याकाण्ड २५५

फिर अग्रज ( राम ) ने अपने छोटे भाई को देखकर कहा-संसार में प्राप्त होनेवाली सम्पत्ति सीमाबद्ध होती है। किन्तु, भविष्य में अपार आनन्द उत्पन्न करनेवाले हमारे इस वनवास-रूपी सुख के बारे में विचार कर देखो। इसमें क्या कमी है ?

दृढ धनुर्धारी रामचन्द्र अपने अनुज को सान्त्वना देकर, देवों की स्तुति प्राप्त करते हुए, अपने व्रत का पालन करते रहे। उधर महान् तपस्वी ( वसिष्ठ ) की आज्ञा से ( केकय देश को ) गये दूतो का क्या हुआ--अब हम उसका वर्णन करेंगे। ( १-५८ )

अध्याय ६

चिता-शयन पटल

असत्य-रहित अनुपम दूत, जो अयोध्या से चले थे, रात-दिन वेग से चलकर ( केकय देश में ) भरत के भवन में पहुँचे। वहाँ पहुँचकर द्वार-रक्षकों से कहा--द्वाररक्षको। राजा भरत को हमारे आगमन का समाचार दो।

'आपके पिता का समाचार लेकर दूत आये हैं।'-यह वचन सुनकर भरत अत्यन्त आनन्दित हुआ और प्रेमाधिक्य से उन दूतों को अपने निकट लाने की आज्ञा दी। जब वे दूत निकट जाकर नमस्कार करके खड़े हुए, तब भरत ने कहा-मुकुटधारी चक्रवर्ती, किंचित् भी कष्ट के बिना सुखी हैं न ?

दूतों ने कहा-'चक्रवर्ती शक्तिशाली हैं।' यह सुनकर आनन्दित हो फिर भरत ने प्रश्न किया--मेरे प्रभु ( राम ) के साथ आभरण-भूषित अनुज ( लक्ष्मण ) अक्षुण्ण वैभव से युक्त हैं न ? दूतों ने 'हाँ' कहा। तब भरत ने राम को उद्दिष्ट करके अपने शिर पर हाथ जोड़े।

फिर, यथाक्रम सब बंधुओ के समाचार सुनकर भरत आनन्दित हुए। तब दूतो ने भरत से यह कहकर कि चित्रित करने के लिए असाध्य रूप से सम्पन्न हे भरत ! चक्रवर्ती का यह श्रीमुख ( अर्थात्, चिट्ठी ) है, पत्र दिया।

उनके यह कहने पर भरत ने उस पत्र के प्रति नमस्कार किया और उठकर अपने स्वर्ण-आभरण से भूषित दीर्घ कर में उसे लिया और द्रवित-चित्त होकर सद्योविकसित पुष्पो से भूषित अपने शिर पर उसे रख लिया।

यों शिर पर रखने के पश्चात् भरत ने, ऊपर से चंदन से लिप्त मिट्टी लगाकर बंद किये गये उस पत्र के चोगे को खोलकर देखा। उसका समाचार पढ़कर उन दूतो को कोटि से भी अधिक धन दिया।

तब भरत इस उमंग में कि वे अपने ज्येष्ठ भ्राता के दर्शन करनेवाले हैं, उज्ज्वल कांति फैलानेवाली हँसी से युक्त हुए, पुलकित हुए और उस पत्र पर सद्यः तोड़कर लाये गये पुष्प डाले।

२५६कंब रामायण

तुरत भरत ने अपनी सेना को सन्नद्ध होने की आज्ञा दी और यह भी न विचार कर कि वह मुहूर्त्त यात्रा के लिए अच्छा है या नही, कैकेयराज को प्रणाम करके, उनकी आज्ञा लेकर, अपने भाई (शत्रुघ्न) के साथ घोडे जुते हुए रथ पर आसीन होकर चल पडे।

उस समय हाथी (भरत को) घेरकर चल पडे। रथ कोलाहल करते हुए साथ चल पड़े। बड़े महिमापूर्ण राजा लोग घेरकर चल पडे। करवाधारी पदाति-सेना चल पड़ी। शंख बज उठे। नगाड़े, मत्स्यों के निवास समुद्र के समान गरज उठे।

ध्वजाएँ एकत्र होकर निकली। निशान निकले। आम के टिकोरे-जैसे नयनों-वाली युवतियों के आरूढ होने योग्य हथिनियाँ चलीं। मेघों के गर्जन समय कौंधनेवाली बिजली के समान सर्वत्र आभरण चमक उठे।

अनेक रथों पर रखे गये विविध वाद्य बड़ी ध्वनि करने लगे। नारियों की पुष्प-मालाओं के भ्रमर झंकार भरने लगे। शर के समान वेगगामी अश्व मार्ग पर चलने लगे।

अपनी नासिका से साँस छोड़ते हुए बाँसुरी की-सी ध्वनि करनेवाले, मुख पर आभरणों से भूषित, गगन पर भी उड़ जानेवाले, निश्चित समय में कितनी भी दूर चले जानेवाले, झुकी हुई गरदनवाले अश्व चल पड़े।

धनुर्विद्या में निपुण, करवाल-युद्ध में चतुर, खड्ग-युद्ध में कुशल, मल्ल-युद्ध में प्रवीण, बर्च्छे, भाले आदि शस्त्रों के अभ्यासी योद्धा तथा पुराने हाथीवान भी घेरकर चले।

परस्पर टकरानेवाले भैंसे, बकरे, रक्त का चिह्न देखकर लड़ने को झपटनेवाले कुक्कुट, बाज, 'करुंपूलू' (नामक लड़नेवाला पक्षी-विशेष), 'कौदारी' (नामक लड़नेवाले पक्षी-विशेष) आदि को पालनेवाले जो कभी उत्तम मार्ग पर न चलनेवाले थे, ऐसे मनुष्य भी घेरकर चले।

भरत कहीं त्वरित गति से आगे न निकल जायें, इस आशंका से आतुर होकर विद्या, ज्ञान आदि से भरे हुए व्यक्ति आगे-आगे चलने लगे। इस प्रकार चलते हुए वे ऐसे लगते थे, जैसे शापवश इस धरती पर जन्म लिये हुए देवता सद्ज्ञान पाकर पुन. स्वर्ग को जा रहे हो।

बंदी-मागधों के मधुर गीत गगन को भरने लगे। जैसे प्राण शरीर में व्याप्त रहता है, उसी प्रकार मर्दल-ध्वनि सब गीतों में व्याप्त हो गई।

बजनेवाले नगाड़ों की ध्वनि से भी बढ़कर वेदज्ञ ब्राह्मणों के आशीर्वादों की ध्वनि थी। वृषभ-समान मल्ल-वीरों के गर्जन से भी बढ़कर बंदी-मागधों के स्तुति-पाठ की ध्वनि थी।

भरत सात दिन चलकर नदियों, काननों और विशाल पर्वतों को पारकर उस कौशल देश में जा पहुँचे, जहाँ गन्ने के कोल्हुओं से निकला हुआ रस नालों में, बाँध तोड़ता हुआ, वह चलता है और अंकुरों से भरे खेतों को भर देता है।

खेत हलों से शून्य थे। युवकों की भुजाएँ पुष्पमालाओं से शून्य थीं। शीतल धान के खेत पानी से शून्य थे। कमल में वास करनेवाली संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उस देश को छोड़कर चली गई थीं।

अयोध्याकाण्ड २५७

मधुर फलों के रस विशाल जलाशयों में भर रहे थे और चारों ओर बहकर व्यर्थ हो रहे थे। मनोहर पुष्पों के समूह तोड़े न जाकर पौधों पर ही विकसित होकर, फिर कुम्हलाकर झर रहे थे।

फसल को काटने का उचित समय को जाननेवाले किसानो के अभाव से शालि-धान के पौधे, आम्र-रस की धारा के बहने के कारण, सिर झुकाये टूटकर खड़े थे और धान धरती पर झरकर अंकुरित हो रहे थे।

तिलपुष्प-जैसी नासिकावाली तथा उन खेतो में जहाँ पक्षी आनन्द से सञ्चरण करते थे, काम करनेवाली अंत्यज-नारियाँ काम छोड़कर दुःखी पड़ी थीं, मानों वे अपने प्रियतमो से मान करके निराने का काम छोड़ बैठी हों।

शुक मौन हो बैठे थे। सुन्दर केशोंवाली स्त्रियाँ अपनी सखियों का दौत्य करती हुई उन (सखियों) के प्रियतमों के निकट नहीं जा रही थीं। नगाडे नहीं बज रहे थे। स्वर्ण से अलंकृत वीथियों में विवाह आदि के जुलूस नहीं निकल रहे थे।

संगीत-शास्त्रो में कथित विधान के अनुसार बनाई गई मधुर नादवाली बाँसुरी अब नहीं बज रही थी। नृत्यशालाओ तथा जलाशयो में नृत्य तथा जल-क्रीडा नहीं हो रही थी। (लोगो के) शिर पुष्पालंकार से विहीन थे। विद्युत्-निवारक यन्त्री से युक्त प्रासाद धान कूटनेवाली स्त्रियो के गीतों से विहीन थे।

(लोगो के) प्रकाशमान मुख हास-हीन थे। सौध सुगन्धित अगरु-धूम से विहीन थे। दीप पुष्ट ज्वाला से विहीन हो मंद पड़े थे। नारियो के केश मधुपूर्ण पुष्पों से विहीन थे।

भली भाँति बढ़े हुए तथा लहलहाते हुए सस्य के पौधे, विशाल नालो के निकट रहने पर भी किसी के द्वारा उन नालों में पानी को मोड़कर न बहाने के कारण उसी प्रकार शुष्क खड़े थे, जिस प्रकार निष्ठुर लोभी के द्वार पर, दान पाने की इच्छा से आया हुआ व्यक्ति हो।

वर्णन करने को भी असाध्य, अपार सम्पत्ति से समृद्ध वह कौशल देश, पुष्पहीन हो, पुष्प पर आसीन लक्ष्मी से विहीन हो एवं सारी शोभा से रहित होकर प्राण-विहीन देह के समान लगता था।

इस प्रकार के कौशल देश को देखकर भरत बहुत दुःखी हुए, किन्तु वहाँ घटित किसी वृत्तान्त को न जानने से यह सोचते हुए कि शायद हम अब कोई शोक-समाचार सुनने जा रहे हैं, वे रह-रहकर आह भर रहे थे।

सत्य नामक उत्तम आभरण से भूषित चक्रवर्ती के पुत्र भरत ने कुछ दूर आगे जाकर वेगवान् अश्वों से खींचे जानेवाले रथ से भी आगे जानेवाले अपने मन में (भावी के सम्बन्ध में) विचार करते हुए, अयोध्या के विशाल द्वार को देखा।

भरत ने उस नगर में उन दीर्घ ध्वजाओं को नहीं देखा, जो (ऐसी लगती थी) मानो वे सहस्रकिरण (सूर्य) के पीछे-पीछे चलकर उनसे यह कहती थीं कि तुम सारे ब्रह्माण्ड में घूमते-घूमते थक गये हो, (यहाँ किंचित् समय ठहरकर) विश्राम कर लो, तब जाओ, और उन (सूर्य) की गति को रोक लेती थीं।

२५८कंब रामायण

( भरत ने उस नगर में ) उन नगाडों का शब्द नहीं सुना, जो ( नगांड ) मानो विशाल जनता को यह सूचना देते बजते रहते थे कि राजा को यथेष्ट यश देते हुए यहाँ की समस्त सम्पत्ति को ले जाओ।

भ्रमरों से पिये जानेवाले मधु से युक्त पुष्पमाला को धारण किये हुए भरत ने मंगल-गीत गानेवालों को तथा स्तुति-पाठ करनेवालों को प्रचुर मात्रा में उत्तम हाथी-हथिनी, अन्य सम्पत्ति आदि पुरस्कार के रूप में ले जाते हुए नहीं देखा।

लोक-रक्षक चक्रवर्त्ती के पुत्र ( भरत ) ने भूसुरों ( अर्थात् ब्राह्मणों ) को दान के रूप में गाय, गज, सुन्दर सम्पत्ति आदि को जाते हुए नहीं देखा।

मँडरानेवाले भ्रमरों एव वीणा आदि से सप्त स्वर-युक्त संगीत न गाये जाने के कारण वे ( अर्थात, भ्रमर और वीणा आदि वाद्य ) आम के टिकोरे-जैसे नयनोंवाली ( मूक ) नारियों के केशों की समता कर रहे थे।

उस नगर की वीथियों में रथ, घोडे, हाथी, शिविका, शकट आदि नहीं दिखाई देते थे। अतः, वे ( वीथियाँ ) जल के सूखने पर सिकतामय दिखनेवाली नदियों के समान शोभा-विहीन लगती थीं।

सज्जनों के द्वारा प्रशंसित सद्गुणों से पूर्ण भरत ने नगर के भीतरी प्रदेश को अपनी पूर्व दशा से विहीन देखकर अपने भाई ( शत्रुघ्न ) से कहा—हे अनुज ! चक्रवर्त्ती के निवासभूत इस राजधानी की ऐसी दशा क्यों हुई ?

शत्रुओं को वीर-स्वर्ग पहुँचानेवाले तथा सजल मेघ-जैसे कंधोंवाले हे भाई ! यह नगर मीन-समान नयनोंवाली लक्ष्मी से विहीन विशाल क्षीर-सागर के जैसा लग रहा है, देखो।

तब उत्तम रत्न-खचित आभरणों से भूषित सिंह-समान अनुज ( शत्रुघ्न ) ने हाथ जोडकर निवेदन किया—ऐसा लगता है कि इस नगर में कोई अति दारुण शोकप्रद घटना हुई है, जो साधारण नहीं है। लक्ष्मी भी युगान्त तक अविनाशी रहनेवाले इस नगर को छोड़कर चली गई हैं।

इतने में, कुछ अधिक सोचने के पूर्व ही चक्रवर्ती-कुमार विशाल तोरण से भूषित अत्युन्नत राजप्रासाद के द्वार पर आ पहुँचे और तुरन्त अपने पिता के विश्राम-स्थान में गये।

पर्वतों को लज्जित करनेवाले ऊँचे कंधों से शोभायमान भरत ने जाकर देखा, किन्तु कहीं भी अपने पराक्रमशाली पिता को नहीं देखा। तब उनके मन में आशंका उत्पन्न हुई कि अत्र पिता के न देखने का कारण कुछ साधारण नहीं है।

उस समय, अपने पिता को ढूँढ़नेवाले और अपने पवित्र करों से उनके चरणों को छूने की इच्छा रखनेवाले भरत से, बाँस-जैसे कंधोंवाली एक दासी ने कहा—माता आपका स्मरण कर रही हैं। आप इधर आइए।

भरत ने आकर अपनी माता ( कैकेयी ) के चरणों का नमस्कार किया। माता ने मन-भर उनका आलिंगन किया और पूछा—मेरे पिता, मेरे भाई आदि सब कुशल हैं न ? अपार गुणाकर भरत ने कहा—हाँ वे सब कुशल हैं।

तब भरत ने कहा—मैं उमड़नेवाले प्रेम से पूर्ण चक्रवर्ती के कमल-समान चरणों

अयोध्याकाण्ड २५६

को नमस्कार करने के लिए आया हूँ। पिता के दर्शन करने के लिए मेरा मन आतुर हो रहा है, पौरुष से पूर्ण तथा दीर्घ मुकुटधारी चक्रवर्त्ती कहाँ हैं, बताओ। यह कहकर भरत हाथ जोड़कर खड़ा रहा।

भरत के यह पूछने पर अव्याकुल चित्तवाली कैकेयी ने कहा—दानवों का विनाश करनेवाली सेना से युक्त तथा भ्रमरों से अंचित पुष्पमाला धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती, देवताओं के नमस्कार का पात्र बनते हुए स्वर्ग को सिधार गये हैं, तुम चिन्ता न करो।

आहत करनेवाले वह वचन ज्योंही भरत के कानों में पड़े, त्योंही घुँघराले केशों से शोभायमान वह निःसङ्ग होकर गिर पड़े। विलब तक ऐसे मूर्च्छित पड़े रहे, जैसे कोई बड़ा वृक्ष वज्र से आहत होकर गिरा हो।

फिर, किंचित् प्रज्ञा प्राप्त कर भरत ने मंद पड़ी हुई अपनी मुखकांति के साथ एवं प्रफुल्ल कमल-जैसे नेत्रों में अश्रु भरकर माता को देखकर कहा—कानों में जैसे किसी ने अग्नि-ज्वाला रख दी हो—ऐसे कठोर वचन कहने का विचार तक करनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त और कौन हो सकता है ?

सुब्रह्मण्य (शिव के पुत्र कार्त्तिकेय) से भी अधिक सुन्दर वह कुमार (भरत), बड़ी वेदना के साथ उठे। पुनः धरती पर गिर पड़े। उष्ण निःश्वास भरे। रोये। फिर, ये वचन कहने लगे—

हे पिता ! तुमने धर्म को विस्मृत कर दिया। दया को मिटा दिया। अत्युत्तम करुणा-रूपी सम्पत्ति को मिटाकर इस संसार को छोड़ चले। हाय ! तुमने न्याय को भी भुला दिया। इससे बढ़कर दोष और क्या हो सकता है ?

तुमने क्रोध-रूपी दुर्गुण को मिटा दिया था। काम-रूपी अग्नि को बुझा दिया था तथा लोभ आदि के समूह को भी विध्वस्त किया था। सब लोगों के मन के अनुकूल चलने-वाले, हे उदारगुण ! अब दूसरों को भूलकर केवल अपने मन के अनुसार कार्य करना (अर्थात्, हम सबकी इच्छा के विरुद्ध इस संसार को छोड़ जाना) क्या उचित है ?

हे प्रभु ! इस कुल के महान् पूर्व-पुरुष, सूर्य आदि के वीर चारित्र्य को तुमने पुनः नवीन कर दिखाया था। ललाट-नेत्र (शिव) के दृढ़ धनुष को तोड़नेवाले अपने पुत्र (राम) को छोड़कर तुम कैसे चले गये ?

हे तात ! न्याय-मार्ग से आज्ञा-चक्र प्रवर्त्तित करनेवाले राजन् ! इस संसार में किसी भी वंश के हों, सब लोग तुम्हारे सम्मुख याचक ही थे। इसलिए (यहाँ अपने समान मित्रों को न पाकर) क्या उत्तम मित्रों को पाने की इच्छा से तुम स्वर्ग गये हो ?

मल्ल युद्ध में चतुर विशाल कंधोंवाले ! चिरकाल से छाया देते रहनेवाले तुम्हारे श्वेतच्छत्र की विशाल छाया में विश्राम प्राप्त करनेवाले सब प्राणियों को व्याकुल ही छोड़कर क्या तुमने स्वयं (स्वर्ग में) कल्प-वृक्ष की छाया में सुखपूर्वक निवासकरने की इच्छा की है ?

हे तात ! क्या शंबर के समान असुर अब भी आकाश में रहते हैं ? क्या देवता लोग असुरों से हारकर अपने स्वर्ग को भी खोकर रक्षा की प्रार्थना करते हुए तुम्हारी शरण में आये थे ?

२६०कंब रामायण

तुम वेदों में प्रतिपादित अश्वमेध यज्ञ करते थे और वाद्यों के शब्द से युक्त सेना के साथ जाकर अन्य राजाओं के द्वारा समर्पित राजस्व को ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में दान कर देते थे । इस प्रकार, गार्हपत्य अग्नि को प्रज्वलित करते रहते थे । यह सब कार्य छोड़कर क्या तुम स्वर्ग में निष्क्रिय बैठ सकते हो ?

सात हाथ ऊँचे तथा मद बहानेवाले हाथियों के स्वामी ! क्या यह सोचकर कि श्यामल (राम) (शासन चक्र धारण किये बिना) खाली हाथ रहता है, उन (राम) को शासन का भार देने के लिए तुम इस संसार को छोड़कर चले गये ?

तुमको तप में आसक्ति नहीं थी । अतएव, पहले की हुई बड़ी तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त रामचन्द्र को, राज्य मिलने पर होनेवाले अभिषेक के उत्सव की शोभा भी, अपने विशाल नयनों से देखने का भाग्य तुम्हे नही मिला ।

पिता की मृत्यु से उत्पन्न दुःख का सहन न करते हुए भरत ने इस प्रकार के वचन कहे और वे इस प्रकार पिघल उठे कि उनके नेत्रों से नदी-प्रवाह के समान अश्रुधारा वह चली । फिर, वह यम-सदृश धनुर्धारी भरत स्वयं ही अपने आपको सांत्वना देकर किंचित् स्वस्थ हो बोले—

मेरे पिता, मेरी माता, मेरे भगवान्, मेरा भाई, सब कुछ वे अपार मद्गुणाकर राम ही हैं । अतः, जबतक उनके वीर-वलय-भूषित चरणों को नमस्कार न करूँगा, तबतक मेरे मन की पीडा दूर नहीं होगी ।

वह वचन सुनते ही घोर वज्र-तुल्य वचनवाली कैकेयी पुनः बोल उठी—हे शत्रु-नाशक धनुर्धारी ! वह (राम) अपनी देवी तथा भाई-सहित वनवास को गया है ।

(राम) वनवास के लिए गया है ।—कैकेयी के कहे इस वाक्य को सोचकर भरत ऐसे हुए, जैसे उन्होंने आग निगली हो । वे आशंकित होकर बोले—अहो ! मेरे पापकर्म कितने भयंकर हैं ? न जाने, मुझे अभी और क्या-क्या समाचार सुनने हैं ।

पीडा से मौन रहनेवाले उस पुरुष-श्रेष्ठ (भरत) ने पूछा—वीरवलय-धारी उन राम का अरण्य में जाना क्या किसी बुरे कार्य के परिणामस्वरूप हुआ ? या यह दैवी कोप का परिणाम है ? अथवा अति बलवान् नियति का विधान है ? किस कारण से यह हुआ ?

यदि राम स्वयं कोई बुरा कार्य भी करें, तो वह (कार्य) इस संसार के सब प्राणियों के लिए माता के कार्य (जैसे अपने बच्चे के हाथ-पैर दबाकर उसके मुँह में औषध आदि डालने के) जैसे ही हितकारी होगा । राम का वन-गमन क्या पिता के स्वर्ग सिधारने के पश्चात् हुआ या उसके पूर्व हुआ ? कृपया बताओ ।

तब कैकेयी ने उत्तर दिया—राम का वन-गमन गुरुजनों के प्रति कोई अपराध करने के कारण नहीं हुआ । गर्व के कारण भी उसे वन नहीं जाना पड़ा । दैवी प्रकोप से भी यह नहीं हुआ । सूर्य-समान राजवंश में उत्पन्न चक्रवर्ती (दशरथ) के जीवित रहते समय ही वह वन को चला गया ।

तब भरत ने प्रश्न किया—राम का अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं, शत्रुओं की दी हुई पराजय नहीं, दैवी प्रकोप भी नहीं है । तो भी पिता के जीवित रहते हुए

अयोध्याकाण्ड २६१

उनको अरण्य जाना पड़ा—इसका क्या कारण है ? उन चक्रवर्त्ती के प्राण छोड़ने का क्या कारण हुआ ?

तब कैकेयी ने कहा—चक्रवर्त्ती ने मुझे दो वर दिये थे। उनके दिये वरों में से एक से मैंने राम को वन भेजा, दूसरे से तुम्हारे लिए राज्य प्राप्त किया। चक्रवर्त्ती इसको नहीं सह सके, अतः उन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये।

भरत के कर जो अबतक उनके सिर पर जुड़े हुए थे, कैकेयी के यह वचन समाप्त होने के पूर्व ही, उनके कानों पर आ लगे (अर्थात्, उन्होंने अपने कान बंद कर लिये)। उनकी भौंहें टेढ़ी होकर काँपने लगीं। उनके निःश्वासों से चिनगारियाँ निकलने लगीं तथा उनकी आँखों से रक्त-बिंदु चू पड़े।

उनके कपोल फड़क उठे। रोगटों के चारों ओर अग्निकण छा गये। धूम भी (उनके शरीर से) निकलकर चारों ओर छा गया। ओठ दब गये। मेघ-समान उदार गुण से युक्त उनके दीर्घ हाथ वज्र को भी भीत करते हुए परस्पर आघात कर उठे।

भरत अपने पैरों को वारी-बारी से धरती पर पटकते थे, उससे मेरु पर्वत-सहित यह धरती इस प्रकार डोलायमान हो उठी, जैसे हाथी को लादकर चलनेवाली लंबे मस्तूल से युक्त कोई नौका, आँधी के चलने पर समुद्र के मध्य ऊर्ध्व-द्रव हो उठती है।

(भरत का क्रोध देखकर) देवता डर गये। असुर बड़े भय से मरने लगे। दिग्गजों ने अपने मदस्रावी रंध्रों को बंद कर लिया। सूर्य अस्त हो गया। कठोर क्रोध-वाले यम ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं।

घोर क्रोध से भरे सिंह-सदृश भरत ने क्रूर कार्य करनेवाली उस कैकेयी को अपनी माता नहीं समझा। फिर, उसको इसलिए नहीं मारा कि उससे रामचंद्र क्रोध करेंगे। यों चुप रहकर फिर उसे देखकर वज्रघोष से ये वचन कहे—

तुम्हारी क्रूरता के कारण मेरे पिता मर गये। मेरे भाई तपोव्रत धारण कर वन में चले गये। मैं, जो (इस प्रकार के वर माँगनेवाले तुम्हारे) मुँह को चीरे बिना (तुम्हारे वर माँगने की) वह सुनता हुआ खड़ा हूँ, बड़ी इच्छा से राज्य का शासन करनेवाला हूँ!

(मेरे पिता और मेरे भ्राता को दूर करनेवाली) तुम अभी यहीं हो। (तुम्हारे वचन सुनता हुआ) मैं भी यहीं हूँ। क्षण-मात्र में ही तुम्हें मारकर नहीं गिरा देता। मैं इसी विचार से डरता हूँ कि जगत् की माता के समान वे मेरे भाई क्रोध करेंगे। अन्यथा, तुम्हारा माता का पद (तुम्हारी हत्या करने से) मुझे कभी रोक नहीं सकता था।

एक चक्रवर्त्ती ऐसा है, जो कठोर वचन सुनकर प्राण छोड़ देता है। एक वीर भी ऐसा है, जो अपना राज्य त्यागकर चला जाता है और एक भरत भी ऐसा है, जो अपनी माता के द्वारा प्राप्त राज्य का शासन करनेवाला है। ऐसा हो, तो धर्म का मार्ग ही प्रतिकूल है और वह हमारे लिए चाहने योग्य नहीं है।

यदि भविष्य में ऐसा अपवाद उत्पन्न हो कि—'भरत ने वंचनाशील माता के क्रूर षड्यन्त्र के कारण आदिकाल से आये हुए अपने कुल-महत्त्व को मिटा दिया और उस (कुल)

२६२भद्र रामायण

को अमूल्य रत्न-दण्ड का छत्र बना दिया—तो इससे बढ़कर प्रतिकूल बात और क्या हो सकती है?

तुमनें पतिव्रत्य नामक धर्म की सीमा को मिटा दिया। उस जगत्-प्रसिद्ध उत्कृष्ट ऐश्वर्य के तीस लक्षण धारण करनेवाले चक्रवर्त्ती का तुमने नाश किया—और इस प्रकार के उन नव्बें। तीन लोगों को काटनेवाली नागिन हो। उस पर भी तुम कलङ्क कहती हो।

तुमने अपने पति के प्राण पी डाले। तुम कोई व्याधि नहीं हो, किन्तु पिशाचिनी हो। (भाव है, अगर व्याधि होती, तो वह शरीर से पृथक् होकर उस शरीर के साथ नष्ट होती है। पिशाचिनी शरीर के मिटाने के बाद भी जीवित रहती है। अतएव कैकेयी, पिशाचिनी-तुल्य है)। क्या तुम अब भी जीवित रहने योग्य हो, क्या पापिन हो जाओ। तुमने (पहले) मुझे अपना स्तन पिलाकर बड़ा किया। (उस समय अवकाश दिया। मेरी माँ बनी हुई तुम न जाने मुझे और क्या देनेवाली हो।

कभी असत्य न बोलनेवाले चक्रवर्त्ती को तुमने वचन से मार डाला। उस अपवाद पाकर भी तुमने राज्य प्राप्त करके सुखी जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न किया। तुमने राम को अरण्य भेजकर गाय और उसके बछड़े को पृथक् कर दिया (अर्थात्, समस्त नगर के लोगों से पृथक् किया)। ऐसा करते हुए तुम्हारा मन किञ्चित् भी दुःखी नहीं हुआ।

चक्रवर्ती, अपने दिये हुए वरों को न टालकर स्वयं मर गये। ज्येष्ठ पुत्र अपने पिता की आज्ञा को ही धर्म मानकर वन चले गये। किंतु उन (राम) का छोटा भाई मैंने माता के षड्यन्त्र से संसार का राज्य प्राप्त किया, ऐसा अपयश पाना बड़ा कठिन है।

जिनको राज्य करने का अधिकार है, वे राम—यह न सोचकर कि उनके वन जाने से पिता प्राण त्याग देंगे और यह मानकर कि अपयश का पात्र बनेगा—किन्तु यह प्रतिकूल विचार मेरे ही (अर्थात्, भरत के ही) कारण उत्पन्न हुआ तथा निष्कण्टक राज्य करनेवाला हूँ—स्वयं वन को चले गये। यदि वे (राम) ऐसा नहीं मानते, तो वे कभी वन जाने का विचार नहीं करते।

प्रसिद्ध पुरातन कुल में उत्पन्न चक्रवर्ती का विचार जैसा भी रहा हो तथा (राम) यदि यह सोचें कि मेरी सेवा में निरत रहनेवाला भरत (मेरे प्रति) दुष्ट विचार रखता है, तो इसके लिए मेरी माता का राज्य माँगना ही पर्याप्त कारण है।

मेरे ज्येष्ठ भ्राता, वन में अपनी अञ्जलि-रूपी पात्र में शाक आदि वन्य फल-मूलों में क्रय बनकर अपना जीवन रखे हुए, उत्तम (स्वर्ण के) पात्र में श्रेष्ठ धान के पके हुए चावल अमृत समान घृत से सिक्त करके भोजन करता रहूँ? अहो! संसार के लोग मुझपर क्या आक्षेप नहीं सोचेंगे?

धनुर्भूषित कंधेवाले राम वन को चले गये—महा महाराज दशरथ चक्रवर्ती ने अपने प्राण छोड़ दिये। किन्तु विष-समान इस नारी की गोद में अपने को बिना जीवित रहनेवाली मैं ऐसे रो रहा हूँ, जैसे श्मशान-भूमि पर मुझे दफन करने के लिए कितने घोर अपयश का पात्र बन गया हूँ।

अयोध्याकाण्ड२६३

मेरा राज्य करना लोग स्वीकार नही करेगे। मैं भी जैसे जीवन की इच्छा करके अपयश को स्वीकार नही करूँगा। इससे उत्पन्न होनेवाला अपयश किसी भी उपाय से नही मिटेगा। अधर्म से युक्त इस नगर मे लक्ष्मी निवास नही करेगी। अहो ! तुमने (यह सब उत्पात करने के लिए) किसके साथ मत्रणा की ? तुम्हे परामर्श देनेवाले कौन हैं ? धर्म का समूल नाश करके तुम्हे क्या मिला ?

तुम्हारे क्रूर वचन के द्वारा मैने अपने पिता को मारा (अर्थात्, पिता की मृत्यु का निमित्तकारण मै बना)। ज्येष्ठ भ्राता को अरण्य मे भेज दिया। अब संसार का राज्य करने के लिए आ उपस्थित हुआ हूँ। तुम पर क्या दोष डाले ? तुम्हारा क्या अपयश होगा ? पर क्या किसी दिन मेरा अपयश भी मिट सकेगा ?

अब लोग देखे कि मै क्या करने जा रहा हूँ। जबतक लोग (मेरे स्वभाव को) नही देखेगे, तबतक मेरी निन्दा करेंगे। किन्तु हे माता ! तुमने व्यर्थ अपवाद प्राप्त किया (जो किसी भी रूप मे नही मिटनेवाला है)। मेरा यह विचार है कि विष, बिना उसे खाये, किसी को नही मारता, इसलिए अबतक मैं जीवित हूँ। अन्यथा मै प्राण नही रखता (भाव यह है कि जिस प्रकार विष खाने पर ही मारता है, उसी प्रकार जब मै राज्य स्वीकार करूँ, तभी मेरा अपवाद होगा, अन्यथा नही)।

मै तुम्हारे पाप-पूर्ण नरक-तुल्य उदर में रहा—इससे जो पाप मुझे लगा है, उसे मिटाना है। इसलिए, सद्धर्म के देवता को साक्षी बनाकर, त्रिलोक के निवासियो के देखते हुए, मै घोर तपस्या करूँगा।

ज्ञानी लोगो के वचन को ही मै सुनता हूँ। यदि तुम अपने न मिटनेवाले प्राणो को त्याग दोगी, तो तुम्हारे कार्य बुद्धिपूर्वक किये गये ही माने जायेगे। उससे तुम पुनः शुद्ध बन जाओगी। ससार में जन्म लेने का लाभ तुम्हे मिलेगा। इसके अतिरिक्त तुम्हारे निस्तार का अन्य कोई उपाय नही है।

राम के अनुज (भरत) ने फिर यह कहकर कि मै अब अकथनीय क्रूरता से युक्त इस पापिन के निकट नही रहूँगा, अपनी अपूर्व मनोपीडा को मिटाने के लिए पवित्र स्वभाववाली कौशल्या के उत्तम चरणो को नमस्कार करूँगा, उठकर चले गये।

पौरुष से युक्त भरत कौशल्या के निकट जा पहुँचे। वहाँ जाकर धड़ाम से ऐसे गिरे, जैसे धरती फट गई हो और अपने उज्ज्वल करो से कौशल्या के कमल-जैसे चरणो को पकड़कर रोने लगे।

उस समय भरत ये वचन कहकर अश्रु बहाने लगे, जिसे देखकर स्वर्ग के निवासी भी रो उठे—मेरे पिता किस लोक मे गये हैं ? मेरे ज्येष्ठ भाई कहाँ गये हैं ? क्या यह सारा उत्पात देखने के लिए अकेला मैं ही आया हूँ ? हाय ! मेरे हृदय की इस वेदना को आप ही मिटाये।

भरत इस प्रकार लोट गये कि उनके कंधे धूलि से भर गये। वे बोले—मै अपने प्रभु (राम) के चरणो के दर्शन नही पा सका। क्या उन राम को जो इस पृथ्वी के स्वामी हैं, इस देश को छोड़कर जाना चाहिए था ? क्या आपने उनको वन जाने से रोका नही ? (आपने) यह भूल की।

२६४

कंब रामायण

(राम के प्रति ऐसा) क्रूर कृत्य करनेवाले सब लोग अभीतक मिटे नहीं हैं। इस सम्बन्ध में हम क्या कहे ? क्रूरा (कैकेयी) के गर्भ में उत्पन्न मैं प्राण त्याग करूँगा और अपने मन की पीडा को दूर करूँगा। भरत ने पीडित होकर यों कहा।

मरकतमय पर्वत के जैसे बढ़े हुए कंधोंवाले भरत ने फिर कहा—रथ पर आरूढ होकर संसार के अंधकार को दूर करनेवाले उस सूर्य से लेकर उज्ज्वल प्रकाश-युक्त इस पुरातन राजवंश में भरत नामक एक अपयशकारी कलंक भी उत्पन्न हुआ।

जानु तक लंबमान दीर्घ भुजाओंवाले धर्म-स्वरूपी भरत ने पुनः आगे कहा—करवालधारी दशरथ स्वर्ग सिधारे। उनके अनुपम ज्येष्ठ कुमार वन को सिधारे। ऐसे अवलंबों से रहित होकर यह कौशल देश घोर दुःख से पीडित होनेवाला है।

कुलीनता, क्षमा, पातिव्रत्य, इन गुणों से पूर्ण कौशल्या ने रोनेवाले पुरुषवर भरत को देखा और यह जानकर कि भरत में राज्य पाने की इच्छा नहीं है, उसका मन कलंक-रहित है, इसलिए उनका (भरत पर संदेह के कारण उत्पन्न) क्रोध दूर हो गया। फिर वे अधीर होकर बोलीं—

उन कौशल्या ने यह जाना कि भरत का निष्कलंक मन अपराध-जन्य पीडा से मुक्त है। अतः, उन (भरत) से बोलीं कि हे तात ! कदाचित् तुमको कैकेयी का छल विदित नहीं था।

कौशल्या के चरणों पर गिरे हुए भरत, उनके वह वचन सुनते ही, पकड़े गये सिंह के समान घबराकर उठे और रोते हुए ऐसी शपथें खाने लगे कि नित्य प्रवर्धमान धर्म-देवता भी उनकी बात सुनकर काँप उठा।

धर्म का विनाश करनेवाला, किंचित् भी दया से रहित, दूसरों के द्वार पर (उसकी नारी का अपहरण करने के लिए) खड़ा रहनेवाला, दूसरों पर क्रोध करनेवाला क्रूरता के साथ संसार के प्राणियों को मारकर जीवित रहनेवाला, विरागी महातपस्वियों के प्रति क्रूर कार्य करनेवाला,

'कुरा' आदि पुष्पों से भूषित केशोंवाली युवती को करवाल से मारनेवाला, राजा का साथी बनकर युद्ध-क्षेत्र में जाकर फिर भय से शत्रुओं को पीठ दिखाकर भागनेवाला, भिक्षा में स्वल्प धन माँगकर हाथ में रखनेवाले से उस धन को छीननेवाला,

पुष्ट तथा शीतल तुलसी की माला से भूषित भगवान् (विष्णु) के बारे में 'वह भगवान् परम तत्त्व नहीं है'—ऐसा वचन कहनेवाला, धर्म-मार्ग से न हटनेवाले ब्राह्मणों के प्रति अपराध करनेवाला तथा अपौरुषेय एवं त्रुटिहीन वेदों के संबंध में यह कहनेवाला कि 'कई व्यक्तियों की कल्पना-प्रसूत रचना ही वेद है',

अपनी माता के भूखी रहते हुए, स्वयं अपने पापिष्ठ उदर-कुहर को अन्न से भरने-वाला, अपने स्वामी को युद्ध-भूमि में छोड़कर भागनेवाला, ये सब लोग जिस नरक की आग में गिरते हैं, (यदि कैकेयी के षड्यन्त्र में मेरा भाग रहा हो, तो) मैं भी उसी नरक में गिरूँ।

अपने प्राणों के भय के कारण शरण में आये हुए की रक्षा न करनेवाला तथा धर्म को विस्मृत करके आचरण करनेवाला, जो नरक पाते हैं, उसी में मैं भी गिरूँ।

अयोध्याकाण्ड २६५

न्यायालय में झूठी साक्षी देनेवाला, युद्ध से डरकर भागनेवाले व्यक्ति के हाथ की वस्तुओं को स्वयं छिपकर छीन लेनेवाला, विपदा में पड़कर पीड़ित हुए व्यक्ति को और अधिक पीड़ा देनेवाला—ये लोग जिस नरक को पाते हैं, उसी में मैं भी गिरूँ।

ब्राह्मणों के निवास को आग से जलानेवाला, बालकों की हत्या करनेवाला, न्यायालय में (न्यायाधीश के पद से) दोषपूर्ण न्याय करनेवाला, देवताओं की निन्दा करनेवाला—ये लोग जो नरक पाते हैं, उसी में मैं भी पडूँ।

बछड़े को दूध पीने न देकर, उसको भूखा ही रखकर गाय का सब दूध दुहकर स्वयं पीनेवाला, भीड़ में दूसरों की वस्तुओं को चुरानेवाला, दूसरों के किये हुए उपकार को भूलकर उनकी निंदा करनेवाला, न्यायहीन जिह्वा से युक्त व्यक्ति—ये जो नरक पाते हैं, (अगर कैकेयी के षड्यंत्र में मेरा भाग रहा हो, तो) मुझे भी वही नरक मिले।

यात्रा में अपने साथ आनेवाली मधुरभाषिणी नारी के दूसरों के द्वारा सताये जाने पर स्वयं अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए उसे छोड़कर भाग जानेवाला, अपने पास रहनेवाले भूखे व्यक्तियों की भूख मिटाये बिना स्वयं भोजन करनेवाला—ये सब जिस दुर्गति को प्राप्त होते हैं, वही दुर्गति मेरी भी हो।

(यदि मेरे कहने से मेरी माँ ने राम को वन भेजा हो, तो) शस्त्रों से सुसज्जित होकर युद्ध करने के लिए युद्धक्षेत्र में जाकर अपने प्राणों के मोह में पड़कर शत्रुओं के सम्मुख युद्ध न करके शिर झुका देनेवाला तथा धर्म की सीमा लाँघकर (प्रजा से) धन संग्रह करनेवाला राजा—जो नरक पाते हैं, वही नरक मुझे भी मिले।

(यदि कैकेयी के षड्यंत्र में मेरा भी हाथ रहा हो, तो) उत्तम राज्य को पाकर मनमाना आचरण करते हुए नीच कार्य करनेवाले राजा के समान ही मैं भी परंपरा से प्राप्त धर्म का त्याग कर अपयशकारक अधर्म-मार्ग में चलनेवाला हो जाऊँ।

जो राजा, अपनी रक्षा में रहनेवाली प्रजा के व्याकुल होकर अस्त-व्यस्त होते हुए, 'वंशि' पुष्पों की विजयसूचक माला पहने हुए, शत्रु के सम्मुख 'वाहे' पुष्पों की माला¹ पहनकर खड़ा हो, उसकी जो दुर्गति होती है, वही दुर्गति मेरी हो।

(यदि कैकेयी के षड्यंत्र में मेरा भाग रहा हो, तो) कन्या का मान-भंग करने का प्रयत्न करनेवाला, गुरु-पत्नी की ओर कामुक दृष्टि डालनेवाला, मद्यपान करनेवाला, क्षुद्र चौर्य-कर्म से स्वर्ण प्राप्त करनेवाला (अर्थात्, सोना चुरानेवाला)—ये लोग जैसी दुर्गति पाते हैं, मैं भी वैसी ही दुर्गति पाऊँ।

उत्तम भोजन पदार्थ को कुत्ते-जैसे (अर्थात्, दूसरों से छिपाकर अकेले ही) खानेवाला, 'यह पुरुष नहीं, स्त्री भी नहीं है, यह शक्तिहीन नपुंसक है'—ऐसे अपयश का भाजन बनकर निर्लज्ज हो क्षुद्र कार्य करता हुआ जीवन व्यतीत करनेवाला, महात्माओं का कथन भूलकर सदा पापकर्म में रत रहनेवाला तथा सर्वदा दूसरों की निन्दा करते रहनेवाला—ये सब जो नरक पाते हैं, वही मुझे भी मिले।


¹ 'वंशि' पुष्पों की माला विजय-सूचक और 'वाहे' पुष्पों की माला पराजय-सूचक मानी गई है।—अनु०

२६६ | कंब रामायण

( यदि कैकेयी के षड्यन्त्र में मेरा हाथ हो, तो ) दोषहीन प्राचीन वंशों को कलंकित कहकर उनकी निंदा करनेवाला, अकाल के समय में दरिद्र लोगों के कमाये अन्न को बिखेर देनेवाला, सुगंधित भोजन पदार्थों को, समीपस्थ व्यक्तियों को दिये बिना, उनके मुँह में लार टपकाते हुए, स्वयं खानेवाला—जो गति पाते हैं, वही गति मुझे भी मिले।

जो व्यक्ति, धनुष से और करवाल से प्रकट किये जानेवाले पराक्रम को व्यर्थ करके, इस नश्वर शरीर को कुछ समय तक सुरक्षित रखने की लालसा से विरोधियों के घर में उनके द्वारा क्रोध के साथ दिये जानेवाले अन्न को अपने हाथ पसारकर माँगता हुआ रहता है, उसकी जो दुर्गति होती है, वही मेरी भी हो।

कोई व्यक्ति याचक से, उसकी माँगी हुई वस्तु 'मेरे पास है'—कहकर भी उसे न दे और यह भी न कहे कि 'मेरे पास वह वस्तु नहीं है'—ऐसे मूर्ख व्यक्ति को जो नरक मिलता है, वही नरक मुझे भी मिले।

( यदि राम को वन भेजने में मेरा हाथ रहा हो, तो ) जो व्यक्ति शत्रु-भयंकर करवाल को अपने दीर्घ हाथ में लेकर युद्धक्षेत्र में जाय और फिर व्याधियों के आवास, दुर्गंध से युक्त इस क्षुद्र देह को बचाने की इच्छा से, मोती-समान दाँतोंवाली युवती के देखते हुए, शत्रुओं के सम्मुख सिर झुका दे—उस व्यक्ति की जो दुर्गति होती है, वही मेरी भी हो।

विशाल गन्ने के खेतों तथा लाल धान के खेतों से युक्त जल-समृद्ध देश को, शत्रु के द्वारा हरण किये जाते देखकर भी जो व्यक्ति अपने प्राणों को बचाने के लिए बेड़ी में बँधे अपने चरणों के साथ शत्रु के सम्मुख खड़ा रहे, उसकी जो दुर्गति होती है, मेरी भी वही दुर्गति हो।

क्रूर कैकेयी के किये कार्य को यदि मैं जानता ही हूँ, तो मैं भी उन लोगों की दुर्गति को प्राप्त करूँ, जो धर्म से न हटनेवाले अपने पूर्वजों को दुःख देते हुए पाप-कर्म करते रहते हैं।

इस प्रकार अपने मन की निष्कलंकता को प्रकट करनेवाले भरत को देखकर कौशल्या यों आनंदित हुईं, जैसे राज्य त्यागकर वन को गये हुए राम को ही लौट आये हुए देख रही हों। उन्होंने आँसू बहानेवाले भरत को अपने गले से लगा लिया।

कपटहीन उत्तम स्वभाववाले भरत के कार्य को, तथा उनकी माता ( कैकेयी ) के पाप-स्वभाव को, पहचानकर दुःख की अधिकता से कौशल्या यों रोईं कि उनके पीन स्तनों से दूध टपकने लगा और उनका मुख सूज गया।

कौशल्या बोली—हे राजाधिराज ( भरत ) ! तुम्हारे कुल के मनु आदि अति पुरातन पूर्व पुरुषों में भी तुम्हारी समता करनेवाले कौन थे ? यों कहकर उन्होंने आशीर्वाद दिया। भरत बार-बार उनके वचन (अर्थात्, उनका भरत को राजाधिराज कहना) को स्मरण करके द्रवितचित्त होकर रो पड़े।

भरत के अनुज ( शत्रुघ्न ) ने भी, भरत के सद्गुणों को सोचकर प्रेम से पिघलने-वाली माता ( कौशल्या ) के चरणों पर नत हुआ और यथाविधि नमस्कार करके व्याकुल मन से खड़ा रहा। इसी समय वसिष्ठ मुनिवर वहाँ जा पहुँचे।

अयोध्याकाण्ड २६७

तब भरत उन महातपस्वी के चरणों पर गिरकर बोला—मेरे पिता कहाँ हैं ? बताइए। तब वसिष्ठ दुःख की अधिकता के कारण कुछ उत्तर न दे सके और व्याकुल हो आँखों से अश्रु बहाते हुए भरत को गले से लगा लिया।

वसिष्ठ ने कहा—हे दोष-रहित कुमार ! उदारगुणवाले तुम्हारे पिता के प्राण छोड़े, आज सात दिन हो गये। तुम पुत्रों के द्वारा किये जानेवाले कार्य (अंतिम क्रिया) करो। तब कौशल्या ने उनको (उस स्थान पर, जहाँ दशरथ की देह रखी थी) जाने की आज्ञा दी।

पिता की देह को देखने की अनुमति देनेवाली माता (कौशल्या) के चरणों को नमस्कार करके भरत, सुन्दर दीर्घ जटाओंवाले पवित्र वसिष्ठ मुनि के साथ चले और अपने प्राण देकर धर्म की रक्षा करनेवाले चक्रवर्ती दशरथ के अति प्रशंसित साकार धर्म-जैसे शरीर को देखा।

भरत दहाड़ मारकर रो पड़े और धरती पर गिर पड़े और महिमामय आज्ञाचक्र को प्रवर्त्तित करनेवाले (दशरथ) के तैल-पात्र में रखे हुए सोने के रंग के शरीर को अश्रुओं से धो दिया।

चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों ने आदर के साथ दशरथ के शरीर को उस स्थान से अपने हाथ से उठाया और स्वर्ण से निर्मित एक विमान में रखा। तब राजा के योग्य नगाड़े बजने लगे।

नगर के लोग, वेला में बँधे समुद्र के समान रुदन से उत्पन्न ध्वनि करते हुए व्याकुलप्राण हो रहे। राजाओं का समूह चारों ओर हाथ जोड़कर खड़ा रहा। ऐसे समय में, गले में रस्सी से युक्त एक हाथी पर उस देह को रखकर लोग ले चले।

सुन्दर तथा विशाल रथ को चलानेवाले सुमंत्र के साथ, मंत्रणा करने में निपुण मंत्री तथा अनुपम सेनापति, मित्रवर्ग तथा अन्य लोग व्याकुल हो चारों ओर से रो रहे थे।

शंख, पटल, शृङ्गी आदि वाद्य सब दिशाओं में उसी प्रकार बज उठे, जिस प्रकार मेघों के आश्रय बननेवाले ऊँचे प्रासादों से युक्त उस नगर की स्त्रियाँ, अपने उमड़ते नेत्रों पर हाथ से मारती हुई रो रही थीं।

घोड़े, हाथी, उज्ज्वल रथ, राजा, चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण, उस देह को लेकर, दशरथ की रानियों के साथ, स्वच्छ वीचियों से पूर्ण जल से समृद्ध सरयू नदी पर जा पहुँचे।

शास्त्रज्ञ पुरोहितों ने यथाविधि सब कर्म कराके चिता सजाई। उस पर दशरथ की देह को रखा। फिर भरत से कहा—हे वीर ! शास्त्रोक्त विधान के अनुसार तुम अपने पिता का अंतिम संस्कार पूर्ण करो।

यों कहने पर भरत पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए प्रस्तुत हुए। उस समय उनको देखकर वसिष्ठ ने कहा—तुम्हारी माता के दुर्गुण के कारण चक्रवर्ती (दशरथ) अत्यंत पीड़ित होकर, तुमको भी त्याग कर (अर्थात्, तुम्हारे पुत्रत्व-संबंध को तोड़कर) चल बसे।

२६८ कंब रामायण

हे उत्तम कुमार । मानो यह दिखाने के लिए ही कि तुम्हारे जन्म से परंपरा से आगत धर्म परिवर्तित हो गया है, तुमको त्यागकर वे मृत हुए। यह वचन सुनकर भरत मृत-से हो गये। ऐसा लगा कि वहाँ जो खडे थे, असली भरत नही थे, कोई और थे।

महान् तपस्वी यों कहकर निःश्वास भरते खडे रहे । तब, पर्वताकार कंधोवाले भरत, 'अच्छा है, अच्छा है !'—कहकर मुस्करा उठे ।

जैसे काला सर्प घोर वज्र-घोष से भीत होकर काँप उठा हो, उसी प्रकार भरत काँपकर धरती पर गिर पडे । उनका मन बडी व्याकुलता से तड़प उठा । उनके हृदय का दुःख रोकने पर भी न रुकता था । वे आँसू बहाते हुए कहने लगे—

मृतक-सस्कार करने का अधिकार मुझे नही था । ऐसा मै क्या राज्य का शासन करने की योग्यता रखता हूँ ? सूर्यकुल मे उत्पन्न मेरे पिता से पूर्व उत्पन्न राजाओ मे मुझ से बढकर कीर्त्तिमान् कौन हुए ?

हे कमलभव ( ब्रह्मा ) के पुत्र ( वसिष्ठ ) ! मेरे पूर्वज दोषरहित, धर्म के अप्रतिकूल मार्ग पर चलकर स्वर्ग मे गये । पर मै तो अपने बालकपन मे ही व्यर्थ जीवन धारण करने-वाला हो गया हूँ । हाय !

मै घने पत्तो से युक्त प्रसिद्ध केतकी-पुष्पो के मध्य स्थित रहकर निस्सार तथा गधहीन वस्तु के समान हो गया हूँ । मुझे जन्म देनेवाली मेरी जननी ने मेरा जो उपकार किया है, वह ( उपकार ) भी कैसा है ।

चारों वेदों मे प्रतिपादित विधान के अनुसार सब कार्य कराने मे समर्थ वसिष्ठ उपर्युक्त प्रकार से कहकर दुःखी हो खडे रहनेवाले, पुष्पमाला-भूषित भरत के अनुज (शत्रुघ्न) के द्वारा उस समय यथाविधि प्रेत-सस्कार कराया । १

उत्तम पुष्पलता-सदृश राजपत्नियों अपने हार, आभरण तथा लचकनेवाली कटि के चमकते हुए, इस प्रकार चिता की अग्नि में प्रविष्ट हुईं, जिस प्रकार पर्वत-कंदरा मे निवास करनेवाले कलापियो का समुदाय पत्रहीन कमल पुष्पो से भरे जलाशय मे प्रविष्ट हुआ हो । ( भाव है, प्रधान महिषी कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा इनके अतिरिक्त अन्य सब पत्नियो ने सहगमन किया ) ।

उन स्त्रियो के वदन कमल-पुष्प तथा चन्द्र के समान शोभायमान हो रहे थे । चिता की अग्नि, उनके पति ( दशरथ ) का देह-स्पर्श करके अत्यत शीतल लग रही थी । वे राज-पत्नियों मन की पीडा से रहित होकर, पति के साथ सहगमन करनेवाली नारियों की सद्गति को प्राप्त हुईं ।

इसके पश्चात् भरत ने शत्रुघ्न के द्वारा पिता के सब सस्कार कराये । फिर, माता के क्रूर कृत्य के कारण क्षत्रियोचित जीवन से वंचित होकर उपमाहीन शोक-रूपी समुद्र के साथ अपने निवास मे जा पहुँचे ।


१. राजा दशरथ ने कहा था कि कैकेयी को मै त्याग देता हूँ, भरत को भी मै अपना पुत्र नही मानता । इसी कारण से वसिष्ठ मुनि ने शत्रुघ्न से दशरथ का अग्नि-सस्कार कराया ।—अनु०

अयोध्याकाण्ड २६१

चक्रवर्त्ती के कुमार ने दस दिन तक किये जानेवाले पितृकर्म को, एक-एक दिन को एक-एक युग के समान व्यतीत करते हुए तथा अत्यन्त वेदना के साथ, शास्त्रोक्त विधान से पूर्ण किया।

सब पितृ-संस्कार पूर्ण कराके, अपने कार्य-भार से मुक्त होकर महान् तपस्वी वसिष्ठ त्रिसूत्रयुक्त यज्ञोपवीत से शोभायमान ब्राह्मणो के द्वारा अनुसृत होते हुए, विजयी भाले को धारण करनेवाले भरत के निकट पहुँचे।

कुल-क्रमागत मंत्री यह विचार कर कि बिना राजा के राज्य का रहना उचित नहीं है, भरत को राजा बनाने का दृढ निश्चय करके, उस राज्य के बडे ज्ञानवान् लोगों को साथ लेकर आये। ( १—१४५ )

अध्याय १०

वन-प्रस्थान पटल

मन्त्रणा-कुशल मंत्री (भरत के प्रति) प्रेम से भरे हृदय के साथ यह सोचते हुए कि परम्परा से प्राप्त वेदों को अधिगत करनेवाले तथा तपस्या के सब तत्त्वों को जाननेवाले वसिष्ठ उस राजसभा में उपस्थित हैं, शीघ्र सभा मे आ पहुँचे और भरत को नमस्कार किया।

तपस्या के प्रभाव से गगन मे भी संचरण करने की शक्ति रखनेवाले मुनियो के साथ मंत्री, नगर के लोग, सेनापति, राजा तथा सब बुद्धिमान् एवं विवेकी पुरुष, सुन्दर वीर (भरत) को यथाक्रम घेरकर बैठ गये।

जब सब लोग इस प्रकार बैठे हुए थे, तब ज्ञानी तथा रथ चलाने मे दक्ष सुमन्त्र ने विजयी चक्रवर्ती के कुमार (भरत) को अपने मन के विचार सूचित करने के उद्देश्य से सर्वज्ञ मुनिवर (वसिष्ठ) के मुख की ओर देखा।

तपस्वी वसिष्ठ ने सुमन्त्र के अपनी ओर देखने से, वचनों के बिना ही, उसके मन के आशय को जान लिया। फिर चक्रवर्ती के कुमार से बोले—राज्य की रक्षा करो। यही तुम्हारा कर्त्तव्य है।

(वसिष्ठ ने भरत से कहा—) हे दोष-रहित ! गुणवान्, वेदज्ञ, अपूर्व तपस्या-सपन्न, वृद्ध, नरेश आदि जो तुम्हारे पास आये हैं, इनके आगमन का प्रयोजन यही है कि नीति तथा धर्म को स्थिर बनायें (और उसके लिए तुम्हे राजा बनाये)। तुम इस बात को अपने मन मे समझ लो।

धर्म नामक अनुपम वस्तु का सबसे आचरण कराना तथा उसको स्थापित करना कठिन कार्य है। हे तात ! तुम इस विषय को भली भाँति समझ लो। यह धर्म इहलोक ओर परलोक—दोनो को प्रदान करनेवाला है। स्वच्छ चित्तवाले ही इसका पालन कर सकते हैं।

२७० | कंब रामायण

विचार करने पर विदित होता है कि कटि में दृढ़ करवाल धारण करनेवाले राजा के अभाव में यह संसार सब की इच्छा के पात्र सूर्य से विहीन दिन-जैसा होता है; नक्षत्रों से घिरे हुए चंद्र से विहीन रात्रि-जैसी होती है तथा अपने अंतर में प्राणों से विहीन शरीर-जैसा होता है।

देवलोक में अत्याचार करनेवाले बलवान् असुरों के देश में, तथा लोक कहलाने-वाले सब प्रदेशों में, रक्षा करनेवाले राजा के बिना कोई कार्य नहीं होता है। यह हम देखते हैं।

उचित रीति से विचार करने पर विदित होता है कि ब्रह्मा के द्वारा बनाये गये धरती तथा स्वर्ग में निवास करनेवाले जंगम तथा स्थावर पदार्थ कभी शासक बिना नहीं रहते।

कमलभव ब्रह्मा से लेकर सब पुण्य पुरुषों ने जिस वंश की प्रशंसा की है, ऐसे (तुम्हारे) वंश के लोगों ने अबतक इस संसार की रक्षा की है। अब ऐसे रक्षक के अभाव में यह संसार, उज्ज्वल समुद्र में टूटी हुई नौका के समान हो गया है।

हे तात ! तुम्हारे पिता स्वर्ग सिधारे। तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता राज्य छोड़कर चले गये। अनन्त वैभव से युक्त यह विशाल राज्य तुम्हारी माता के वर से तुम्हें मिला है, इस राज्य पर तुम शासन करो। यही हमारी सलाह है—यों वसिष्ठ ने कहा।

ज्यों ही मुनिवर वसिष्ठ ने कहा कि इस राज्य पर तुम शासन करो, त्यों ही भरत अपने नेत्रों से निर्झर के समान अश्रुधारा बहाते हुए, 'विष खाओ' कहने से भयभीत होकर काँपनेवाले से भी अधिक भीत होकर काँप उठे।

(वसिष्ठ के वचन सुनकर) भरत का मन काँप उठा। कंठ गद्गद हो उठा। नयन मुकुलित हो गये। स्त्रियों के जैसे ही उनका हृदय द्रवित हो उठा। उनके प्राण व्याकुल हुए। कुछ काल यों मूर्च्छित रहने के बाद जब उनमें संज्ञा आई, तब वे उस सभा में स्थित लोगों से अपने विचार कहने लगे—

तीनों लोकों के आदिकारण बने हुए, मेरे ज्येष्ठ भ्राता बनकर उत्पन्न हुए (श्रीराम) के रहते हुए मैं राज्य करूँ। अहो! यह श्रेष्ठ पुरुषों का धर्मोपदेश हो गया। फिर तो अब मेरी जननी के कार्य में भी कोई दोष नहीं रहा।

क्रूरता से युक्त मेरी जननी ने जो कार्य किया, उसके बारे में, सदाचार में निरत आपलोग कहते हैं कि यह उचित है। क्या इस समय, कृतयुग के पश्चात् आनेवाले दोनों युग (द्वापर और त्रेता युग) व्यतीत होकर अंतिम युग (कलियुग) ही आ गया है?

कमलभव ब्रह्मा के सब लोकों में क्या कहीं भी बड़े भाई के रहते हुए छोटा भाई यथाविधि राज्य का शासन करता है?—राजसभा में रहनेवाले आपलोग ही बतायें।

कदाचित् आपलोग इस कार्य को न्याय-संगत भी प्रमाणित कर दें, तो भी मैं इस संसार के प्राणियों के शासन-भार को वहन करता हुआ जीवित नहीं रहूँगा। किन्तु, मैं उनको (अर्थात् - राम को) ले आऊँगा और पुष्पमाला-भूषित किरीट, आदि काल से आगत नीति के अनुसार, उन्हीं को पहनाऊँगा। यह आप देखेंगे।

अयोध्याकाण्ड २७१

यदि मैं उन (राम) को नहीं ले आ सकूँगा, तो दुर्गम अरण्य में रहकर यथाविधि कठोर तपस्या करूँगा। यदि और कोई बात कहकर आपलोग मुझे विवश करने का प्रयत्न करेंगे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा—इस प्रकार भरत ने कहा।

महिमा में श्रेष्ठ चक्रवर्त्ती (दशरथ) जीवित रहते समय भी प्रभु (राम) ने रत्नमय किरीट को धारण करना स्वीकार किया। किन्तु, हे उत्तमशील भरत ! तुम तो, पिता के स्वर्ग-गमन के कारण प्राप्त हुए राज्य को भी अस्वीकार कर रहे हो। राजकुल के पुत्रों में तुम्हारे समान (त्यागी) कौन है ?

आज्ञा-चक्र प्रवर्त्तित करना (अर्थात्, न्याय-पूर्ण शासन करना), धर्म की रक्षा करना, यज्ञ करना—इनके द्वारा तुम्हें अपना यश बढ़ाना आवश्यक नहीं है। चतुर्दश भुवन मिट जाने पर भी तुम्हारा बड़ा यश शाश्वत रहेगा—इस प्रकार कहकर उन सभासदों ने भरत को आशीर्वाद दिये।

भरत ने अपने अनुज (शत्रुघ्न) को बुलाकर कहा—मेघ-गर्जन के समान नगाड़े की ध्वनि करके, यह घोषणा कराओ कि इस राज्य के धार्मिक प्रभु (राम) को हम लौटा ले आनेवाले हैं और सारी सेना को यात्रा के लिए तैयार करो।

सद्गुण भरत की आज्ञा से शत्रुघ्न ने वैसी घोषणा करा दी, तब दुःख में डूबे हुए उस विशाल नगर के लोग यों आनन्द-घोष कर उठे कि मानो उनके प्राणहीन शरीरों पर वचनरूपी अमृत छिड़क दिया गया हो।

‘रामचन्द्र स्वर्णमुकुट धारण करनेवाले हैं’—यह घोषणा होते ही पंचेन्द्रियों का दमन करनेवाले मुनियों से लेकर सभी लोग महान् आनन्द से भर गये। (रामचन्द्र को लौटा लाने की) वह समाचार कानों के लिए दिव्य अमृत ही था।

‘भरत अपने ज्येष्ठ भ्राता को ध्वजाओं से अलंकृत नगर में ले आनेवाले हैं, उनको ले आने के लिए सेनाएँ भी जायेंगी’—नगाड़े बजा-बजाकर इस प्रकार की जो घोषणा की जा रही थी, वह उस वैभवपूर्ण अयोध्या नामक महा-समुद्र में चंद्र के उदय होने के समान थी।

वह बड़ी सेना युगान्त में उमड़नेवाले सप्त समुद्रों के समान उमड़ उठी और घोर शब्द करती हुई आगे बढ़ चली। उसमें कैकेयी की कामना समूल विनष्ट हो गई। नगर के लोग भी प्रेम से उमड़ उठे और उनका (रामचंद्र के वियोग से उत्पन्न) दुःख मिट गया।

अलंकारों से सजे हुए घोड़े, हाथी और रथ, धरती को ढककर छा गये। सेना की अत्युन्नत ध्वजाएँ आकाश-तल को ढककर छा गईं। ऊपर उठी हुई धूल कमलभव ब्रह्मा के भी नयनों को ढककर उन्हें अंधा बनाने लगी।

इन्द्रदेव जिस समय इस सृष्टि का अंत करता है, उस समय उठनेवाली ध्वनि से भी अधिक (भयंकर) ध्वनि उत्पन्न हुई। अकलंक रामचन्द्र के दर्शन करने के लिए उठनेवाली उमंग से भी अधिक उल्लसित होकर वह विशाल सेना उमड़ने लगी।

उस सेना का एक अति विशाल सूँड़वाला हाथी अपनी हथिनी के साथ इस प्रकार जा रहा था, मानो राज्य के जैसे ही उस नगर का त्याग कर विविध वृक्षों से