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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

अयोध्याकाण्ड २५३

अग्नि मे तप्त, तैल से अर्चित अति तीक्ष्ण बरछे-जैसे अंजनाच्चित एव यम को भी व्याकुल करनेवाले नयनो से शोभायमान, हे सुन्दरी ! देखो, ( बच्चे देने की ) पीडा से युक्त हथिनियो को हाथी अपनी सूँड़ो का सहारा दे रहे हैं।

विष-स्वभाववाले नयनो से युक्त हे देवी ! तुम्हारी कटि को देखकर उसे बिजली समझकर, फनवाले सर्प डर जाते हैं और तड़पकर बिल में घुस जाते हैं । मदपूर्ण घटवाले हाथी, मेघ-गर्जन को सुनकर सिंह-गर्जन समझकर डर जाते हैं और अस्त-व्यस्त हो भागने लगते हैं।

गृहस्थी में रहकर ही सप्त व्रतों का पालन करनेवाले चक्रवर्ती के पुत्र ( राम ) ने, आभरणो से भूषित (सीता) देवी को इस प्रकार के अनेक दृश्य, उनका वर्णन करके दिखाये। फिर, उनका स्वागत करने के लिए सम्मुख आये हुए मुनियो को नमस्कार करके उन पाप-रहित मुनियो के अतिथि बने।

महिमामय सुन्दर तुलसी-मालाधारी भगवान् ( विष्णु ) ने वैर से युक्त अंधकार-सदृश राक्षस-कुल के विनाश की कामना करके कालनेमि¹ नामक राक्षस पर ही अपना चक्र चलाया है, इस प्रकार ( का दृश्य उपस्थित करते हुए ) सूर्य अस्ताचल पर जा पहुँचा।

जब विष्णु का चक्र असुर ( कालनेमि ) के शरीर मे जाकर लगा था, तब उसके शरीर से निकले हुए अत्यधिक रक्त प्रवाह के समान ही आकाश में सर्वत्र लाली फैल गई और उस राक्षस के मुँह से गिरे हुए वक्र दंत के समान ही चंद्रकला प्रकाशमान हो गई।

सूर्य के अस्त होने पर, कमलपुष्प, स्त्रियो को वदन की शोभा प्रदान करके मुकुलित हो गये। आकाश-रूपी जलाशय में सर्वत्र श्वेतवर्ण कुमुद-रूपी नक्षत्र चमक उठे।

उस समय वानर और वानरियाँ वृक्षो की ओर बढे, हाथी और हथिनियाँ जलाशयों की ओर बढे, सुन्दर पक्षी घोंसलो की ओर बढे और तत्त्वज्ञान से संपन्न प्रभु (राम) मध्याकालीन कार्यों की ओर बढ़े (अर्थात्, सायकालीन कृत्यो को करने गये)।

घने दलोवाले सुगन्धित पुष्पो में से कुछ बंद हुए। निर्दोष तथा सुगंध से भरे पुष्पो मे से कुछ विकमित हुए, प्रभु के साथ, अनुज ( लक्ष्मण ) तथा अमृत-समान (सीता) देवी के कर एव नेत्र भी कमलपुष्पो के समान ही बद हुए ( अर्थात्, वे तीनो हाथ जोड़कर और नयन बद करके भगवान् का ध्यान करने लगे) ।

सध्याकाल व्यतीत होने पर (रात्रि के आगमन पर) उत्तम स्वभाववाले, लक्ष्मण ने, अनघ राम तथा उनकी सूक्ष्म कटिवाली देवी के निवास के लिए विचार करके वहाँ किस प्रकार से एक पर्णशाला बनाई, हम उसका वर्णन करेंगे।

लक्ष्मण ने छोटे-छोटे बाँस के टुकड़ो को लेकर खड़ा किया और फिर वक्रता से हीन सीधे तथा लंबे बाँसो को उनपर आड़े रखा। फिर उनपर शहतीरो की तरह बाँसो को रखकर ठाट बनाई और उनपर पत्ते विछाये।


१ कालनेमि हिरण्यकशिपु का एक पुत्र था। उसके एक सौ सिर और एक सौ हाथ थे। विष्णु के द्वारा अपने पिता के मारे जाने पर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और देवो को परास्त करके अपना पराक्रम दिखाने लगा। तब विष्णु भगवान् ने चक्र प्रयोग करके उसके सिर और हाथो को काट डाला।