कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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कंब रामायण
छप्पर पर शालवृक्ष के पत्ते बिछाये और उन्हें मूंज से बाँध दिया। नीचे खड़े किये बाँसो के टुकड़ो के बीच में मिट्टी भरकर दीवारे खड़ी की और उनपर जल छिड़ककर ( दीवारों को ) समतल बनाया।
पर्णशाला के भीतर शास्त्रोक्त रीति से राम और सीता के ( सोने के ) लिए अलग-अलग आसन बनाये, लाल कुंकुम की मिट्टी से उन्हें लीपा और दीवारो मे भीतर की ओर नदी मे उत्पन्न रत्न और मोती चिपकाये।
( पर्णकुटीर के भीतर ) मयूर-पंखो का एक वितान लगाया। अपनी छुरी से काट-काटकर लटकनेवाले तोरण बनाकर लगाये और नदी-तट के बाँसों को काटकर उस पर्णशाला के चारों ओर एक प्राचीर ( बाड़ ) भी बनाया।
वह प्रभु, जो चतुर्मुख के हृदय मे एव हम जैसे अज्ञ लोगो के हृदयो में एक समान ही रहता है, स्वर्णमय देह कांति से युक्त लक्ष्मी-समान सीता देवी के साथ अपने अनुज के द्वारा इस प्रकार निर्मित पर्णकुटीर में प्रविष्ट हुए।
ज्ञानियो का अविद्या-रहित हृदय है, महिमामय वेद है, या पवित्र क्षीर-सागर है, या बैकुंठधाम ही है—यो कहने योग्य उस पर्णकुटीर मे अगाध प्रेम से प्राप्त होनेवाले प्रभु ( राम ), प्रेम-पूर्ण मन में आनदित होकर निवास करने लगे।
सीता देवी के, पुष्प से भी कोमल, चरण काँटो और कंकड़ो से भरे अरण्य में चले, मेरे दोषहीन भाई के करो ने यह पर्णशाला बना दी। अहो! जिन्हें कोई सहायक नही होता, उन्हें भी कौन-सी वस्तु अप्राप्य होती है? ( भाव यह है—निस्सहाय व्यक्ति के लिए उसके समीपस्थ पदार्थ ही सब आवश्यकताएँ पूर्ण करते हैं।)
यह विचार करके फिर राम ने अपने अनुज से कहा—दो पर्वतो के समान पुष्ट कंधोवाले। तुमने ऐसी सुन्दर पर्णशाला बनाना कब सीखा? उस समय उनके कमल-समान विशाल नयनो से अश्रु-बिंदु बरस पडे।
अपार संपत्ति को प्रदान करनेवाले ( दशरथ ) की आज्ञा से वन मे आकर उत्तम धर्म का पालन करते हुए मैने सूर्य के समान उज्ज्वल सत्य-रूपी यश को प्राप्त किया, ऐसा कहने मे क्या तथ्य है? मै तो अनेक दिनो से तुमको कष्ट ही देता आ रहा हूँ। इस प्रकार, राम ने बड़ी मनोवेदना के साथ कहा।
प्रभु के यह कहने पर लक्ष्मण ने चिंतित होकर उनकी ओर देखा और कहा—हे मेरे पितृ-तुल्य! ( हमारे ) कष्टों का अंकुर तो पहले ही ( अर्थात्, जब कैकेयी को दशरथ ने वर दिये ) फूट निकला था। ( भाव यह है, हमारे इन कष्टो का कारण आप नही हैं। इनका कारण कैकेयी का वर ही है, अतः आप चिंतित न हो।)
फिर, रामचन्द्र ने मन में सोचा—जो हो, अब मुझे और कुछ नही करना है। अब ( लक्ष्मण के कष्टो को देखकर ) मैं धर्म के मार्ग को छोड़कर नही जा सकता। फिर, अपने ज्येष्ठ भ्राता की सेवा मे आनन्द पानेवाले लक्ष्मण की इस मानसिक ताप को ( कि मेरे बड़े भाई वनवास का कष्ट भोग रहे हैं ) जानकर राम सोचने लगे—इस ( लक्ष्मण ) के मानसिक कष्ट को दूर करना असम्भव है।