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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 549 में से

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पृष्ठ 276

२६६ | कंब रामायण

( यदि कैकेयी के षड्यन्त्र में मेरा हाथ हो, तो ) दोषहीन प्राचीन वंशों को कलंकित कहकर उनकी निंदा करनेवाला, अकाल के समय में दरिद्र लोगों के कमाये अन्न को बिखेर देनेवाला, सुगंधित भोजन पदार्थों को, समीपस्थ व्यक्तियों को दिये बिना, उनके मुँह में लार टपकाते हुए, स्वयं खानेवाला—जो गति पाते हैं, वही गति मुझे भी मिले।

जो व्यक्ति, धनुष से और करवाल से प्रकट किये जानेवाले पराक्रम को व्यर्थ करके, इस नश्वर शरीर को कुछ समय तक सुरक्षित रखने की लालसा से विरोधियों के घर में उनके द्वारा क्रोध के साथ दिये जानेवाले अन्न को अपने हाथ पसारकर माँगता हुआ रहता है, उसकी जो दुर्गति होती है, वही मेरी भी हो।

कोई व्यक्ति याचक से, उसकी माँगी हुई वस्तु 'मेरे पास है'—कहकर भी उसे न दे और यह भी न कहे कि 'मेरे पास वह वस्तु नहीं है'—ऐसे मूर्ख व्यक्ति को जो नरक मिलता है, वही नरक मुझे भी मिले।

( यदि राम को वन भेजने में मेरा हाथ रहा हो, तो ) जो व्यक्ति शत्रु-भयंकर करवाल को अपने दीर्घ हाथ में लेकर युद्धक्षेत्र में जाय और फिर व्याधियों के आवास, दुर्गंध से युक्त इस क्षुद्र देह को बचाने की इच्छा से, मोती-समान दाँतोंवाली युवती के देखते हुए, शत्रुओं के सम्मुख सिर झुका दे—उस व्यक्ति की जो दुर्गति होती है, वही मेरी भी हो।

विशाल गन्ने के खेतों तथा लाल धान के खेतों से युक्त जल-समृद्ध देश को, शत्रु के द्वारा हरण किये जाते देखकर भी जो व्यक्ति अपने प्राणों को बचाने के लिए बेड़ी में बँधे अपने चरणों के साथ शत्रु के सम्मुख खड़ा रहे, उसकी जो दुर्गति होती है, मेरी भी वही दुर्गति हो।

क्रूर कैकेयी के किये कार्य को यदि मैं जानता ही हूँ, तो मैं भी उन लोगों की दुर्गति को प्राप्त करूँ, जो धर्म से न हटनेवाले अपने पूर्वजों को दुःख देते हुए पाप-कर्म करते रहते हैं।

इस प्रकार अपने मन की निष्कलंकता को प्रकट करनेवाले भरत को देखकर कौशल्या यों आनंदित हुईं, जैसे राज्य त्यागकर वन को गये हुए राम को ही लौट आये हुए देख रही हों। उन्होंने आँसू बहानेवाले भरत को अपने गले से लगा लिया।

कपटहीन उत्तम स्वभाववाले भरत के कार्य को, तथा उनकी माता ( कैकेयी ) के पाप-स्वभाव को, पहचानकर दुःख की अधिकता से कौशल्या यों रोईं कि उनके पीन स्तनों से दूध टपकने लगा और उनका मुख सूज गया।

कौशल्या बोली—हे राजाधिराज ( भरत ) ! तुम्हारे कुल के मनु आदि अति पुरातन पूर्व पुरुषों में भी तुम्हारी समता करनेवाले कौन थे ? यों कहकर उन्होंने आशीर्वाद दिया। भरत बार-बार उनके वचन (अर्थात्, उनका भरत को राजाधिराज कहना) को स्मरण करके द्रवितचित्त होकर रो पड़े।

भरत के अनुज ( शत्रुघ्न ) ने भी, भरत के सद्गुणों को सोचकर प्रेम से पिघलने-वाली माता ( कौशल्या ) के चरणों पर नत हुआ और यथाविधि नमस्कार करके व्याकुल मन से खड़ा रहा। इसी समय वसिष्ठ मुनिवर वहाँ जा पहुँचे।

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