कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड २६७
तब भरत उन महातपस्वी के चरणों पर गिरकर बोला—मेरे पिता कहाँ हैं ? बताइए। तब वसिष्ठ दुःख की अधिकता के कारण कुछ उत्तर न दे सके और व्याकुल हो आँखों से अश्रु बहाते हुए भरत को गले से लगा लिया।
वसिष्ठ ने कहा—हे दोष-रहित कुमार ! उदारगुणवाले तुम्हारे पिता के प्राण छोड़े, आज सात दिन हो गये। तुम पुत्रों के द्वारा किये जानेवाले कार्य (अंतिम क्रिया) करो। तब कौशल्या ने उनको (उस स्थान पर, जहाँ दशरथ की देह रखी थी) जाने की आज्ञा दी।
पिता की देह को देखने की अनुमति देनेवाली माता (कौशल्या) के चरणों को नमस्कार करके भरत, सुन्दर दीर्घ जटाओंवाले पवित्र वसिष्ठ मुनि के साथ चले और अपने प्राण देकर धर्म की रक्षा करनेवाले चक्रवर्ती दशरथ के अति प्रशंसित साकार धर्म-जैसे शरीर को देखा।
भरत दहाड़ मारकर रो पड़े और धरती पर गिर पड़े और महिमामय आज्ञाचक्र को प्रवर्त्तित करनेवाले (दशरथ) के तैल-पात्र में रखे हुए सोने के रंग के शरीर को अश्रुओं से धो दिया।
चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों ने आदर के साथ दशरथ के शरीर को उस स्थान से अपने हाथ से उठाया और स्वर्ण से निर्मित एक विमान में रखा। तब राजा के योग्य नगाड़े बजने लगे।
नगर के लोग, वेला में बँधे समुद्र के समान रुदन से उत्पन्न ध्वनि करते हुए व्याकुलप्राण हो रहे। राजाओं का समूह चारों ओर हाथ जोड़कर खड़ा रहा। ऐसे समय में, गले में रस्सी से युक्त एक हाथी पर उस देह को रखकर लोग ले चले।
सुन्दर तथा विशाल रथ को चलानेवाले सुमंत्र के साथ, मंत्रणा करने में निपुण मंत्री तथा अनुपम सेनापति, मित्रवर्ग तथा अन्य लोग व्याकुल हो चारों ओर से रो रहे थे।
शंख, पटल, शृङ्गी आदि वाद्य सब दिशाओं में उसी प्रकार बज उठे, जिस प्रकार मेघों के आश्रय बननेवाले ऊँचे प्रासादों से युक्त उस नगर की स्त्रियाँ, अपने उमड़ते नेत्रों पर हाथ से मारती हुई रो रही थीं।
घोड़े, हाथी, उज्ज्वल रथ, राजा, चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण, उस देह को लेकर, दशरथ की रानियों के साथ, स्वच्छ वीचियों से पूर्ण जल से समृद्ध सरयू नदी पर जा पहुँचे।
शास्त्रज्ञ पुरोहितों ने यथाविधि सब कर्म कराके चिता सजाई। उस पर दशरथ की देह को रखा। फिर भरत से कहा—हे वीर ! शास्त्रोक्त विधान के अनुसार तुम अपने पिता का अंतिम संस्कार पूर्ण करो।
यों कहने पर भरत पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए प्रस्तुत हुए। उस समय उनको देखकर वसिष्ठ ने कहा—तुम्हारी माता के दुर्गुण के कारण चक्रवर्ती (दशरथ) अत्यंत पीड़ित होकर, तुमको भी त्याग कर (अर्थात्, तुम्हारे पुत्रत्व-संबंध को तोड़कर) चल बसे।