भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 549 में से

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पृष्ठ 278

२६८ कंब रामायण

हे उत्तम कुमार । मानो यह दिखाने के लिए ही कि तुम्हारे जन्म से परंपरा से आगत धर्म परिवर्तित हो गया है, तुमको त्यागकर वे मृत हुए। यह वचन सुनकर भरत मृत-से हो गये। ऐसा लगा कि वहाँ जो खडे थे, असली भरत नही थे, कोई और थे।

महान् तपस्वी यों कहकर निःश्वास भरते खडे रहे । तब, पर्वताकार कंधोवाले भरत, 'अच्छा है, अच्छा है !'—कहकर मुस्करा उठे ।

जैसे काला सर्प घोर वज्र-घोष से भीत होकर काँप उठा हो, उसी प्रकार भरत काँपकर धरती पर गिर पडे । उनका मन बडी व्याकुलता से तड़प उठा । उनके हृदय का दुःख रोकने पर भी न रुकता था । वे आँसू बहाते हुए कहने लगे—

मृतक-सस्कार करने का अधिकार मुझे नही था । ऐसा मै क्या राज्य का शासन करने की योग्यता रखता हूँ ? सूर्यकुल मे उत्पन्न मेरे पिता से पूर्व उत्पन्न राजाओ मे मुझ से बढकर कीर्त्तिमान् कौन हुए ?

हे कमलभव ( ब्रह्मा ) के पुत्र ( वसिष्ठ ) ! मेरे पूर्वज दोषरहित, धर्म के अप्रतिकूल मार्ग पर चलकर स्वर्ग मे गये । पर मै तो अपने बालकपन मे ही व्यर्थ जीवन धारण करने-वाला हो गया हूँ । हाय !

मै घने पत्तो से युक्त प्रसिद्ध केतकी-पुष्पो के मध्य स्थित रहकर निस्सार तथा गधहीन वस्तु के समान हो गया हूँ । मुझे जन्म देनेवाली मेरी जननी ने मेरा जो उपकार किया है, वह ( उपकार ) भी कैसा है ।

चारों वेदों मे प्रतिपादित विधान के अनुसार सब कार्य कराने मे समर्थ वसिष्ठ उपर्युक्त प्रकार से कहकर दुःखी हो खडे रहनेवाले, पुष्पमाला-भूषित भरत के अनुज (शत्रुघ्न) के द्वारा उस समय यथाविधि प्रेत-सस्कार कराया । १

उत्तम पुष्पलता-सदृश राजपत्नियों अपने हार, आभरण तथा लचकनेवाली कटि के चमकते हुए, इस प्रकार चिता की अग्नि में प्रविष्ट हुईं, जिस प्रकार पर्वत-कंदरा मे निवास करनेवाले कलापियो का समुदाय पत्रहीन कमल पुष्पो से भरे जलाशय मे प्रविष्ट हुआ हो । ( भाव है, प्रधान महिषी कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा इनके अतिरिक्त अन्य सब पत्नियो ने सहगमन किया ) ।

उन स्त्रियो के वदन कमल-पुष्प तथा चन्द्र के समान शोभायमान हो रहे थे । चिता की अग्नि, उनके पति ( दशरथ ) का देह-स्पर्श करके अत्यत शीतल लग रही थी । वे राज-पत्नियों मन की पीडा से रहित होकर, पति के साथ सहगमन करनेवाली नारियों की सद्गति को प्राप्त हुईं ।

इसके पश्चात् भरत ने शत्रुघ्न के द्वारा पिता के सब सस्कार कराये । फिर, माता के क्रूर कृत्य के कारण क्षत्रियोचित जीवन से वंचित होकर उपमाहीन शोक-रूपी समुद्र के साथ अपने निवास मे जा पहुँचे ।


१. राजा दशरथ ने कहा था कि कैकेयी को मै त्याग देता हूँ, भरत को भी मै अपना पुत्र नही मानता । इसी कारण से वसिष्ठ मुनि ने शत्रुघ्न से दशरथ का अग्नि-सस्कार कराया ।—अनु०

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