कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें२८४ | कम्ब रामायण
(राज्य) को नहीं स्वीकार करेंगे, तो वनवास की अवधि तक मैं भी उनके साथ वन में ही रहूँगा।
राम के प्रति अत्यन्त प्रेम से पूर्ण उन महान् तपस्वियों ने, ज्योंही यह वचन सुना, त्योंही उनके फूले हुए शरीर और मन में ऐसी शीतलता व्याप्त हुई, जैसे किसी ने चन्दन लगा दिया हो।
भरद्वाज महर्षि प्रेम के साथ भरत को अपने पवित्र आश्रम में ले गये और उनके साथ आई हुई सेना का आतिथ्य करने के विचार से अपने अरुण करों से अग्नि में कुछ आहुतियाँ दीं।
विरागी तपस्वी (भरद्वाज) के स्मरण करने मात्र से स्वर्गलोक शीघ्र वहाँ आ पहुँचा। सेना के लोग मानो पुनर्जन्म प्राप्त कर दूसरे लोक में जा पहुँचे हों—इस प्रकार अपनी पूर्वदशा को भूलकर बड़े आनन्द में निमग्न हो रहे।
स्वर्ग की अप्सराओं ने यह मानकर कि ये लोग शाश्वत धर्म के आश्रय हैं, उस सेना में स्थित लोगों का प्रेम से स्वागत किया और चन्द्र-मण्डल के समान स्थित प्रासाद में उन्हें ले गईं।
उन (अप्सराओं) ने उस सेना के लोगों को स्नान के उपयुक्त सुगंध-चूर्णों का लेप कराकर स्वर्ग-गंगा के दुर्लभ तथा अपूर्व जल में स्नान कराया। सुरभिमय बड़े कल्प-वृक्षों के दिये हुए पुष्प-सदृश मृदु वस्त्र पहनाये।
पुष्पित शाखा के समान लचकती देहवाली उन अप्सराओं ने रक्तस्वर्ण के बने मनोहर आभरण पहनकर बड़े प्रेम से उन लोगों को अमृत-समान भोजन कराया।
फिर, भरत की सेना में स्थित पुरुषों ने अलक्तक-लगे, नूपुरों से भूषित एवं पद्मराग-समान चरणों से युक्त तथा विष-समान नयनों से शोभायमान उन अप्सराओं के साथ पञ्च लक्षणों से युक्त उत्तम शय्या पर सुखनिद्रा की।¹
राजाओं से लेकर पालकी ढोने से सूजे हुए कंधोंवाले लोगों तक, सबका उन सुन्दर केशोंवाली अप्सराओं ने यथाक्रम ऐसा ही सत्कार किया, जैसा देवताओं का करती हैं।
भरत की सेना में आई हुई स्त्रियाँ, बिंबफल-समान रक्त अधरोंवाली तथा निर्दोष वैभव से पूर्ण उन अप्सराओं के सखियों तथा दासियों के समान सेवा करते रहने से, देव-योग्य भोग अनुभव करती रहीं।
उपवनों में स्थित सद्यःविकसित पुष्पों से भरे कल्पवृक्षों से मंद मारुत, गन्धवाह के हाथ का सहारा लिये हुए, अंधे व्यक्ति के समान, धीरे-धीरे आया।
मधु-धारा से सिक्त अन्न-पिंडों तथा लाल धान के पत्तों की राशि को हस्त्यध्यक्षों ने फेंका, तो उनको खाकर मत्तगज तृप्त हुए और उनके मद-जल से भ्रमर भी तृप्त हुए।
नरक से मुक्ति देनेवाले पवित्र आकाश-गंगा के जल को मत्तगजों ने अपने अंगों पर
¹ शय्या के पाँच लक्षण हैं—मार्दव, श्वैत्य, सौगन्ध्य, शैत्य तथा विस्तीर्ण होना। पद्मराग के समान चरणों से युक्त तात्पर्य यह है कि पाँवों में लाल रंग लगाया गया था। -अनु०