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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

अयोध्याकाण्ड २८५

पैरों को पसारकर, लम्बी साँड़ों से भरकर पिया। अश्व-समूह ने मरकत-समान कान्ति से युक्त घास को खाया।

सब लोग इस प्रकार देव-योग्य भोगों का अनुभव कर रहे थे। किन्तु, भरत ने कन्द-मूल और फल खाकर ही, अपनी स्वर्णमय देह को धूल पर डालकर, किसी प्रकार उस रात को व्यतीत किया।

नीलवर्ण अन्धकार के हटने से जिस प्रकार स्वप्न भी मिट जाता है, उसी प्रकार उनके स्वर्गिक भोगों के मिटने का कारण बनकर सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे पुण्यानुभव करनेवालों के पुण्य का ही अन्त हो गया हो।

संयम के साथ जो धर्म का आचरण नहीं करते, उनके जीवन के समान ही उन सैनिकों का भोग भी मिट गया, मानो उन्हें दूसरा जन्म ही प्राप्त हो गया हो। यों (स्वर्ग-भोग के खो जाने से) चिंता न करते हुए वे पूर्व दशा में पहुँच गये।

उस दिन प्रातः ही निद्रा से उठकर वह सेना उपवनों तथा पर्वतों को धूल बनाकर उड़ाती हुई चल पड़ी और एक मरुभूमि में जा पहुँची, जिसे देखकर देवता भी यह संदेह करने लगे कि यह समुद्र है कि सेना है।

ऊपर उठी हुई धूल से आवृत होकर सूर्य, ताप-रहित हो शीतल पड़ गया। गजों के मद-प्रवाह, धूल-भरे उस मरु-प्रदेश में यों बहे कि आगे चलना कठिन हो गया।

तीक्ष्ण भालेवाले राजाओं के श्वेतच्छत्र, वृक्षों की-सी घनी छाया दे रहे थे, जिससे अग्नि के समान उष्ण एवं कंकड़ी से भरा वह मरु-प्रदेश इस प्रकार शीतल हो गया, मानो उसके ऊपर घनी लताओं से युक्त कोई वितान ही छा दिया गया हो।

‘यह विशाल राज्य तुम स्वीकार करो’—यों कहनेवाली माता के प्रति उत्पन्न क्रोध से जिनका मुख लाल हो गया था, ऐसे नीलवर्ण भरत को देखकर सूखे हुए वृक्ष भी प्रेम के कारण द्रवित होकर पल्लवित हो गये।

अपने प्राणों से भी सद्‌धर्म को ही अधिक श्रेष्ठ मानकर प्राण त्यागनेवाले, शासन में चतुर दशरथ की वह सेना, दुःखदायक मरु-प्रदेश को ऐसे पार कर गई, जैसे शीतल वृक्षों से भरे (मरुद नामक) भू-प्रदेश को ही पार कर रही हो और इस प्रकार चित्रकूट पर्वत के निकट जा पहुँची।

धूलि का समूह, अश्वों, रथों तथा मत्तगजों का शब्द एवं पैदल सेना का कोला-हल—यह सब सूचना दे रहे थे कि एक विशाल सेना आ रही है, जिसे सुनकर—

लक्ष्मण उठे और एक ऐसे पर्वत पर चढ़ गये, जो पृथ्वी के सूज उठने से उभरा-सा लगता था और वीचि-पूर्ण सागर को छोटा बना देनेवाली तथा दृढ़ धनुर्धारी उस विशाल सेना को देखा।

तब लक्ष्मण, यह सोचकर कि सारी पृथ्वी का राज्य करने की अदम्य इच्छा से प्रेरित होकर ही भरत इस सेना को लेकर व्रतधारी (रामचन्द्र) पर आक्रमण करने आया है—यह सत्य है।—अत्यन्त क्रोध से भर गये।

वे दौड़कर, उस पर्वत को चूर-चूर करते हुए, भूमि पर कूद पड़े और शीघ्र