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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 293

अयोध्याकाण्ड २८३

(विष्णु) के द्वारा पूर्वकाल में नापी गई सारी पृथ्वी को अपने मन के षड्यन्त्र से नापा था, देखकर गुह ने भरत से पूछा—ये कौन हैं ?

तब भरत ने कहा—सब विपदाओ को उत्पन्न करनेवाली, लोकनिंदा (रूपी) सतान को पालनेवाली माता, उसके पापी पेट में चिरकाल तक वास करनेवाले मुझ पुत्र के प्राणो को भार बनानेवाली तथा इस लोक में, जहाँ के सब प्राणी प्राणहीन शरीर-जैसे लगते हैं—(अर्थात्, राम-वियोग में दुःखी हैं), पीडा के लक्षणो से रहित होकर रहनेवाली वह एकमात्र व्यक्ति है, ऐसी इस स्त्री को क्या तुमने नहीं पहचाना ? यहाँ खड़ी हुई यही मेरी जननी है।

भरत के वचन सुनकर गुह ने उस दयाहीन स्त्री को भी अपने कर जोड़कर नमस्कार किया। उस समय वह नाव भी पंख-रहित होकर तैरनेवाली हंसिनी के समान किनारे पर आ लगी।

नाव से उतरकर माताएँ पालकियों पर आसीन होकर चलीं। भरत ने अश्रु-प्रवाह बहानेवाली आँखों के साथ पैदल ही चलकर दीर्घ मार्ग पार किया। गुह भी उनसे पृथक् न होकर उनके साथ चला।

फिर, भरत कर्म-भार से मुक्त भरद्वाज नामक, महान् तपस्वी के आश्रम में आदर के साथ जा पहुँचे। उस समय वे महर्षि, वृद्ध तपस्वियों के साथ, उनके सम्मुख आये।

( १–७३ )


अध्याय १२

पादुका-पट्टाभिषेक पटल

भरत ने अपने सम्मुख आये (भरद्वाज) मुनि को, पिता-समान मानकर बड़ी विनम्रता से प्रणाम किया। चन्द्रशेखर (शिव)-सदृश उन मुनिवर ने प्रेम से उन्हें अनेक शुभ आशीर्वाद दिये।

फिर भरद्वाज मुनि ने भरत को देखकर कहा—हे तात ! तुमको जो राज्य प्राप्त हुआ है, किरीट धारणकर उसका शासन किये बिना क्यों इस प्रकार जटा धारण करके यहाँ आये हो ?

यह वचन सुनते ही भरत घोर क्रोधाग्नि से भड़क उठे। किन्तु क्रोध को दबाकर उन महान् तपस्वी को देखकर कहा—हे ज्ञानी ! आपने यह समझकर कि मैंने अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं किया, अब यह जो प्रश्न किया है, यह क्या आपके लिए उचित है ?

वेदों के प्रभु (विष्णु) के अवतार राम के योग्य भाई भरत ने पुनः कहा—कुल-परंपरा से आगत धर्म का त्याग कर मैं राज्य नहीं करना चाहता। यदि रामचन्द्र उस