कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
अयोध्याकाण्ड २८३
(विष्णु) के द्वारा पूर्वकाल में नापी गई सारी पृथ्वी को अपने मन के षड्यन्त्र से नापा था, देखकर गुह ने भरत से पूछा—ये कौन हैं ?
तब भरत ने कहा—सब विपदाओ को उत्पन्न करनेवाली, लोकनिंदा (रूपी) सतान को पालनेवाली माता, उसके पापी पेट में चिरकाल तक वास करनेवाले मुझ पुत्र के प्राणो को भार बनानेवाली तथा इस लोक में, जहाँ के सब प्राणी प्राणहीन शरीर-जैसे लगते हैं—(अर्थात्, राम-वियोग में दुःखी हैं), पीडा के लक्षणो से रहित होकर रहनेवाली वह एकमात्र व्यक्ति है, ऐसी इस स्त्री को क्या तुमने नहीं पहचाना ? यहाँ खड़ी हुई यही मेरी जननी है।
भरत के वचन सुनकर गुह ने उस दयाहीन स्त्री को भी अपने कर जोड़कर नमस्कार किया। उस समय वह नाव भी पंख-रहित होकर तैरनेवाली हंसिनी के समान किनारे पर आ लगी।
नाव से उतरकर माताएँ पालकियों पर आसीन होकर चलीं। भरत ने अश्रु-प्रवाह बहानेवाली आँखों के साथ पैदल ही चलकर दीर्घ मार्ग पार किया। गुह भी उनसे पृथक् न होकर उनके साथ चला।
फिर, भरत कर्म-भार से मुक्त भरद्वाज नामक, महान् तपस्वी के आश्रम में आदर के साथ जा पहुँचे। उस समय वे महर्षि, वृद्ध तपस्वियों के साथ, उनके सम्मुख आये।
( १–७३ )
अध्याय १२
पादुका-पट्टाभिषेक पटल
भरत ने अपने सम्मुख आये (भरद्वाज) मुनि को, पिता-समान मानकर बड़ी विनम्रता से प्रणाम किया। चन्द्रशेखर (शिव)-सदृश उन मुनिवर ने प्रेम से उन्हें अनेक शुभ आशीर्वाद दिये।
फिर भरद्वाज मुनि ने भरत को देखकर कहा—हे तात ! तुमको जो राज्य प्राप्त हुआ है, किरीट धारणकर उसका शासन किये बिना क्यों इस प्रकार जटा धारण करके यहाँ आये हो ?
यह वचन सुनते ही भरत घोर क्रोधाग्नि से भड़क उठे। किन्तु क्रोध को दबाकर उन महान् तपस्वी को देखकर कहा—हे ज्ञानी ! आपने यह समझकर कि मैंने अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं किया, अब यह जो प्रश्न किया है, यह क्या आपके लिए उचित है ?
वेदों के प्रभु (विष्णु) के अवतार राम के योग्य भाई भरत ने पुनः कहा—कुल-परंपरा से आगत धर्म का त्याग कर मैं राज्य नहीं करना चाहता। यदि रामचन्द्र उस
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(राज्य) को नहीं स्वीकार करेंगे, तो वनवास की अवधि तक मैं भी उनके साथ वन में ही रहूँगा।
राम के प्रति अत्यन्त प्रेम से पूर्ण उन महान् तपस्वियों ने, ज्योंही यह वचन सुना, त्योंही उनके फूले हुए शरीर और मन में ऐसी शीतलता व्याप्त हुई, जैसे किसी ने चन्दन लगा दिया हो।
भरद्वाज महर्षि प्रेम के साथ भरत को अपने पवित्र आश्रम में ले गये और उनके साथ आई हुई सेना का आतिथ्य करने के विचार से अपने अरुण करों से अग्नि में कुछ आहुतियाँ दीं।
विरागी तपस्वी (भरद्वाज) के स्मरण करने मात्र से स्वर्गलोक शीघ्र वहाँ आ पहुँचा। सेना के लोग मानो पुनर्जन्म प्राप्त कर दूसरे लोक में जा पहुँचे हों—इस प्रकार अपनी पूर्वदशा को भूलकर बड़े आनन्द में निमग्न हो रहे।
स्वर्ग की अप्सराओं ने यह मानकर कि ये लोग शाश्वत धर्म के आश्रय हैं, उस सेना में स्थित लोगों का प्रेम से स्वागत किया और चन्द्र-मण्डल के समान स्थित प्रासाद में उन्हें ले गईं।
उन (अप्सराओं) ने उस सेना के लोगों को स्नान के उपयुक्त सुगंध-चूर्णों का लेप कराकर स्वर्ग-गंगा के दुर्लभ तथा अपूर्व जल में स्नान कराया। सुरभिमय बड़े कल्प-वृक्षों के दिये हुए पुष्प-सदृश मृदु वस्त्र पहनाये।
पुष्पित शाखा के समान लचकती देहवाली उन अप्सराओं ने रक्तस्वर्ण के बने मनोहर आभरण पहनकर बड़े प्रेम से उन लोगों को अमृत-समान भोजन कराया।
फिर, भरत की सेना में स्थित पुरुषों ने अलक्तक-लगे, नूपुरों से भूषित एवं पद्मराग-समान चरणों से युक्त तथा विष-समान नयनों से शोभायमान उन अप्सराओं के साथ पञ्च लक्षणों से युक्त उत्तम शय्या पर सुखनिद्रा की।¹
राजाओं से लेकर पालकी ढोने से सूजे हुए कंधोंवाले लोगों तक, सबका उन सुन्दर केशोंवाली अप्सराओं ने यथाक्रम ऐसा ही सत्कार किया, जैसा देवताओं का करती हैं।
भरत की सेना में आई हुई स्त्रियाँ, बिंबफल-समान रक्त अधरोंवाली तथा निर्दोष वैभव से पूर्ण उन अप्सराओं के सखियों तथा दासियों के समान सेवा करते रहने से, देव-योग्य भोग अनुभव करती रहीं।
उपवनों में स्थित सद्यःविकसित पुष्पों से भरे कल्पवृक्षों से मंद मारुत, गन्धवाह के हाथ का सहारा लिये हुए, अंधे व्यक्ति के समान, धीरे-धीरे आया।
मधु-धारा से सिक्त अन्न-पिंडों तथा लाल धान के पत्तों की राशि को हस्त्यध्यक्षों ने फेंका, तो उनको खाकर मत्तगज तृप्त हुए और उनके मद-जल से भ्रमर भी तृप्त हुए।
नरक से मुक्ति देनेवाले पवित्र आकाश-गंगा के जल को मत्तगजों ने अपने अंगों पर
¹ शय्या के पाँच लक्षण हैं—मार्दव, श्वैत्य, सौगन्ध्य, शैत्य तथा विस्तीर्ण होना। पद्मराग के समान चरणों से युक्त तात्पर्य यह है कि पाँवों में लाल रंग लगाया गया था। -अनु०
अयोध्याकाण्ड २८५
पैरों को पसारकर, लम्बी साँड़ों से भरकर पिया। अश्व-समूह ने मरकत-समान कान्ति से युक्त घास को खाया।
सब लोग इस प्रकार देव-योग्य भोगों का अनुभव कर रहे थे। किन्तु, भरत ने कन्द-मूल और फल खाकर ही, अपनी स्वर्णमय देह को धूल पर डालकर, किसी प्रकार उस रात को व्यतीत किया।
नीलवर्ण अन्धकार के हटने से जिस प्रकार स्वप्न भी मिट जाता है, उसी प्रकार उनके स्वर्गिक भोगों के मिटने का कारण बनकर सूर्य इस प्रकार उदित हुआ, जैसे पुण्यानुभव करनेवालों के पुण्य का ही अन्त हो गया हो।
संयम के साथ जो धर्म का आचरण नहीं करते, उनके जीवन के समान ही उन सैनिकों का भोग भी मिट गया, मानो उन्हें दूसरा जन्म ही प्राप्त हो गया हो। यों (स्वर्ग-भोग के खो जाने से) चिंता न करते हुए वे पूर्व दशा में पहुँच गये।
उस दिन प्रातः ही निद्रा से उठकर वह सेना उपवनों तथा पर्वतों को धूल बनाकर उड़ाती हुई चल पड़ी और एक मरुभूमि में जा पहुँची, जिसे देखकर देवता भी यह संदेह करने लगे कि यह समुद्र है कि सेना है।
ऊपर उठी हुई धूल से आवृत होकर सूर्य, ताप-रहित हो शीतल पड़ गया। गजों के मद-प्रवाह, धूल-भरे उस मरु-प्रदेश में यों बहे कि आगे चलना कठिन हो गया।
तीक्ष्ण भालेवाले राजाओं के श्वेतच्छत्र, वृक्षों की-सी घनी छाया दे रहे थे, जिससे अग्नि के समान उष्ण एवं कंकड़ी से भरा वह मरु-प्रदेश इस प्रकार शीतल हो गया, मानो उसके ऊपर घनी लताओं से युक्त कोई वितान ही छा दिया गया हो।
‘यह विशाल राज्य तुम स्वीकार करो’—यों कहनेवाली माता के प्रति उत्पन्न क्रोध से जिनका मुख लाल हो गया था, ऐसे नीलवर्ण भरत को देखकर सूखे हुए वृक्ष भी प्रेम के कारण द्रवित होकर पल्लवित हो गये।
अपने प्राणों से भी सद्धर्म को ही अधिक श्रेष्ठ मानकर प्राण त्यागनेवाले, शासन में चतुर दशरथ की वह सेना, दुःखदायक मरु-प्रदेश को ऐसे पार कर गई, जैसे शीतल वृक्षों से भरे (मरुद नामक) भू-प्रदेश को ही पार कर रही हो और इस प्रकार चित्रकूट पर्वत के निकट जा पहुँची।
धूलि का समूह, अश्वों, रथों तथा मत्तगजों का शब्द एवं पैदल सेना का कोला-हल—यह सब सूचना दे रहे थे कि एक विशाल सेना आ रही है, जिसे सुनकर—
लक्ष्मण उठे और एक ऐसे पर्वत पर चढ़ गये, जो पृथ्वी के सूज उठने से उभरा-सा लगता था और वीचि-पूर्ण सागर को छोटा बना देनेवाली तथा दृढ़ धनुर्धारी उस विशाल सेना को देखा।
तब लक्ष्मण, यह सोचकर कि सारी पृथ्वी का राज्य करने की अदम्य इच्छा से प्रेरित होकर ही भरत इस सेना को लेकर व्रतधारी (रामचन्द्र) पर आक्रमण करने आया है—यह सत्य है।—अत्यन्त क्रोध से भर गये।
वे दौड़कर, उस पर्वत को चूर-चूर करते हुए, भूमि पर कूद पड़े और शीघ्र
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रामचन्द्र के निकट जा पहुँचे और बोले—भरत आपका आदर किये बिना प्राचीरों से आवृत्त अयोध्या की सेना को लेकर आप पर आक्रमण करने को आ रहा है ।
यों कहकर लक्ष्मण ने ( कटि मे ) कटार और ( पैरों में ) वीर-वलय धारण किये । अनेक बाणो से भरा तूणीर लिया । युद्ध-कवच पहना । हाथ मे धनुष लिया । और प्रभु के चरणों को प्रणाम करके ये बचन कहे—
इह और पर-लोक दोनो के फलों को खो देनेवाले उस भरत के ऊँचे कंधो के वल को, उसकी सेना के महत्त्व को एवं अपने इस अनुज ( अर्थात्, लक्ष्मण ) के अनुपम पराक्रम को देखकर आप आनन्दित होगे ।
बड़ी पीडा से मरनेवाले हाथियों के ढेरों को लुढ़कानेवाले, रथो को बहानेवाले ( हाथी, अश्व आदि की ) आँतो को बिखेरकर ले चलनेवाले तथा अरण्य मे फैलनेवाले रक्त-प्रवाह को आप अभी देखेगे ।
मेरे बाण ( शत्रुओ के ) हथियार, हाथ, कवच से आवृत्त वक्ष तथा प्राण सबको छिन्न करके उनके शरीर के भीतर प्रविष्ट होगे । ( मेरे वाण ), उनके रक्त से भी सिक्त न होकर बड़े वेग से सब दिशाओ मे जाकर, दिग्गजो को भी भयभीत करेंगे । हे वीर ! आप देखेंगे ।
अति वेग से फाँदनेवाले अश्वो के मर जाने पर, रथो की स्वर्णमय पीठों पर, टूट-कर गिरे हुए ढालों को अपने हाथ में लेकर भूतो को संगीत के साथ नृत्य करते हुए देखेंगे ।
( लक्ष्मण ने राम से कहा—) अलंकारों से युक्त हाथियो से पूर्ण भरत की सेना को मैं एक क्षण मे निर्मूल कर दूँगा, जिससे वीर-स्वर्ग भी भार से अपनी पीठ झुकाने लगेगा तथा समुद्र-रूपी वस्त्र से युक्त पृथ्वी भार-मुक्त होकर विश्राम करेगी । हे उदारगुण ! यह आप देखेगे ।
उमड़कर चलनेवाले रक्त-प्रवाह मे तैरने के कारण लाल हुए सून और उनके साथ छोटी आँखवाले पिशाच तथा शिर-रहित कबध, देवों के जैसे ही यह कहते हुए कि 'सारी पृथ्वी आपके अधीन हो गई है', नाचेंगे ।
मुख-पट्टो से भूषित मत्तगजो, अश्वों, भारी भुजाओ से युक्त पैदल सेना के वीरो आदि के मरने पर उनके समुद्र-सदृश रक्त से सप्त समुद्रो को उथलकर गरजते हुए आप सुनेगे ।
आप देखेंगे कि मेरे शूरो से कैसे पैदल सेना छिन्न-भिन्न होती है । रथ विध्वस्त होते हैं । वीरो के करवाल टूट जाते हैं । दृढ धनुष टूट जात हैं । बडे गजो और अश्वो के पैर, शिर आदि टूट जाते हैं और उनपर आरूढ वीरों के पैर और हाथ कट जाते हैं ।
बडे पखवाले तथा स्वर्णिम काति को बिखेरनेवाले मेरे बाणो को, उन दोनो—( अर्थात्, भरत और शत्रुघ्न ) के वक्षो को छेदकर, उनका मास निकालकर, गगन-मार्ग मे उडते हुए और ( मासभक्षी ) पक्षियो को बुलाते हुए, आप देखेंगे ।
हे चक्रधारी ! एक स्त्री के मोह से समार-भर को दुःख देनेवाले चक्रवर्ती ( दशरथ ) की आज्ञा से जिस भरत ने राज्य पाया है, उसे अब मेरी आज्ञा से यह राज्य
अयोध्याकाण्ड २८७
त्यागकर, पुनरावृत्ति से रहित (अर्थात्, जहाँ से लौट आना असंभव है), नरक-लोक प्राप्त करते हुए देखेंगे।
यह देखकर कि आपको राज्य छोड़कर वन मे निवास करने का दुःख प्राप्त हुआ है, जब आपकी जननी रो रही थी, तब उसे देखकर जो कैकेयी आनन्दित हुई थी, उसे अब (पुत्र के शोक में) पृथ्वी पर गिरकर रोते हुए देखेंगे।
सान पर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये गये, अग्नि के समान भयंकर और विजयमाला से भूषित बरछा धारण करनेवाले ! मैं एक क्षण मे एक तीक्ष्ण तथा विध्वंसक बाण से इस सेना-समुद्र को त्रिपुर-दाह करनेवाले शिवजी के समान सुखा दूँगा—इस प्रकार लक्ष्मण ने कहा।
तब रामचन्द्र ने उससे कहा—हे लक्ष्मण ! यदि तुम चतुर्दश लोको को हिला देना चाहो, तो तुम्हारे इस निश्चय को कोई रोक नही सकता। उसके बारे मे कुछ कहने की क्या आवश्यकता है ? (पर मै तुम से) एक उचित वचन कहना चाहता हूँ। उसे सुनो।
उज्ज्वल प्रस्तर-स्तंभ के प्रतिरूप बने कंधोवाले ! हमारे कुल मे जो निष्कलंक गुणवाले राजा उत्पन्न हुए, उनकी गणना नहीं हो सकती। हमारे कुल में कौन ऐसा हुआ, जो अपने कुल-धर्म से हटा हो ?
ताल-वृक्ष जैसी सूँडोवाले हाथियो की सेना से युक्त भरत ने जो कार्य किया है, वह वेद-प्रतिपादित धर्म के अतर्भूत ही है। तुम जैसा कहते हो, वैसा नहीं है (अर्थात्, अधर्म-कार्य नहीं है)। इस सत्य को तुमने मेरे प्रति प्रेमाधिक्य के कारण सोचा नहीं।
भरत, मुझ अपने ज्येष्ठ भ्राता पर प्रेम के कारण ही यहाँ आयगा और राज्य मुझे सौंप देगा—यों सोचने के बदले क्या यह सोचना बुद्धिमत्ता है कि वह (भरत) सेना के साथ आकर मुझसे युद्ध करेगा ?
हे विद्युत् के समान चमकते हुए बरछे को धारण करनेवाले ! वीर-वलयधारी भरत यहाँ आकर विशाल सेना को, राज्य-सपत्ति के साथ, मुझे सौपेगा—इसके विपरीत यह कहना भी अनुचित है कि वह मेरे साथ युद्ध करेगा।
हे आभरण-योग्य कंधोवाले ! उत्तम धर्म के देवता के समान एव सच्चारित्र्य की धुरी बने हुए उस (भरत) के सबंध मे इस प्रकार सोचना क्या उचित है ? उसका यहाँ आना, मुझे देखने के लिए ही है। इसे तुम अभी समझोगे।
प्रभु ने अनुज (लक्ष्मण) से यो कहा—उस समय, भरत अपनी सेना को पीछे छोडकर, अपने से कभी पृथक् न होनेवाले प्रेमयुक्त भाई शत्रुघ्न को साथ लेकर, आगे बढकर (राम के निकट) आया।
नमस्कार की मुद्रा मे हाथो को उठाये हुए, शिथिल देहवाले, अश्रुपूर्ण नेत्रोवाले तथा साकार दुःख बने हुए चित्र-जैसे आनेवाले भरत को सर्वज्ञ प्रभु ने पूर्ण रूप से देखा—(अर्थात्, शिर से पैर तक दृष्टि फेरकर देखा)।
फिर, काले मेघ-जैसे आकारवाले प्रभु ने लक्ष्मण से कहा—शब्दायमान दृढ धनुष से युक्त हे अनुज ! हे तात ! देखो, रथ आदि की सेना को लेकर यह भरत बड़े क्रोध के साथ युद्ध करने के लिए कैसा युद्धोचित वेष धारण कर यहाँ आ रहा है !
२८८ | कंब रामायण
यह सुनकर लक्ष्मण-तपोवेष में, निर्बल हुई भुजाओं से युक्त भरत के संबंध में अपने कहे हुए कठोर वचन भूल गये। उनका क्रोध तथा ज्ञान भी शिथिल हो गये और कांति-हीन वदन के साथ यों खड़े रहे कि उनका धनुष तथा अश्रु दोनों धरती पर गिर पड़े।
उस समय, भरत अपने दोनों हाथों को जोड़कर इस प्रकार राम के सम्मुख आये, मानो रामचन्द्र को, अपने पति के रूप में पाने के लिए तपस्या करके उन्हें प्राप्त करने के समय अकस्मात् उनसे वियुक्त हुई राज्यलक्ष्मी का (राम के पास) भेजा हुआ कोई दूत हो।
भरत आये और जैसे अपने पिता के ही दर्शन कर रहे हों—यह वचन कहते हुए राम के चरणों पर गिर पड़े कि आपने धर्म का विचार नहीं किया। करुणा को त्याग दिया और परंपरागत नीति को छोड़ दिया।
उसमें प्राण हैं या नहीं, ऐसा संदेह उत्पन्न करनेवाले, अत्यन्त कृशगात हुए, भरत को प्रभु ने देखा। देखते ही उनके नयन-रूपी कमलों से (अश्रु) जल प्रवाहित होकर (भरत के) जटा-मंडल पर गिरकर उसे भरकर फिर उमड़कर वह चला।
दयामय परमात्मा ने धर्म-देवता का आलिंगन किया हो, इस प्रकार (का भ्रम उत्पन्न करते हुए) समस्त नीति के एकमात्र आश्रयभूत रामचन्द्र ने निःश्वास भरते हुए तथा वक्ष पर आँसुओं को बहाते हुए द्रवितचित्त होकर भरत का आलिंगन किया।
भरत को गले लगाकर रामचन्द्र ने उनके वेष को बार-बार ध्यान से देखा और विविध भाँति के विचार किये। फिर पूछा—हे तात! तुम दुःख-समुद्र में डूबे हो। संसार का शासन करनेवाले, मल्लयुद्ध में चतुर भुजाओंवाले, हमारे पिता सुखी हैं न?
ज्ञानी (प्रभु) का वचन सुनकर भरत ने कहा—हे प्रभु! आपके विरह-रूपी व्याधि से एवं मेरी जननी के वर-रूपी यम से पीड़ित होकर हमारे पिता इस संसार में सत्य को स्थिर करके परलोक में जा पहुँचे हैं।
'(पिता) स्वर्गलोक को गये'—यह तीक्ष्ण वचन घाव में वरछे के समान उनके कानों में घुसने के पूर्व ही परमपद के निवासी प्रभु (विष्णु के अवतार राम) के नयन और मन चरखी के जैसे घूम उठे और वे मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े।
प्रभु विशाल धरती पर गिरे। उनके प्राण अप्रकट हो रहे। बिजली से पीड़ित सर्प के समान वे मूर्च्छित हो रहे। फिर, बड़ी कठिनाई से उनके प्राण लौटे। तब वे निःश्वास भरते हुए बड़ी व्याकुलता के साथ विविध वचन कहकर विलाप करने लगे।
अमंद दीप-सदृश हे शासक! संसार के निवासियों के लिए पितृ-तुल्य! अनुपम धर्म के लिए माता बननेवाले। दया-निलय। मेरे पिता! शत्रुरूपी हाथियों के लिए सिंह बननेवाले। तुम मृत हो गये। अब सत्य का यथार्थ आश्रय और कौन बनेगा?
हे शत्रुओं के लिए भयकर, विध्वंसक तथा विजयमाला से भूषित तीक्ष्णमाला धारण करनेवाले! प्रसिद्ध तपस्वी ऋष्यशृंग की कृपा से उत्तम यज्ञ संपन्न करके तुमने मुझे पुत्र के रूप में पाया। क्या उसका फल तुम्हारा इस प्रकार से प्राण त्याग करके जाना ही है?
अयोध्याकाण्ड २८६
स्वर्णरंग की धूलि बिखेरनेवाले पुष्पों से भूषित, तीक्ष्ण सूर्य-किरण की-सी उज्ज्वल कांति बिखेरनेवाली धवल माला धारण करनेवाले ! प्रजा का हित करनेवाले शासन का भार मेरे द्वारा लिये जाने पर विश्राम पाने का तुम्हारा ढंग क्या यही है ? मै तुम्हारे प्राणो के लिए यम बनकर उत्पन्न हुआ। क्या मै सचमुच ससार का राज्य करने की योग्यता रखता हूँ ?
शंबरासुर को मिटाकर देवेन्द्र को स्वर्ग का शाश्वत राज्य प्रदान करनेवाले हे चक्रधारी ! राज्य का भार मुझे सौंपकर पंचेन्द्रियो पर दमन करके तुम्हारी तपस्या करने की क्या यही रीति है ?
सबके स्पृहणीय राज्य को स्वीकार करके संसार के लिए दुःख उत्पन्न करनेवाला क्षुद्र हूँ मै। अब यदि मै अपने प्राण छोड़ने के बदले इस शरीर को रखकर राज्य करने लगूँ, तो वह किसकी तृप्ति के लिए होगा ?
पुष्ट देहवाले शत्रुओं के प्राण हरण करनेवाला भाला रखनेवाले, हे पिता। मधुस्रावी पुष्पोद्यानो से पूर्ण कोशल देश को छोड़कर मै वन में आया हूँ—यह बात सुनने मात्र से उसे न सहकर तुम स्वर्ग को चले गये। किन्तु, मै अभी तक यह (संसार का) जीवन चाहता हुआ जीवित हूँ।
गरिमामय चन्द्र को भी शीतलता प्रदान करनेवाले अनुपम छत्र से युक्त हे चक्रवर्ती ! तुम दातृत्व, गौरव, स्वर्गवासियो के लिए भी अविनाशी पराक्रम, न्याय से विचलित न होनेवाली शासन-रीति, अपरिवर्तनीय सत्य तथा अन्य समस्त सद्गुणों को अपने साथ ही ले गये (अर्थात्, अब इस संसार मे वे गुण नही रहे)।
इस प्रकार, विविध वचन कहकर विलाप करनेवाले, पुष्ट पर्वताकार दृढ कंधोंवाले, सिंहतुल्य राम को विशाल भुजाओवाले भाइयों तथा वहाँ आये हुए नरेशों ने जाकर सँभाला। तब महान् तपस्वी वसिष्ठ उन्हे सांत्वना देनेवाले वचन कहने लगे।
उस समय, वर्णनातीत तपःप्रभाव से युक्त भरद्वाज आदि जटाधारी मुनि, सप्त द्वीपो के राजा तथा सभी मंत्री आ पहुँचे। सेनापति भी आ गये।
आने योग्य सब लोगो के आ जाने पर शोक में निमग्न विजयशील पुरुषोत्तम (राम) को देखकर कमलभव (ब्रह्मा) के पुत्र (वसिष्ठ) ने कहा—
संसार के प्राणियो के लिए, संन्यास अथवा (गृहस्थ-जीवन मे रहकर) उत्तम धर्म-मार्ग पर चलना—इनके अतिरिक्त अन्य कोई साथी नही है। इन प्राणियो के लिए जन्म लेना और मरना स्वाभाविक है। वेदों के पारंगत तुमने क्या इस बात को भुला दिया ?
'प्राणियों के अनित्य जन्म असंख्य कोटि होते हैं, जो सुख और दुःख से भरे रहते हैं'—शास्त्रों में अनेक स्थानो मे प्रतिपादित इस सत्य को जानने के पश्चात् भी क्या यह सोचना उचित है कि यम पक्षपात से काम करता है ?
हम देखते हैं कि कुछ प्राणी जन्म लेने के पूर्व ही मर जाते हैं। चक्रवर्ती उत्तम ज्ञान के साथ, साठ सहस्र वर्ष-पर्यन्त सारी पृथ्वी का शासन करके स्वर्गवास करने गये हैं। इसके लिए रोना क्या ?
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तपस्या, धर्म और सृष्टि एवं त्रिशूल, चक्र और सरस्वती, क्रमशः इनको धारण करनेवाले त्रिदेव (शिव, विष्णु और ब्रह्मा) भी काल के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं।
नेत्र आदि इंद्रियों के कारणभूत, अपार विशालता से युक्त एवं सृष्टि के सब पदार्थों के उत्पत्ति-स्थान बने हुए पृथ्वी, जल आदि पंचभूत भी नश्वर हैं, तो अब एक प्राणी के लिए तुम क्यों शोक करते हो ?
हे उत्तम ! पुण्य-रूपी सुगन्धपूर्ण तैल में अनुपम काल-रूपी बत्ती, विधि-रूपी ज्योति से दीप्त होकर जलती रहती है। जब तैल और बत्ती समाप्त होती हैं, तब दीप बुझ जाता है, इसमें कुछ संदेह नहीं।
ये विविध जन्म, इस लोक में दुःख भोगकर, परलोक में यातनाएँ भोगकर, फिर जन्मांतर में भी भाग्य का फल भोगने के स्थान हैं। इनकी गणना कैसे संभव है ?
सबके आदर-योग्य सद्गुणों से पूर्ण। तुम्हारे पिता बनने के कारण दशरथ कमलभव ब्रह्मा के लिए भी दुर्गम विष्णुलोक में जा पहुँचे। इसके अतिरिक्त तुम अपने पिता का और क्या उपकार कर सकते हो ?
हे तात ! तुम किंचित् भी दुःखी मत होओ। उन दशरथ के लिए इससे बढ़कर उद्धार का मार्ग अन्य कोई नहीं है। अब तुम शास्त्रोक्त प्रकार से उत्तरकृत्य करो तथा अपने अरुण करों से तिलांजलि आदि दो।
मेघ से गिरे हुए जल में जैसे बुद्बुद हो, वैसे ही इस नश्वर शरीर के बारे में सोचकर दुःख करना अज्ञान है। आँखों से आँसू बहाने से हम कुछ नहीं पाते हैं। अतः, अब तुम जाओ और कमल-समान अपने करों से पापहारी तथा पवित्रता उत्पन्न करनेवाला जल-तर्पण करो—यों वसिष्ठ ने कहा।
वसिष्ठ के यह कहने पर रामचन्द्र उठे तथा स्वर्ण के रंगवाली जटा से युक्त और चार वेदों के ज्ञाता वसिष्ठ के साथ घनी लहरों से भरी गंगा पर जा पहुँचे। वसिष्ठ के कथनानुसार राम ने (अपना दुःख शान्त करके) कर्त्तव्य का विचार किया।
सब जीवात्माओं में एक ही समान अंतरात्मा के रूप में रहकर उनकी ज्ञान देनेवाले विष्णु (के अवतार राम) ने, जल में उतरकर स्नान किया, वेदज्ञ वसिष्ठ के बताये ढंग से अपने कर से तीन बार जल लेकर छोड़ा।
जल-तर्पण करने के पश्चात् अन्य सब कृत्य पूर्ण करके राम, बडे मंत्रियों, राजाओं, महान् तपस्वियों तथा अन्य लोगों के साथ उस पर्णशाला में जा पहुँचे, जहाँ सीता देवी थी।
जब सब लोग पर्णशाला में पहुँचे, तब उत्तम भरत ने अकेली बैठी सीता देवी को देखा और उस पर्णकुटी को भी देखा। दुःख के आवेग से, अपनी कमल-जैसी आँखों को हाथों से आवृत्त करते हुए वे सीता देवी के चरणों पर गिरकर रोने लगे।
महत्ता से युक्त भरत की लाल आँखें शोक के उद्वेग के कारण अत्यधिक अश्रुओं को निरंतर बहाती रही, जिससे ऐसा लगा, मानों इन्द्रियों में भी वीचियों से पूर्ण समुद्र रहता हो।
उस प्रकार बड़े शोक से आहत वीर भरत को राम ने अपने दीर्घ करों से सँभाला
अयोध्याकाण्ड २६१
और मनोहर केशोंवाली सीता को देखकर कहा—हमारे पिता (दशरथ) मेरे चिरकाल के वियोग के कारण उत्पन्न शोक से मर गये।
यह सुनते ही सीता चौंककर काँपने लगी। उनकी दोनों विशाल आँखें समुद्र के समान जल बहाने लगी। भूमि नामक अपनी धाई के ऊपर हाथ रखे, संगीत-मधुर अपने कंठ-स्वर से अनेक वचन कहती हुई विलाप करने लगी।
पर्वत के समान पुष्ट भुजाओंवाले राम के पीछे-पीछे चलनेवाली सीता को अरण्य भी नगर के समान ही लगता था। अब यह सुनने से कि चक्रवर्ती मर गये, हंसिनी-जैसी वह सीता भी शोक-समुद्र में निमग्न हो गई।
उस समय दोष-रहित मुनियों की पत्नियों ने माताओं के समान होकर (प्रेम से) सीता को अपने हाथों से उठाकर संभाला। गंगा के पवित्र जल में स्नान कराया और उनके शोक को कम करके प्रभु (राम) के पास पहुँचाया।
तब सुमंत्र पुष्पमालाधारी चार उत्तम गुणवाले कुमारों को जन्म देनेवाली तीनों माताओं तथा जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों के तत्त्व को जाननेवाले गुरुजनों को साथ लिये, सदा धर्म का ही विचार करते रहनेवाले प्रभु (राम) के निकट हाथ जोड़े हुए आया।
सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा के भी आदिकारणभूत राम, यह कहते हुए कि 'मेरे पिता कहाँ हैं, बताइए'—वहाँ आई हुई उन माताओं के उज्ज्वल चरणों पर अपने अरुण नयनों से अश्रु बहाने लगे।
तब वे माताएँ राम को गले लगा-लगाकर रोने लगी। वहाँ एकत्र सेना के वीर एवं अप्सरा-समान स्त्रियाँ भी आग में पड़े मोम के जैसे पिघल उठीं।
फिर, राम आदि उन वीरों को जन्म देनेवाली वे माताएँ जनक की पुत्री का गाढ आलिंगन करके शोक-समुद्र में निमग्न हो गईं।
सेना के वीर, नगर के लोग, प्रेम से पीड़ित पूज्य, अन्य (स्त्री) जन, राजा लोग—सब दुःख से व्याकुल चित्त के साथ प्रभु (राम) के निकट आ पहुँचे।
शेष-शय्या पर शयन करनेवाले विष्णु ने जिस वंश को अपने अवतार का स्थान बनाया, उसके कुलपुरुष होने के कारण सूर्य भी, मानो अब (दशरथ की मृत्यु पर) स्वयं जल में स्नान करके तिलांजलि आदि देने का कर्त्तव्य पूर्ण करने जा रहा हो—यों सूर्य पश्चिमी समुद्र में निमग्न हुआ।
वह दिन बीत गया। दूसरे दिन जब राजा लोग, घनी जटा धारण किये मुनि लोग, वधुजन, अनुज-वर्ग (भरत आदि) सब एकत्र हुए, तब राम ने कहा—
हे भरत ! सबके अभीष्ट पूर्ण करनेवाले चक्रवर्ती मर गये। उनकी आज्ञा से सारी पृथ्वी तुम्हारी हुई है। तो तुमने किस कारण से मुकुट धारण किये बिना मुनि का वेष स्वीकार किया है ? कहो।
राम के यह कहने पर भरत, विकल मन के साथ उठे और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। अनेक क्षण तक प्रभु को देखकर फिर बोले—आपके अतिरिक्त धर्म-मार्ग पर स्थिर रहनेवाले और कौन हो सकते हैं ? ऐसे आप भी क्या धर्म से हट जाना चाहते हैं ?
२६२ | कम्ब रामायण
अनिष्ट उत्पन्न करनेवाले वरों को माँगकर जिस (कैकेयी) ने आपको, आपके लिए योग्य न होनेवाले इस अरण्य-वास में भेज दिया और चक्रवर्ती के लिए मृत्यु उत्पन्न की, उसी का तो पुत्र हूँ मैं। अतः, विचार करने पर, क्या यह वल्की-वेष मुझ-जैसे (पापी) के लिए उचित लगता है ?
संसार को दुःख देनेवाली पापिन का पुत्र होकर मैं उत्पन्न हुआ हूँ। मैंने अपने प्राण-त्याग देने का साहस नहीं किया। तपस्या करने योग्य भी नहीं रहा। अब इन अपयशों से किस प्रकार से मैं मुक्त हो सकूँगा ?
पातिव्रत्य से स्खलित स्त्रियों का शील, छूना-गुप से फिसले हुए तपस्वी का तप, कृपा से हीन हुआ धर्म—ये सब परंपरागत नीति से फिसले राजा के शासन से भी क्या गये-बीते हो सकते हैं ? नहीं (अर्थात् इन सबसे अधिक कठोर है नीति-रहित राजा का शासन)।
(चक्रवर्ती का ज्येष्ठ पुत्र होकर) संसार में उत्पन्न होकर भी आपने न त्यागने योग्य राजपद का त्यागकर बड़ा व्रत अपनाया है। तो क्या मैं भूल से भी, नीति से च्युत होकर, धर्म को करवाल से काटकर खाने के समान, वह राज्य स्वीकार करूँगा ?
(आपके प्रति) अपार प्रेम के कारण पिता मृत हुए। आप अति भयंकर धूप से पूर्ण वन में प्रविष्ट हुए। तो क्या मैं ऐसा शत्रु हूँ, जो षड्यंत्र करता हुआ, राज्य-हरण करने के लिए घात लगाये बैठा रहूँगा ?
हे हमारे प्रभु ! आपके पिता ने जो हानि की है तथा संसार को अति कठोर दुःख देनेवाली माता ने जो हानि की है—इन दोनों हानियों को दूर करते हुए आप अयोध्या वापस चलकर राज्य करें—यों भरत ने अपने मन के विचार प्रकट किये।
भरत के वचनों से उनके मन का निर्णय सुनकर रामचन्द्र ने सोचा—अहो ! इसका विचार कैसा है ! फिर बोले—हे विजयी वीर ! मेरा कथन सुनो और भली भाँति विचार करके ये वचन कहे—
हे तात ! सदाचार, सत्य, सबके लिए अनुसरणीय न्याय, उत्तम धर्म इत्यादि वंशों तथा शास्त्रों के अनुकूल चलनेवाले राजा के सुशासन में ही तो उत्पन्न होते हैं।
हे दृढ़ धनुर्धारी ! प्रशंसा के भाजन शास्त्रों का अध्ययन, दोषहीन ज्ञान, स्वार्थत्याग, उत्तम आचरण, ये सब वंदनीय गुरुजन ही हैं (अर्थात्, गुरुओं के कारण ही ये सब दृढ़ रहते हैं)।
हे प्यारे ! ये उत्तम गुरु कौन हैं ? यदि परिशुद्ध मन से विचार करके देखा जाय तो (विदित होगा कि) माता और पिता के अतिरिक्त अन्य (गुरु) कोई नहीं हैं।
शास्त्रों के ज्ञान से युक्त हे भाई ! माता ने वर माँगा। पिता ने भी आज्ञा दी। अपने उत्तम कुल की नीति के उपयुक्त कार्य ही मैंने किया। अब तुम्हारी प्रार्थना से इस कार्य को छोड़ना क्या उचित होगा ?
हे तात ! पुत्रों का कर्त्तव्य अपने कार्य से माता-पिता की कीर्त्ति को बढ़ाना होता है, या कभी न मिटनेवाला अपयश उत्पन्न करना होता है ?
अयोध्याकाण्ड २६३
क्या मेरे लिए यह उचित है कि पिता के वचन को भुलाकर वैभव तथा ऐश्वर्य- पूर्ण राजभोग का अनुभव करता हुआ शासन करूँ और उससे इस लोक में पिता को असत्य- वादी तथा परलोक में कठोर नरक-भोगी बना दूँ ?
‘पिता के दिये वर के अनुसार पृथ्वी का राज्य तुम्हारा है । तुम ( उस राज्य का निर्वाह करने योग्य ) शक्ति तथा सामर्थ्य से युक्त भी हो । अतः, राज्य तुम्हारा ही स्वत्व है, तुम राज्य करो’—राम ने जब यों कहा, तब भरत ने कहा—
यह पृथ्वी, जिसपर त्रिभुवन में भी अपनी समता न रखनेवाले आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता बनकर अवतीर्ण हैं, यदि मेरी है, तो अब इसे मैंने आपको दिया। हे राजन् ! आप लौटकर मुकुट धारण करें ।
जब सारा संसार व्याकुल हो रहा है, तब स्तंभ-तुल्य भुजाओं से युक्त आपको क्या यह उचित है कि आप अपने मन के अनुसार कार्य करें ? अतः, संसार की व्याकुलता को शांत करते हुए लौट चलिए और ( संसार की ) रक्षा कीजिए, यों कहकर भरत ने रामचन्द्र के मनोहर चरणों को पकड़ लिया ।
तब राम ने भरत से कहा—मुझपर प्रेम होने के कारण यदि तुम संसार को मुझे सौंप दोगे, तो क्या वह न्याय-संगत होगा ? अपयश से डरकर पिता ने जो वर दिया, उसको मानकर जिस वनवास के लिए मैं आया हूँ, क्या ( अब राज्य स्वीकार करने से ) उस ( वनवास ) की अवधि पूरी हो जायगी ?
संसार में क्या सत्य के अतिरिक्त अन्य कोई पवित्र गुण है ? उस सत्य से दुर्गुण भी मिट जाते हैं, किन्तु सत्य से कुछ हानि नहीं होती है । तुम ठीक विचार कर देखो ।
पिता की आज्ञा के अनुसार मैं चौदह वर्ष वन में निवास करूँगा । तुम मेरी आज्ञा से इन चौदह वर्षों तक, सत्य से विचलित न होते हुए, पिता से दिये गये राज्य का पालन करो ।
चक्रवर्ती के जीवित रहते हुए भी यदि रत्नमय मुकुट को धारण करने के लिए मैं सहमत हुआ, तो वह पिता की आज्ञा का उल्लंघन न करने के लिए ही था । ( राज्य करने की इच्छा मुझे नहीं थी । ) मेरा उस प्रकार सहमत होने की बात जानकर भी तुम क्यों मेरी आज्ञा का पालन नहीं करना चाहते हो ? हे भ्राता ! दुःख को दूर करो । मेरे कथनानुसार कार्य करो । यों राम ने भरत से कहा ।
जब शोभा से पूर्ण रामचन्द्र ने ये वचन कहे, तब कुछ उत्तर देने के लिए उद्यत, समुद्र के समान गंभीर भरत को रोककर वसिष्ठ (राम से) बोले—हे उदारगुण ! तुम्हारे वंश में उत्पन्न कुछ प्राचीन राजाओं के आचरण के संबंध में तुम्हें सुनाता हूँ। उन्हें ध्यान से सुनो—
विष्णु ने पूर्वकाल में अनुपम वराह-रूप धारण करके, उमड़ते हुए समुद्र से अपने एकदंत के मध्य रखकर भूमि को यों उठाया कि वह बढ़ती हुई चंद्रकला के मध्य कलंक- जैसा दृश्य उपस्थित करने लगा।
पूर्व कल्प के अंत में, जब पंचमहाभूत अपने-अपने तत्त्वों में लीन हो गये, तब विष्णु, विस्तीर्ण जल को उत्पन्न करके उसपर ज्योति-रूप में निद्रित होने लगे ।
२६४ कंब रामायण
इस प्रकार (क्षीरसागर मे) शयन करते रहनेवाले, देवो को अमृत प्रदान करने-वाले समुद्र-जैसे नीलवर्ण विष्णु भगवान् की नाभि से एक शतदल (कमल) उत्पन्न हुआ, जिसमेंसे सारी सृष्टि करनेवाला ब्रह्मा उत्पन्न हुआ।
ब्रह्मा के द्वारा सृष्ट ससार की रक्षा के लिए तुम्हारे कुल का आदि पुरुष सूर्य उत्पन्न हुआ। उस सूर्य-कुल में अबतक कोई ऐसा राजा नही हुआ, जो न्याय से हटा हो। एक बात और सुनो।
हे मत्तगज-सदृश ! हित करनेवाले पाँच प्रकार के गुरुओ मे (अर्थात् माता, पिता, अध्यापक, राजा और ज्येष्ठ भ्राता इनमें) वही उत्तम गुरु होता है, जो इह और परलोक दोनो में सुख उत्पन्न करनेवाली शिक्षा प्रदान करता है (अर्थात्, आचार्य ही सर्वोत्तम गुरु हैं)।
(शास्त्रो मे) इसी प्रकार कहा गया है। मैने तुम्हे विविध विद्याएँ सिखाई हैं। अतः, हे तात ! इस समय मेरी आज्ञा का उल्लंघन मत करो। लौटकर राज्य का सुशासन करो—यो (वसिष्ठ ने) कहा।
यो कहनेवाले वसिष्ठ को अरुणनेत्र राम ने मुकुलित कमलों को शोभाहीन कर देनेवाली अपनी अंजलि से नमस्कार किया और कहा—हे मन पर दमन रखनेवाले ! हे ज्ञानी ! आपसे एक निवेदन है—
मधु बहानेवाले कमल पर आसीन ब्रह्मा के पुत्र ! चाहे कोई बड़े हों, गुरु हों। माता आदि हो, सत्य-परायण पुत्र हो, चाहे कोई भी हो, किसी के लिए भी मैं यह कार्य करूँगा—यो प्रतिज्ञा कर लेने पर उस प्रतिज्ञा को तोड़ना उचित नही है।
माता की आज्ञा को तथा पिता के द्वारा अनुमत कार्य को जो पुत्र पूर्ण नही करता है, उसके जैसा पापी बनकर रहने की अपेक्षा कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के ज्ञान से हीन श्वान बनकर सर्वत्र भटकते रहना अच्छा है।
पहले से ही माता-पिता की आज्ञा को मैने अपने शिर पर धारण कर लिया है। उसके पश्चात् अब आप दूसरी आज्ञा दे रहे हैं। हे महात्मन् ! अब मेरा कर्त्तव्य क्या है ? आप ही बतायें—यों राम ने वसिष्ठ से पूछा।
तब वसिष्ठ राम की प्रतिज्ञा के विरुद्ध कुछ नही कह सकने के कारण मौन हो रहें। उस समय भरत ने कहा—यदि ऐसी बात है, तो जो चाहे राज्य करे। मैं तो अपने ज्येष्ठ भाई के साथ ही इस भयंकर वन मे रहूँगा।
उस समय देवता लोग आकाश-पथ मे एकत्र होकर यह सोचने लगे कि यदि अब भरत रामचन्द्र को अयोध्या लौटा ले जायगा, तो हमारा कार्य पूर्ण नही होगा और फिर बोल उठे—
प्रशंसा के योग्य उत्तम गुणो से युक्त राम, पिता का वचन सुरक्षित करते हुए इस वन में रहे और भरत का कर्त्तव्य है कि वे चौदह वर्ष-पर्यंत, राज्य की रक्षा करें।
देवताओ के यो कहने पर राम ने भरत से कहा—यह वचन उपेक्षा करने योग्य नही है। मेरा भी तुम से यही आग्रह है। अब मेरी आज्ञा से तुम सुचारु रूप से पृथ्वी का
अयोध्याकाण्ड २६५
राज्य करो—यो कहकर राम ने भरत के विशाल कमल-जैसे करो को अपने हाथो मे ले लिया ।
तब भरत ने कहा—यदि ऐसा हो, तो हे प्रभु ! चौदह वर्ष व्यतीत होते ही यदि आप भयकर परिखा से घिरे अयोध्या-नगर में आकर पृथ्वी का शासन नही संभालेंगे, तो मै प्रज्वलित अग्नि मे प्रविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दूँगा ।
इस प्रकार कहकर भरत चिंता से विमुक्त हुए । अपने यश से भी महान् स्वभाव-वाले राम ने उन ( भरत ) की मानसिक दृढता को देखकर प्रेम से द्रवित होते हुए चित्त के साथ कहा—‘वैसा ही करूँगा ।’
भरत अब और कुछ न कह सके । रामचन्द्र से वियुक्त होकर जाना उनके लिए कठिन था । उन्होने व्याकुल होकर राम से प्रार्थना की कि आप कृपा करके अपनी पादुकाएँ मुझे दे । प्रभु ने भी समस्त सुखो को प्रदान करनेवाली अपनी पादुकाएँ भरत को दी ।
अश्रु बहानेवाले नेत्रो तथा धरती की धूलि से धूसर शरीर से युक्त भरत ने ( प्रभु की ) दोनो पादुकाओ को किरीट मानकर अपने शिर पर रख लिया । फिर, धरती पर गिरकर रामचन्द्र के प्रति साष्टाग प्रणाम करके लौट चले ।
माताएँ, असख्य बंधुजन, बड़े लोग, मुनिगण, विशाल सेना तथा अन्य सब लोग भरत के साथ चले और यज्ञोपवीत से शोभायमान कंधेवाले वसिष्ठ महर्षि भी चले ।
प्राचीन शास्त्रो के ज्ञाता भरद्वाज महर्षि लौट चले । परिखा से आवृत अयोध्या के निवासी लौट चले । आकाश-पथ मे एकत्र हुए सभी देवता लौट गये । मेघ-सदृश राम की आज्ञा लेकर गुह भी लौट चला ।
भरत ( प्रभु की ) पादुकाओ को शिर पर रखे, शीतल जल से युक्त गंगा को पार करके, पुष्पों की सुरभि से भरी अयोध्या मे न जाकर रात्रिकाल में भी निद्रा से विहीन हो—
नंदिग्राम नामक स्थान मे ऐसे रहने लगे, मानो प्रभु की पादुकाएँ ही शासन करती रही हो । भरत, रात-दिन अश्रु-विहीन न होनेवाली आँखों के साथ, मन से पंचेन्द्रियो का दमन करके वहाँ रहने लगे ।
उधर रामचन्द्र, यह विचार कर कि अयोध्या के निवासी, उनके चित्रकूट पर्वत पर रहने से प्रेम के कारण, बार-बार वहाँ आयेंगे, इसलिए अपने साथी अनुज लक्ष्मण तथा अपनी देवी के साथ (चित्रकूट को छोड़कर) दक्षिण दिशा में चल पड़े । ( १-१४१ )
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कंब रामायण
अरण्यकाण्ड
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मंगलाचरण
आदि ब्रह्म भेद-रहित है तथा उत्पत्ति तथा विकारो से युक्त नाना प्रकार के रूपों ( वस्तुओ ) मे अनन्य होकर मिला रहता है । वह, उन वेदों के लिए, जो पुनः-पुनः उनका अध्ययन करते रहने से ज्ञान के यथार्थ स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, एवं उन वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों और ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी अज्ञेय है; वही परब्रह्म (अव रामचन्द्र के रूप में) हमारे ज्ञान का विषय हो गया है ।
<div align="center">●</div>अध्याय १
विराध-वध पटल
मनोहर वक्र धनुष को धारण करनेवाले वे राजकुमार ( राम-लक्ष्मण ), उन सीता देवी के साथ, जिनके दंत ऐसे थे, मानो चुनी हुई मुक्ताएँ पंक्तियों में जड़कर रखी गई हो, अपूर्व तपस्या से संपन्न अत्रि महामुनि के, पत्र-फल से परिपूर्ण घने वृक्षोंवाले वन मे जा पहुँचे ।
दिशाओ मे महान् भार का वहन किये हुए रहनेवाले, पीन और मनोहर सूँड़ो-वाले तथा छोटी आँखोवाले पर्वत-सदृश गजों की समता करनेवाले वे ( राम-लक्ष्मण ), उस वन मे प्रविष्ट हुए और काम आदि तीन दुर्गुणों को दूर करके तपस्या करनेवाले अतिपवित्र अत्रि मुनि को प्रणाम किया ।
वे मुनिवर ऐसे प्रसन्न हुए, जैसे अपने बन्धु ही आ गये हों और बोले—हे राजकुमारो ! तुम स्वयं यहाँ आकर हमें दर्शन दे रहे हो, ऐसे सौभाग्य सदा सुलभ नही होता । यह तो ऐसा है, मानो सब देवता तथा सभी लोक ही यहाँ आ गये हों । न जाने हम में से किसकी तपस्या का यह फल है ।
३०० | कंब रामायण
वे (राम-लक्ष्मण) उस दिन वहीं उस मुनि के साथ आश्रम में रहे। फिर, उन जानकी को, जिन्होंने उस मुनिवर की पवित्रता तथा अत्युत्तम पत्नी अनसूया की आज्ञा से सुन्दर आभूषणों, वस्त्रों एवं चन्दन को धारण किया था, साथ लेकर चले और महान् दंडकारण्य में प्रविष्ट हुए।
तब उनके सम्मुख एक राक्षस आया, जो चौदह नयनवाले, उनसे दुगुने विषैले, गोलाकार एवं कठोर नयनोंवाले पर्वतव्यापी चौदह हरणों को, अति तीक्ष्ण घोर त्रिशूल में घने रूप में पिरोकर एक हाथ में लिये हुए था।
उसके सिर पर रक्त वर्णवाले घुँघराले घने बाल थे, मानो विष ही घोर रूप धारण करके चन्दनवन से आ रहे हों। वह इस प्रकार शीघ्रगति से आया कि बड़े बड़ों से घिरे पर्वत भी उसके पैरों के नीचे दबकर धूल के समान हो गये।
ताले फल के समान (लाल) दिखाई पड़नेवाली उसकी आँखों से स्फुलिंग निकल रहे थे। उसके नेत्रों से विष आकाश की ओर उठता था; पर्वत हिल जाते थे; उष्णकिरण (सूर्य) मंद पड़ जाता था। विशाल समुद्र में घिरी अरती लहर नीचे ही रहती थी। अति बलवान् यम भी मन में (डर से) शिथिल हो उठता था।
उत्तप्त सिंह, उसके कानों में (उन्हें पर्वत की कंदरा समझकर) प्रवेश करके गरज रहे थे। चारों ओर कांति बिखेरनेवाले मेरु-शिखर उसके कुंडल बने हुए थे। उसने साथ युद्ध में मरे हुए वीरों के रक्त-रूपी रक्तचन्दन से लिप्त होकर वह रक्त-आकाश की नकल करता था।
उसने आयुधधारी वीरों, शीघ्रगामी अश्वों, अति विशाल गजों, रथों, गर्जनशील सिंहों, प्राणहारी व्याघ्रों तथा नागों ने प्राय अनेक जन्तुओं को मारकर, उजले ढाँचे में उन्हें गूँथकर अनेक प्रकार की मालाएँ बना ली थीं और वे (मालाएँ) उसकी भुजाओं में लटक रही थीं।
उसकी उँगलियों के मध्य ग्रंथियों में रखे हुए पर्वतों के समान क्रोध में गर्जन करनेवाले गज दबे पड़े थे; जिन्हें वह अपने विशाल कर से उठा-उठाकर अति विशाल विष-सदृश अपने मुँह में भर लेता था और (मुँह के) एक ओर से उन्हें चबा रहा था, तो भी उसकी भूख बढ़ती ही रहती थी।
उत्तम स्वर्ग के वनों से रत्नों को निकालकर जिस प्रकार माला बनाते हैं, उसी प्रकार अप्सराओं की देह में, देवताओं के विमानों, उज्ज्वल नक्षत्रों एवं नक्षत्रों की बीच-बीच में जड़कर उसने विजय-मालाएँ बनाई थीं और उन्हें अपने वक्ष पर धारण कर लिया था।
उसके पाँवों में रत्नाकार की समता करनेवाले केश शोभ रहे थे। उसके कुंभ-सदृश कंधे पर इन्द्र का ऐरावत बँधा हुआ था; जिसका मुखपृष्ठ तथा दांतों के फलक चमक रहे थे।
(उसमें) अत्यन्त घनी कालिमा संयुक्त थी। तीक्ष्ण अत्याचार उमड़ रहा था। अति निष्ठुर पाप, विष, अग्नि—ये सब भयंकर रूप से बढ़ रहे थे। अतः, वह ऐसा लगता था, मानो अंधकार से लिप्त कलिकाल ही साकार होकर आ रहा हो।
अरण्यकाण्ड ३०१
मारे हुए कठोर व्याघ्रो के चर्म को ऐंठकर उसे (उत्तरीय के रूप मे) पहन लिया था। हाथियों के चर्मों को कटि मे बाँध लिया था। विजयी दिग्गजों के रत्न-समुदाय को अजगर-रूपी रस्सी में पिरोकर कटि-बध के जैसे बाँध लिया था।
रक्त नयनों एवं दीर्घ देहवाले अनुपम सर्पों की मणियो को जड़कर अनेक वलय उसने अपने शरीर मे पहन लिये थे। उसके करो में 'चलांचल' नामक शब्दायमान शंखो के वलय चमक रहे थे।
उसके पैर ऐसे थे कि वह उन पैरो से कैलास और मेरु पर्वत को गेंद के समान उछालकर उन्हे परस्पर टकरा सकता था। ऐसे पैरो से गंभीर गति मे वह चल रहा था। यद्यपि वह भूलोक में संचरण कर रहा था, तथापि देवलोक के निवासियो के मन मे भी उसके बल का प्रभाव पड़ता था।
उसका आकार ऐसा था, मानो सब प्राणी एक रूप बनकर और नवीन आकृति धारण करके आ गये हो। उसकी कंठध्वनि वज्रघोष के समान थी। (उसकी तपस्या से) प्रसन्न हुए ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से वह सवा लाख हाथियो के बल से युक्त था।
महावज्र-सदृश कार्य करनेवाला विराध नामक वह राक्षस जब आ रहा था, तब (उसकी गति के वेग से) उसके दोनो पार्श्वों में वृक्ष उखड़-उखड़कर धराशायी हो रहे थे। बड़े पर्वत ढह जाते थे। यो वह उन धनुर्धारियो के सम्मुख आ पहुँचा, जिनको अपनी वीरता के योग्य युद्ध अभी तक प्राप्त नही हुआ था।
मास चबानेवाले लबे दाँतो, बलिष्ठ खड्ग-दंतो से चमकनेवाले अपने कंदरा-सदृश मुँह को खोलकर 'ठहरो, ठहरगे', चिल्लाता हुआ वह आया और घने दलवाले कमल पर आसीन रहनेवाली लक्ष्मी रूपी (राम की) देवी को, एक शब्द का उच्चारण करने के समय मे ही, झट उठाकर आकाश-मार्ग से जाने लगा।
वृषभ-सदृश वे दोनो वीर उसकी आकृति को देखकर क्रोध से उग्र हो उठे और कंधे पर के धनुष को वाम हस्त मे लेकर, उज्ज्वल तथा तीक्ष्ण नोकवाले बाण को दक्षिण कर में लेकर उस राक्षस का पीछा करते हुए बोले—अरे, इस प्रकार धोखा देकर कहाँ जा रहा है ? तब उस विराध ने (कहा—)
ब्रह्मा के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से मै मृत्यु-रहित हूँ। समस्त लोकों के निवासी भी यदि मेरा सामना करने आयें तो, मै किसी आयुध के बिना ही उन सब को जीत सकता हूँ। अरे ! मैने तुम्हारे प्राण छोड़ दिये हैं। इस स्त्री को छोड़कर सुख से चले जाओ, यो विराध ने कहा। तब—
वीर (राम) ने अपने रजत मदहास-रूपी ज्योत्स्ना को प्रकट करते हुए कहा—इस (राक्षस) ने युद्ध क्या है—यह जाना नही है। अब इसके प्रताप और बल सब मिट जायँगे—फिर, मन मे विचार करके अपने भारी धनुष का टकार किया।
वर्षाकालिक मेघ-सदृश रामचन्द्र ने, जो वज्र-सम वरछे एवं अपार पराक्रम से युक्त थे, अपने कोदण्ड की लबी डोरी से जो घोर टकार उत्पन्न किया, वह तरंगायमान समुद्रो से
३०२ | कंब रामायण
आवृत्त तथा भूधरों से भरित पृथ्वी में, पाताल में, स्वर्गलोक में तथा अन्य सब लोकों में वज्र-घोष के समान प्रतिध्वनित हो उठी।
तब वह राक्षस, वंचक तथा अत्याचारी मार्जार के मुँह में फँसे हुए तोते के समान चिल्लानेवाली सीता को छोड़कर किंचित् विकल-चित्त-सा खड़ा सोचता रहा। फिर, विक्षुब्ध होकर अंजनपर्वत-सदृश राम के सम्मुख आ खड़ा हुआ।
फिर, उसने अपने त्रिशूल को, जो शत्रुओं के रक्त में डूब-डूबकर पिशाचों की भूख को मिटाता रहता था और जो अपने तीनों नोकों से वडवाग्नि के सदृश ज्वालाएँ उगलता था, घुमाकर (रामचन्द्र पर) फेंका।
वह त्रिशूल हालाहल विष के समान उज्ज्वल हो अतिवेग से आने लगा, जिसे देखकर अष्ट दिशाएँ, दिक्पाल दिग्गज तथा सर्वलोक काँप उठे। तब राम ने महामेरु और सप्त कुलपर्वत-समान अति दृढ़ दीर्घ कोदंड में एक अपूर्व बाण रखकर प्रयुक्त किया।
आज से राक्षस-समूह का नाश हो गया—ऐसी सूचना देते हुए, दिन में ही मानों गगन से नक्षत्र गिर रहे हों—ऐसा दृश्य उपस्थित करते हुए चारों ओर प्रकाश फैलानेवाला वह शूल दो टुकड़े हो गया और दिशाओं के अंत में जा गिरा।
देवताओं का भी दमन करनेवाले उस शूल को टूटकर गिरते हुए देखकर भी उस राक्षस ने युद्ध करना छोड़ा नहीं। किन्तु, अधिक उत्साह दिखाता हुआ धरती को कँपा देनेवाले अपने हाथों से अनेक पर्वतों को जड़ से उखाड़कर त्वरित गति से वह (राम पर) फेंकने लगा।
रामचन्द्र ने अति दृढ़ तथा अति तीक्ष्ण बाणों को उन (पर्वतों) पर छोड़ा, जिससे घेरकर आनेवाले वे पर्वत टूटकर नीचे गिर गये। वह राक्षस एक-एक करके जो पर्वत फेंकता था, वे लौटकर उसी की देह पर गिरते थे, जिससे उसके शरीर में अनेक घाव हो गये।
तब उसने एक बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उसको लेकर उस राम पर आक्रमण करने के लिए आया, जिनके नामों को ज्ञानी पुरुष जपते रहते हैं, जो धर्म को स्थापित करने के लिए सर्पशय्या को छोड़कर इस धरती पर अवतीर्ण हुए हैं। तब—
उत्तम वीर (राम) ने चार बाणों से उस बड़े वृक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये और (राक्षस के) कंधों और वक्ष में बारी-बारी से अत्यन्त वेग से अनेक अति तीक्ष्ण बाण मारे, तब वह राक्षस—
अपने शरीर में अति पैने बाणों के छिद जाने से बहुत पीड़ित हुआ और त्वरित गति से अपने शरीर को झटकाकर उन बाणों को छितराने लगा, जैसे कोई बहुत बड़ा साही अपनी देह पर के काँटों को फुलाकर खड़ा हो।
तब राम ने और भी अग्नि-समान तीक्ष्ण बाणों को प्रयुक्त किया, जो कहीं भी रुके बिना (उसके शरीर को) भेद देते थे। फिर भी, उस (राक्षस) का चित्त पापमुक्त नहीं हुआ। पर्वत से गिरनेवाले निर्झर के समान उसके शरीर से रक्त बहने लगा। जिससे वह दुर्बल तथा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।