कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
५४० कंब रामायण
करने का निश्चय कर लिया। इतने मे अपूर्व तपस्या-सपन्न लोकसारग मुनि नं मेरे सम्मुख आकर मुझे सान्त्वना दी।
(उन्होने कहा—) अशिक्षित मूढजनों के समान मन के (अनुचित) उत्साह के कारण तुमने देवताओ के सुरक्षित लोक में जाने का प्रयत्न किया। तुम्हारे बहुत ऊपर उड़ जाने से तुम्हारे पख झुलस गये और तुम धरती पर आ गिरे हो। अब और कुछ दिनो तक अपने प्राणो को सुरक्षित न रखकर उनको त्यागने की चेष्टा करना उचित नही है। (अर्थात्, सूर्य के कथनानुसार वानरो के आगमन तक तुम्हे प्राण रखे रहना ही उचित है)।
फिर सपाति ने कहा—हे अति वलाढ्य वीरो! उस दिन उन मुनिवर ने करुणा करके मुझसे यह भी कहा था कि जो घमंडी होता है, उसका विनाश निश्चित है। मायावी (रावण) के द्वारा जब सीता हरी जाकर अदृश्य हो जायगी, तब उसका अन्वेषण करते हुए वानर लोग आयेंगे। उनके राम-नाम का उच्चारण करने पर तुम्हारे पख निकल आयेंगे। अतः, तुम दुःखी मत होओ।
हे देवविस्मयकारी कार्य करनेवाले, उत्तम वीरो! मेरे दुःख से दुःखी जटायु, मेरी आज्ञा का भंग करने से डरकर, गगनगामी गिद्धों का राजा बना। यही हमारा वृत्तान्त है। अब तुमलोग इस स्थान पर आने का अपना वृत्तांत भी सुनाओ।
सपाति के यह कहने पर वानरो ने राम के प्रति नमस्कार करके उससे कहा—हे मातृ-तुल्य! नीच कृत्यवाला राक्षस (रावण) दक्षिण दिशा में सीता देवी को ले गया है। यही सोचकर हम उस (देवी) को ढूँढ़ते हुए यहाँ आये हैं। वानरो का यह कथन सुनकर सपाति ने कहा—तुमलोग चिंता मत करो। मैं इस सबंध में तुम्हें कुछ बातें बताऊँगा।
शर्करा-रस के समान मधुर बोलीवाली सीता को जब वह पापी राक्षस ले जा रहा था, तब मैने उसे देखा। वह उसे लंका मे ले गया है। व्याकुल चित्तवाली उस देवी को घोर बंधन मे डाल रखा है। वह देवी अब भी वही है। तुम लोग जाकर देखो।
शब्दायमान समुद्र से आवृत वह लंका यहाँ से सौ योजन पर स्थित है। उस लका पर, कठोर पाश से युक्त यम भी अपनी दृष्टि नही डाल सकता। उस क्षुद्रगुणवाले राक्षस का क्रोध अग्नि को भी शान्त करनेवाली दूसरी अग्नि है। हे दोषरहित एव सद्गुणो से पूर्ण वीरो! तुम्हारे लिए उस लका मे जाना कैसे सभव होगा?—यो सपाति ने पूछा।
आगे उसने कहा—चतुर्मुख और अर्द्धनारीश्वर की बात तो दूर, क्षीर-समुद्र मे शेषनाग पर शयन करनेवाला विष्णु भी हो और यम भी हो, तो उनके लिए भी विशाल समुद्र के पार-स्थित उस लंका मे प्रवेश करना असभव है। हे चिरजीवियो! भावी कार्यों के परिणामो को सोचकर आगे बढ़ो।
उस प्राचीन (लका) नगरी मे तुम सबका प्रवेश करना असभव है। यदि किसी मे सामर्थ्य हो, तो वह अकेले वहाँ जाय। अदृश्य रूप में, वहाँ रहकर सीता देवी को (प्रभु का दिया हुआ) संदेश देकर उसके दुःख को शांत करे और लौट आये। यदि ऐसा सामर्थ्य तुममें से किसी में नही है, तो मेरी बात पर विश्वास करो और रामचन्द्र के पास जाकर उन्हें समाचार दो।
किष्किन्धाकाण्ड ५४१
शासक के न होने से सारा गृध्र-समाज अपने आवास को छोड़कर बिखर जायगा। उस दुर्दशा को रोकने के लिए मुझे शीघ्र जाना आवश्यक है। हे मित्रो ! जिसमें हित हो, वही कार्य करो ।—यों कहकर संपाति अपने पंखों से आकाश को ढकता हुआ उड़ चला। ( १--६६ )
अध्याय १६
महेन्द्र-शैल पटल
कुछ वानर, यह निश्चय कर कि गृध्रराज झूठ बोलनेवाला नहीं है, अन्य वानरों से कहने लगे—कर्त्तव्य को शीघ्र संपन्न करनेवाले हे वीरो ! हमने ( सीता के समाचार को ) हाथ के आँवले के समान पूरा जान लिया है। जीवन देनेवाला एक वचन हमने सुन लिया। अब कर्त्तव्य का ठीक-ठीक विचार करके कुछ करो।
यदि हम सूर्य्यपुत्र और उज्ज्वल धनुष को धारण करनेवाले को नमस्कार करके सारा वृत्तांत उन्हें सुना दें, तो हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जायगा। फिर, भी वीरता का कार्य तो यही होगा कि हम स्वयं समुद्र को पार कर सीता के दर्शन करें। हममें से समुद्र को पार करने का सामर्थ्य रखनेवाला कौन है ?—यों परस्पर प्रश्न कर वे एक-एक करके अपनी-अपनी शक्ति का वर्णन करने लगे।
पहले हमने मरने का साहस किया। सदा अमिट रहनेवाले अपयश को लेकर लौटने का भी साहस किया। अब उन दोनों कार्यों से छुटकारा पाने का एक अच्छा मार्ग ( संपाति के द्वारा ) हमने प्राप्त किया है। अब समुद्र को पार कर काले राक्षसों को मिटाने का सामर्थ्य रखनेवालो ! हमारे प्राणों को बचाओ।
युद्ध में विजय से भूषित होनेवाले नील आदि उत्तम वीरों ने, समुद्र पार करने की अपनी असमर्थता को स्पष्ट कह दिया। वीरता से पूर्ण युद्ध में विजयी वाली-पुत्र ने कहा—मैं समुद्र के उस पार तो जा सकता हूँ, किंतु लौट आने की शक्ति मुझमें नहीं है।
चतुर्मुख ( ब्रह्मा ) के पुत्र ( जाम्बवान् ) ने कहा—हे भुजबल से पूर्ण वीरो ! वेदों के लिए भी दुर्जय भगवान् ( विष्णु ), सारी धरती को एक ही पग से नापने लगा था। उस समय, मैं आठों दिशाओं में उस ( त्रिविक्रम ) की परिक्रमा करता हुआ गया और ( उस भगवान् के अवतार होने की ) घोषणा करता हुआ घूमने लगा था। मेरु के आघात से मेरे पैर दुखने लगे थे। अतः अब इस महान् समुद्र पर उछलकर जाने और लंका की परिखा के पार बने हुए प्राचीर पर कूदने और उस नगर के राक्षसों को भयभीत कर सीता का अन्वेषण करने की शक्ति मुझमें नहीं रह गई है।
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फिर, ब्रह्मपुत्र जांबवान् ने अंगद से कहा—वानर-वीरो मे उत्तम सिंह-सदृश हे कुमार ! हम अब अत्यन्त दुःखी होकर किसके पास जाकर प्रार्थना करें कि तुम समुद्र के पार जाओ । ऐसा विचार करने से भी तो हमारा यश मिटता है ।
अब हमारे यश को सुरक्षित रखनेवाला वह मारुति ही है, जिसने पूर्व मे रामचन्द्र के सम्मुख जाकर (सुग्रीव को) उनका सखा बनाया था । वही (मारुति) कर्त्तव्य का ठीक-ठीक विचार करके उसे पूरा करने का सामर्थ्य रखता है । उसकी समानता करनेवाला और कोई नही है । इस प्रकार कहकर फिर, जाबवान् हनुमान् के भुजबल की प्रशंसा करते हुए ये वचन कहने लगा ।
(जांबवान् हनुमान् को देखकर कहने लगा—) ब्रह्मदेव भी मर सकता है, किन्तु तुम्हारी मृत्यु कभी नही होगी । तुमने सर्वशास्त्रो का गहन अध्ययन किया है । विषयो का ठीक-ठीक प्रतिपादन करने की शक्ति भी तुममे है। तुम्हारे वल और क्रोध को देखकर काल भी काँप उठता है। तुममें कर्त्तव्य कर्म करने की दृढता है। विष का पान करनेवाले शिवजी के समान ही तुममें घोर युद्ध करने की शक्ति भी विद्यमान है।
अत्युष्ण रक्तवर्ण अग्नि से, जल से तथा वायु से भी तुम मरनेवाले नही हो । अनेक-विध प्रसिद्ध दिव्य आयुधो से भी तुम्हारा विनाश नही हो सकता । तुम्हारा उपमान कुछ बताना हो, तो केवल तुम्ही अपने उपमान हो । एक बार कूदो, तो तुम इस ब्रह्मांड से परे भी जा पहुँचोगे ।
अच्छे गुणों को ही नही, बुरे गुणो को भी पहचान कर स्पष्ट कहने की सामर्थ्य तुममें है। स्वय ही कर्त्तव्य को जानकर उसे पूर्ण करने की शक्ति तुममें है। तुम (शत्रुओ पर) विजय पा सकते हो । (लका में जाकर) लौट आने की शक्ति भी तुम रखते हो । यदि वे अपना बल दिखावें, तो उन्हें मारने की शक्ति भी तुममें है। तुम्हारा भुजबल कभी घटता नही ।
तुम्हारी महिमा मेरु से भी ऊँची है। मेघ से बरसनेवाले जल की बूँद में भी प्रवेश कर जाने की शक्ति तुममें है। धरती को भी उठा लेने का बल तुममें है। कोई भी पाप-भावना तुममें नही है। तुम्हारी ऐसी शक्ति है कि सूर्य को भी अपने सुन्दर करों से छू सकते हो ।
तुमने उचित उपायो को ठीक-ठीक सोचकर, धर्म का नाश किये बिना, युद्ध-कुशल वाली का वध करवाया । तुम्हारा बुद्धि-कौशल ऐसा है। प्रसिद्ध देवेन्द्र ने जब वज्र से तुम पर आघात किया था, तब तुम्हारा एक छोटा-सा रोया भी टूटकर नही गिरा।
तुम्हारी भुजाओ में ऐसी शक्ति है कि यदि तीनो लोक भी तुम्हारा सामना करने आयें, तो उन भुजाओ के लिए त्रिभुवन की वस्तुएँ भी कुछ चीज नही होगी । धरती के अंधकार को मिटानेवाले सूर्य के निकट, उसके रथ के आगे-आगे चलते हुए, तुमने सस्कृत (के व्याकरण) का ज्ञान प्राप्त किया था ।
तुम नीति में स्थिर हो, सत्य-पूर्ण हो, मन में कभी स्त्री-संगति का विचार
किष्किन्धाकाण्ड ५४३
तक नहीं लाते। सब वेदों का अध्ययन किया है। ब्रह्मा की आयु से भी अधिक आयु-वाले हो। तुम भी ब्रह्माओं में से एक कहलाते हो।
उस महिमामय प्रभु (राम) की भक्ति से युक्त हो। अपने कर्त्तव्य का पूर्ण ज्ञान रखते हो। तुमने अपने ऊपर (सीता का अन्वेषण करने का) दायित्व लिया है। बिना किसी बाधा के उसे पूर्ण करने का सामर्थ्य भी तुममें है। तुमने अपने मन में दृढ़ रूप से यह स्थापित कर लिया है कि एकमात्र पुण्य ही सदा स्थिर रहनेवाला है।
समय अनुकूल न होने पर तुम दबकर रह सकते हो। यदि युद्ध छिड़ जाय, तो उसमें सिंह के समान शक्तिमान् हो सकते हो। सोच-विचार करके जो कार्य आरंभ किया हो, केवल उसी को नहीं, किंतु, किसी भी कार्य को पूर्ण करने की शक्ति तुममें है। कठिन बाधाएँ उत्पन्न होने पर भी तुम पीछे हटनेवाले नहीं हो।
विजयशील इन्द्र से लेकर, सब व्यक्ति तुम्हारे चारित्र्य को ही आदर्श मानकर चलते हैं। तुम अत्यन्त सहनशील हो। अतः, सब कार्यों को ठीक ढंग से सोचकर करने का सामर्थ्य तुममें है। सभी इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करने की शक्ति भी तुममें है।
तुम्हीं इस समुद्र को पार करने की शक्ति रखते हो। अतः, यहाँ से शीघ्र जाओ और हम सबको जीवन देकर यश प्राप्त करो। इससे तुम्हारी माता-तुल्य सीता देवी भी प्रसन्न होंगी और विपदा-रूपी अपार सागर को पार कर सकेंगी—इस प्रकार ब्रह्मपुत्र (जांबवान्) ने कहा।
जांबवान् ने जब ऐसा कहा, तब अत्यन्त ज्ञानवान् हनुमान् के दीन मुख पर मंदहास इस प्रकार विकसित हुआ, जिस प्रकार कमलपुष्प के मध्य रक्तकुमुद विकसित हो उठा हो। उसके कमल-जैसे कर मुकुलित हो गये। सब वानरों के आनंदित होते हुए, उसने अपने भावों को इन शब्दों में प्रकट किया—
तुम लोग ऐसे हो कि कुछ सोचने के पूर्व ही, ऊँची तरंगों से पूर्ण सातों समुद्रों को पार कर सकते हो, सब लोकों को जीत सकते हो और सीता देवी का अन्वेषण करके उन्हें ला सकते हो। ऐसा होने पर भी मुझ ज्ञानहीन की लघुता को प्रकट करने के लिए ही तुमने मुझे यह आदेश दिया है। अब मेरे समान भाग्यवान् और कौन होगा?
यदि तुम लोग कहोगे कि लंकापुरी को उखाड़कर ले आओ, या यदि कहोगे कि लोक-कंटक राक्षसों को मिटाकर, स्वर्णमय ताटंकधारिणी कलापी-तुल्य सीता को ले आओ, तो मैं तुम्हारे आदेश के अनुसार ही वह कार्य करूँगा। शीघ्र ही तुम अपनी आँखों से देखोगे।
जिस प्रकार विष्णु भगवान् ने धरती को नापा था, उसी प्रकार एक शतयोजन को एक पग में समाता हुआ मैं इस विशाल समुद्र को पार करूँगा। यदि इन्द्र आदि देवता भी आकर (रावण की ओर से) मेरे साथ युद्ध करेंगे, तो भी लंका में निवास करनेवाले सब राक्षसों का विनाश करके अपने कार्य को मैं अवश्य पूरा करूँगा।
यदि समुद्र उमड़कर सारी धरती को डुबोने लगे, या यह सारा ब्रह्मांड ही टूटकर अंतरिक्ष में उड़ जाय, तो भी मैं, मेरे प्रति दिखाई गई तुम्हारी कृपा और प्रभु की आज्ञा इन