भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पहला अध्याय

१५

मिलता। इसी प्रकार जो लोग सदा एकान्त में रहते हैं और कर्म नहीं करते, जहाँ संसार के साथ उनकी मुठभेड़ हुई, और पतित हुए। “धोबी का कुत्ता घर का न घाट का।”

इसी प्रकार जो रात दिन सांसारिक आन्दोलन में व्यस्त रहता है वह कदापि एकान्त-सेवन का अधिकारी नहीं। वह यथार्थ में विक्षिप्तालय (पागलख़ाने) भेजने योग्य है। सच्चा और सिद्धान्ती पुरुष वह है जो चुपचाप एकान्त-वास करता हुआ भी कर्म से कभी उपराम नहीं करता। एवं रात दिन सांसारिक आन्दोलन और क्रिया-कलाप में तत्पर रहता हुआ भी मनोनिग्रह और आत्म-संयम द्वारा यथार्थ में एकान्त सेवन करता है। क्योंकि जिसका मन एकान्त होगया है, स्थान की अनेकान्तता उसके उद्देश में बाधा नहीं डाल सकतीं। हाँ, जिसका मन ही अनेकान्त है, स्थान की एकान्तता उसे कुछ लाभ नहीं पहुँचा सकती। जिसने अपने मन को एकाग्र कर लिया, मानो जगत् को जीत लिया। वह जनसमूह में रहता हुआ भी, जहाँ लोगों के कलकल शब्द से कान बहरे होते हैं, शान्त-चित्त रहता है। उसका मन मानो किसी योगी की गुफा है, जहाँ कोई शब्द नहीं पहुँच सकता। वह इस दशा में भी कर्म से विमुख नहीं है। यह कर्मयोग का स्वरूप है। यदि तुमने इस आदर्श को प्राप्त कर लिया है तो तुम कर्म के रहस्य को समझ गये हो।

किन्तु हमको आरम्भ में भिन्न भिन्न कामों को हाथ में लेकर क्रमशः उन्नति करनी है। जैसे शनैः शनैः हम आगे बढ़ते चले जावेंगे, वैसे ही दिन प्रति दिन हम उदार और संयमी बनते चले जावेंगे। जिस कर्म को हमने कर्त्तव्य या अपनी दशा के अनुकूल

१६ कर्मयोग

समझ कर स्वीकार किया है, दृढ़ता और परिश्रम के साथ विश्वास-पूर्वक हमें उसे करते रहना चाहिए। इस प्रकार नियमपूर्वक कर्म करने से एक वर्ष के भीतर ही हमारी दशा बहुत कुछ बदल जायगी। जो कुछ स्वार्थ के संस्कार हमारे मन में होंगे वे अभ्यास की अग्नि में जल जावेंगे और थोड़े ही दिनों के पश्चात् हम निष्काम कर्म के महत्व को समझ जावेंगे। कभी कभी यदि स्वार्थ-बुद्धि उत्पन्न भी होगी तो हम सहज में उसे दबा सकेंगे। यदि इसी प्रकार काम होता रहा तो जैसे बहते हुए नदी-नाले समुद्र में पहुँच जाते हैं, वैसे ही एक ऐसा समय हमारे जीवन में भी आ जायगा, जब कि हम बिलकुल शान्त और निष्काम हो जावेंगे। और, जब हममें, काम-वासना न रहेगी तो हमारे संपूर्ण संस्कार और शक्तियाँ बाहर क्षीण न होकर हमारे भीतर ही सञ्चित होने लगेंगी। तब आपही आप हमारे हृदय में ज्ञान का प्रकाश होगा और हम सत्य के दर्शन कर सकेंगे।

दूसरा अध्याय

दूसरा अध्याय

निष्काम कर्म का महत्त्व

दूसरों को शारीरिक सहायता देना और उनकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करना बहुत अच्छा काम है। परन्तु वह सहायता, जो आवश्यकतानुसार दी जाती है, सर्वोपरि सिद्ध हुई है। उसका प्रभाव नित्य और दूरगामी है। वह व्यक्तियों को लाभ पहुँचाती हुई जातीय आवश्यकताओं को भी पूर्ण करती है। यदि एक घण्टे के लिए किसी मनुष्य की कोई आवश्यकता पूरी कर दी जाय तो यह सहायता अवश्य कहलावेगी। किन्तु यदि एक वर्ष के लिए उसकी आवश्यकता पूरी कर दी गई है, तो यह उसकी अपेक्षा अधिक सहायता मानी जावेगी। और, यदि, सदा के लिए (जीवन भर के लिए) उसकी आवश्यकता पूरी कर दी गई तो फिर इसका क्या कहना है। यह सबसे बड़ी और सबसे उत्तम सहायता है। आत्मिक ज्ञान ही एक ऐसी वस्तु है जिससे सदा के लिए हमारे दुःखों की समाप्ति हो जाती है। और प्रकार के ज्ञान से केवल थोड़ी देर के लिए हमारी तृप्ति हो जाती है। केवल अपने स्वरूप का ज्ञान ही हमें सदा के लिए दुःखों से मुक्ति दिलाता है। इसलिए आत्मिक सहायता सबसे बड़ी और प्रधान सहायता है। जो मनुष्य इस प्रकार की आत्मिक सहायता दे सकता है, वह

१८ कर्मयोग

मनुष्य-समाज का सच्चा मित्र और सच्चा गुरु है। इतिहास हमें बतला रहा है कि जिन लोगों ने मनुष्य की आत्मिक आवश्यकताओं के पूरा करने का प्रबन्ध और यत्न किया है वे बड़े प्रभाव-शाली पुरुष हुए हैं, और उन्होंने संसार की काया पलट दी है। वास्तव में आत्मिकता ही हमारे जीवन के सारे कर्मों की कुञ्जी है। आत्मिक बल-युक्त पुरुष यदि चाहे तो अन्य विषयों में भी असाधारण सफलता प्राप्त कर सकता है। बिना आत्मिक बल के सांसारिक और शारीरिक आवश्यकतायें भी यथेष्ट पूर्ण नहीं हो सकतीं। आत्मिक सहायता के पश्चात् बुद्धि और मन की सहायता है। शिक्षा और ज्ञान की सहायता, भोजन और वस्त्र की सहायता से कहीं अधिक है। यह प्राण-रक्षा और जीवन-दान से भी अधिक आवश्यक है। क्योंकि मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश ही विद्या और ज्ञान की प्राप्ति करना है। अज्ञान मृत्यु है और ज्ञान ही जीवन है। यदि मनुष्य अज्ञान के कारण अँधेरे में भटकता और टटोलता फिरता है तो उसका जीवन व्यर्थ ही नहीं किन्तु दुःखदायक है। इसके बाद फिर शारीरिक सहायता का नम्बर आता है। इसलिए दूसरों की सहायता करते समय हमको कभी इस भूल में न पड़ना चाहिए कि केवल शारीरिक सहायता ही सब कुछ है। शारीरिक सहायता सबसे पिछली है, क्योंकि इससे स्थिर सुख नहीं मिलता। भूख का दुःख खाना खा लेने से शान्त हो जाता है, पर थोड़ी देर बाद फिर हमें भूख सताने लगती है। हमको शान्ति या सन्तोष तभी हो सकता है जब कि सदा के लिए हमारी आवश्यकतायें पूरी हो जावें। और यह केवल

दूसरा अध्याय १६

दूसरा अध्याय १६

आत्मिक ज्ञान से सम्भव है। इसलिए ज्ञान की सहायता सबसे बड़ी सहायता है।

संसार के दुःख केवल शारीरिक सहायता से दूर नहीं हो सकते। जब तक मनुष्य अपने मन का संयम और इन्द्रियों का निग्रह नहीं करता, तब तक उसे शारीरिक आवश्यकतायें बराबर सताती रहेंगी और वह क्लेशों से पीड़ित होता रहेगा। चाहे जितनी उसे शारीरिक सहायता पहुँचाई जावे, परन्तु उसके कष्ट दूर न होंगे। अज्ञान ही सारे दुःखों और पापों की जड़ है। अविद्या के अन्धकार को मिटाओ, मनुष्य से कहो कि वह आत्मिक बल प्राप्त करे। यदि मनुष्य को उत्तम शिक्षा दी जावे और उसका आत्मा शुद्ध और बलवान् बना दिया जावे, तो फिर कोई घटना उसे दुःख न पहुँचा सकेगी। भूखों के लिए सदावर्त और रोगियों के लिए औषधालय खोलना धर्म का काम है। परन्तु जब तक मनुष्य को सच्ची शिक्षा न दी जायगी, उसकी भूख तथा रोग सदा के लिए नहीं मिट सकेगा।

भगवद्गीता में बार बार यह उपदेश किया गया है कि नियत हो कर निरन्तर कर्म करना चाहिए। परन्तु कोई कर्म संसार में ऐसा नहीं है, जिसमें धर्म और अधर्म दोनों संयुक्त न हों। किसी कर्म में धर्म अधिक है और अधर्म कम; किसी में अधर्म अधिक और धर्म कम। यह बात स्मरण रक्खो, कोई भी शुभ कर्म ऐसा नहीं है जिसमें पाप का लेश न हो और कोई भी अशुभ कर्म ऐसा नहीं है जिसमें पुण्य का लेश न हो। प्रत्येक कर्म में पाप-पुण्य दोनों मिश्रित रहते हैं। तभी तो इनमें विवेक की आवश्यकता है। विवेक

२०

कर्मयोग

के द्वारा शुभ कर्म में से अशुभ को निकाल डालो या दबा दो; एवं अशुभ में से शुभ कर्म को चुन लो या धारण करो; इसी का नाम पाण्डित्य है और यही बुद्धिमत्ता है ✻। शुभ कर्म का फल इष्ट और अशुभ कर्म का फल अनिष्ट है और ये दोनों आत्मा के बन्धन के हेतु हैं। भगवद्गीता ने इस बन्धन से छूटने का जो उपाय बतलाया है, वह यह है कि यदि तुम किसी कर्म से अपने को बाँध नहीं देते तो उसका फल तुम्हारे लिए बन्धन का हेतु न होगा। हमको विचारपूर्वक यह समझ लेना चाहिए कि इस अनासक्ति (बेतअ़ल्लुक़ी) का यथार्थ में क्या अभिप्राय है ?

गीता कहती है कि कर्म करो। परन्तु कर्म से या उसके फल से अनासक्त (बेतअ़ल्लुक़) रहो। संस्कार (मन की वासनायें) सक्ति को उत्पन्न करती हैं। इसको समझाने के लिए हम एक दृष्टान्त देते हैं। मनुष्य का मन एक सरोवर है, इसमें लहरें उठा करती हैं। ये लहरें यद्यपि किसी समय शान्त हो जावें तथापि सदा के लिए मर नहीं जातीं, किन्तु अपने पीछे कुछ चिह्न छोड़ जाती हैं। सम्भव है, आगे चल कर इनसे और लहरें उत्पन्न हों। ये चिह्न ही संस्कार


✻ गीता में लिखा है कि जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है, वही बुद्धिमान् और कर्मवान् है। इसका यह आशय कदापि नहीं है कि कर्म को अकर्म और अकर्म को कर्म समझे, किन्तु इसका आशय भी यही है कि कोई कर्म ऐसा नहीं है जिसमें अकर्म की आशङ्का न हो और न कोई अकर्म ऐसा है, जिसमें कर्म की संभावना न हो। अतएव जो कर्म में से अकर्म को हटा कर उसका आचरण करता है, एवं अकर्म में से भी कर्म को चुन कर ले लेता है और अकर्म का त्याग कर देता है वह निश्चय बुद्धिमान् और कर्मयोग का जाननेवाला है।

दूसरा अध्याय २१

दूसरा अध्याय २१

हैं और उनसे और लहरों के पैदा होने की सम्भावना रहती है। जो कर्म हम करते हैं (चाहे वह शारीरिक चेष्टा हो या मानसिक सङ्कल्प) मन पर सब का चित्र पानी में बुलबुले की तरह खिंच जाता है। ये चित्र चाहे बाहर न देख पड़ें, पर भीतर ही भीतर काम करने की इनमें सारी शक्ति विद्यमान होती है और वे अनवरत अपना काम करते रहते हैं। हमारी वर्त्तमान अवस्था इन संस्कारों या पूर्वसञ्चित कर्मों के प्रभावों का संघात है। प्रत्येक मनुष्य का चरित्र इन्हीं संस्कारों के साँचों में ढलता है। जैसे संस्कार होंगे वैसा ही चरित्र भी होगा। जो मनुष्य सदा बुरी बातें सुना करता है, बुरी भावनायें मन में रखता है और बुरे कर्म किया करता है, उसका मन बुरे संस्कारों से भरा रहेगा। और उससे सदा वैसेही कर्म और संकल्प प्रकट होते रहेंगे और उसकी प्रकृति ही वैसी पड़ जायगी। इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य अच्छी भावनायें मन में रखता है, वाणी से अच्छे वचन बोलता है और शरीर से अच्छे कर्म करता है तो उसके संस्कार भी अच्छे होंगे और वे उसे खींच कर पुण्य की ओर ले जायेंगे। यदि वह भूल कर पाप करना भी चाहेगा तो उसके मन में एक प्रकार का क्षोभ उत्पन्न हो जायगा, जिससे उसे पाप करने का साहस न होगा। जब शुद्ध भावनाओं की धारणा से शुभ कर्म करते करते उसकी धार्मिक प्रवृत्ति हो जायगी तो फिर उसके लिए पाप-कर्म की शङ्का ही मिट जायगी; उसका मन फिर पाप-कर्म की ओर भूल कर भी न जायगा। उसके हृदय में शुद्ध संस्कार जाग्रत् होंगे, जो उसके जीवन को धर्म के साँचे में ढाल कर ध्रुवा के समान अचल बना देंगे।

२२

कर्मयोग

जिस प्रकार कछुआ अपने हाथ-पैर और सिर को भीतर की ओर सिकोड़ लेता है, उसकी पीठ पर कितनी ही मार क्यों न पड़े, वह कभी सिर बाहर न निकालेगा, इसी प्रकार जिस मनुष्य का चारित्र्य बन गया है और जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, वह कभी मर्यादा से बाहर पाँव न रक्खेगा। वह अपने समस्त आन्तरिक भावों पर अधिकार रक्खेगा। कोई प्रलोभन उसको अपने अध्यवसाय से नहीं हटा सकता। लगातार शुभ संकल्पों की भावना और शुभ कर्मों के अभ्यास से उसके संस्कार पवित्र हो जाते हैं। इस प्रकार जब मनुष्य का चरित्र पवित्र हो जाता है तब उससे किसी प्रकार के अनर्थ या अनिष्ट की सम्भावना नहीं रहती। ऐसे महात्मा पुष्प की सुगन्धि के समान होते हैं, जो अपना प्रभाव दुर्जनों पर भी डालते हैं, पर दुर्जनों के प्रभाव को अपने पास तक नहीं आने देते ❊। ऐसे ही धर्मात्मा पुरुष जिज्ञासु तथा मुमुक्षु बन सकते हैं। तुमको स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक योग का उद्देश मोक्ष ही है। कर्मयोग हो वा ज्ञानयोग, दोनों का फल वा लक्ष्य एक ही है। कर्म करने से भी मनुष्य उसी पदवी को पहुँचेगा, जिसको बुद्ध भगवान् ने ध्यान से और ख्रीष्ट ने प्रार्थना से पाया था। पूर्ण स्वाधीनता का नाम मोक्ष है और यह स्वाधी-


❊ सत्सङ्गात् भवति हि साधुता खलानां साधूनां नहि खलसंगमात्खलत्वम् । आमोदं कुसुमभवं मृदेव धत्ते मृद्गन्धं नहि कुसुमानि धारयन्ति ॥

सज्जन पुरुषों के संग से दुर्जनों में भी सुजनता आ जाती है, पर दुर्जनों के संग से सज्जनों में नीचता नहीं आती। पुष्प के गन्ध को मृत्तिका धारण करती है, पर मृत्तिका के गन्ध को पुष्प धारण नहीं करते।

दूसरा अध्याय २३

दूसरा अध्याय २३

नता शुभ और अशुभ इन दोनों से परे है। न पुण्य का बन्धन हो, न पाप का। सोने की ज़ंजीर भी वैसी ही बुरी है जैसी कि लोहे की। कल्पना करो कि मेरे हाथ में काँटा गड़ गया, उसके निकालने के लिए मैंने दूसरे काँटे को ले लिया, जब उससे काम ले चुका अर्थात् काँटा निकल गया, तब दोनों ही को फेंक देता हूँ। मुझको दूसरे काँटे के रखने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हैं तो दोनों ही काँटे। इसी प्रकार शुभ संस्कारों से अशुभ संस्कार तथा पुण्य-वृत्ति से पाप-वृत्ति दबाई या मिटाई जाती है। जब बुरे संस्कार दब गये या मिट गये तब अच्छे संस्कारों को भी दबा लेना चाहिए। केवल यही एक उपाय है जिससे हम कर्म करते हुए उसके प्रभाव से निर्लेप रह सकते हैं। कर्म अवश्य करो, लहरों को आने और जाने दो, पर सावधान रहो कि वे कर्म तुम्हारे मन पर दृढ़ संस्कार न जमाने पावें। मस्तिष्क और मन से बड़े बड़े विचार और आविष्कार होते रहें, किन्तु सावधान रहो कि आत्मा पर उनका प्रभाव न पड़ने पावे। यह किस प्रकार हो सकता है? हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि उस कर्म का प्रभाव, जिससे हमारा घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, हमारे मन पर शेष रहता है।

दिन के समय हज़ारों मनुष्यों को हम देखते हैं और ऐसे मनुष्यों से भी मिलने का संयोग होता है जिनको हम प्यार करते हैं। जब रात को एकान्त में जाकर हम उन आकृतियों का, कि जो दिन में हमने देखी थीं, ध्यान करने लगते हैं तो केवल उनको देखते या स्मरण करते हैं, जिनको हम प्यार करते हैं। सम्भव है कि क्षण भर के लिए ही ये आकृतियाँ हमारी दृष्टि के सम्मुख आई हों, परन्तु

२४ कर्मयोग

स्नेह या प्रेम का सम्बन्ध होने से इन्हीं का प्रभाव मन पर शेष रहता है, शेष सब विस्मृत हो जाती हैं। जिससे जितना अधिक सम्बन्ध होगा, उतना ही अधिक उसका प्रभाव मन पर रहेगा। यद्यपि मन पर सब आकृतियों का प्रतिबिम्ब एक ही रीति पर पड़ता है, तथापि मूर्त्ति उसी की साफ़ उतरती है जिससे मन को कुछ लगाव होता है। चाहे तुमने अपने किसी प्रिय मित्र को निमेष मात्र ही देखा हो और उसको तुम नहीं भूलते और जिनसे तुम्हारा विशेष सम्बन्ध नहीं है, उनको चाहो तुम बहुत देर तक भी देखते रहे हो, पर थोड़ी देर में भूल जाते हो और उनका देखना न देखना बराबर हो जाता है। यही दशा कर्मों की है। यदि तुम फल की वासना रखते हुए कर्म करोगे तो तुम कभी उनके बन्धन से अपने को न बचा सकोगे। हाँ, कर्त्तव्य समझ कर निष्काम भाव से चाहे दिन रात तुम कर्म करते रहो, तुम पर उनका कुछ भी प्रभाव न होगा।

इसलिए, यदि तुम स्वाधीनता चाहते हो तो निःसङ्ग बनो। मस्तिष्क को काम करने दो, मन को रचना-चतुर बना रहने दो, और शरीर को लगातार कर्म करने दो। पर इस बात का ध्यान रहे कि संसार की एक लहर भी मन को चञ्चल और विवश न करने पावे। आगन्तुक या अतिथि की अवस्था में काम करो। रात-दिन कर्म करने में तत्पर रहो, पर संसार की किसी वस्तु से अपने को सम्बद्ध न होने दो। क्योंकि बन्धन या अधीनता आत्मा के लिए जैसी अप्रिय है वैसी और कोई वस्तु नहीं।

यह संसार हमारे रहने की जगह नहीं है, किन्तु हमारे विश्राम के लिए एक पथिकाश्रम (मुसाफ़िरख़ाना) है। सुनो, सांख्य

दूसरा अध्याय २५

दूसरा अध्याय २५

क्या है ? "प्रकृति आत्मा के लिए है, आत्मा प्रकृति के लिए नहीं।" यही सांख्य की शिक्षा का सार है। प्रकृति की विद्यमानता केवल आत्मा की शिक्षा के लिए है। इसके सिवा और उसका कुछ भी प्रयोजन नहीं है। प्रकृति इसलिए है कि आत्मा को ज्ञान की प्राप्ति हो और ज्ञान प्राप्त करके वह मोक्ष पद को पालेवे। यदि हम इस रहस्य को सदा स्मरण रक्खेंगे तो प्रकृति कभी हमारे लिए बन्धन का कारण न होगी। हम बराबर समझते रहेंगे कि प्रकृति हमारे स्वाध्याय के लिए एक पुस्तक है जिसका हमें अध्ययन करना है। और जहाँ हमको विद्या प्राप्त हो गई, फिर पुस्तक से कुछ प्रयोजन नहीं रहता। किन्तु हम भ्रान्ति में पड़ कर अपने आपको प्रकृति समझ लेते हैं। हम सोचने लगते हैं कि आत्मा प्रकृति के लिए है और वह मांस और चर्म का पिण्ड है। जीना खाने के लिए है और खाना जीने के लिए नहीं है। हम रात-दिन इसी भ्रान्ति में पड़े हुए हैं, अर्थात् अपने आपको शरीर और प्रकृति मान रहे हैं। यही कारण है कि हम इसके बन्धन से छूट नहीं सकते। भला कैसे छूट सकते हैं, जब कि हम इसके दास या सेवक बन कर काम करते हैं ?

वेदान्त की शिक्षा का सार यह है कि तुम स्वामी और स्वाधीन बन कर स्वामित्व और स्वाधीनता की दशा में काम करो। प्रकृति के सेवक और उपासक न बनो। काम सदा करते रहो, पर वह भृत्य का काम न हो। क्योंकि जो लोग दीन या अधीन होकर काम करते हैं, उनके काम में स्वार्थ की मात्रा अधिक होती है। काम स्वाधीनता और प्रेम के साथ होना चाहिए। जब तक स्वाधीनता न हो, तब तक सच्चा प्रेम हो ही नहीं सकता, दास में कभी सच्चा

२६ | कर्मयोग

प्रेम न होगा। तुम उसे बन्धन में डाल कर काम लेते रहो, वह काम करता रहेगा, परन्तु उसका काम प्रेमपूर्वक न होगा। इसी प्रकार जब तक हम अर्थों के दास एवं मन और इन्द्रियों के अधीन होकर अपने लिए काम करते हैं, तब तक सच्चा प्रेम और विश्वास हमारे हृदय में उत्पन्न हो न होगा। ऐसे ही जो काम अपने सम्बन्धियों और मित्रों के लिए किया जाता है, उसमें भी स्वार्थ है और जहाँ स्वार्थ है वहाँ बन्धन और दुःख है। केवल निष्काम कर्म में ही सच्चा प्रेम रहता है और जहाँ सच्चा प्रेम है, वहीं सच्चा सुख और सच्ची शान्ति है। वास्तविक जीवन, वास्तविक ज्ञान और वास्तविक प्रेम का परस्पर नित्य सम्बन्ध है, और सच तो यह है कि ये तीनों एक ही हैं। जहाँ एक की स्थिति होगी, वहाँ दूसरे भी अवश्य होंगे। यथार्थ में ये तीनों एक ही वस्तु के तीन अंग हैं। इन्हीं को सत्, चित्, आनन्द भी कहते हैं। सत् हमारा जीवन है, चित् उसमें ज्ञान है और आनन्द ही प्रेम है, जिसको हमारा हृदय अनुभव करता है। जहाँ ईर्ष्या या दुःख है, वहाँ सच्चा प्रेम कदापि नहीं रहता। कल्पना करो कि एक मनुष्य किसी स्त्री पर आसक्त है। वह चाहता है कि वह स्त्री सिवा उसके दूसरी ओर न देखे। ईर्ष्या की आग उसके हृदय में भड़कती रहती है। वह स्त्री को सर्वथा अपने अधीन रखना चाहता है। वह आप भी उस स्त्री का दास है और उस स्त्री को भी अपना दास बनाना चाहता है। यह प्रेम नहीं है। यह दास की नीच और स्वार्थमयी वासना का फल है। इससे प्रेम की अवज्ञा होती है। यदि वह उसकी इच्छा के अनुसार काम नहीं करती तो उसको दुःख होता है। प्रेम में दुःख

दूसरा अध्याय २७

कहाँ ? प्रेम में तो आनन्द ही आनन्द है। जिस प्रेम में आनन्द नहीं है उसको कभी भूल कर भी प्रेम न कहो। प्रेम के विषय में संसार में बड़ी भ्रान्ति फैली हुई है। जब तुमको अपनी पत्नी, अपने पति और अपने पुत्र-मित्रादि से प्रेम करने में दुःख या ईर्ष्या उत्पन्न न हो और न स्वार्थ का भाव मन में आने पावे, तब तुम समझो कि तुम्हारा सच्चा प्रेम है और तुम निःसङ्ग और स्वाधीन बन सकते हो।

कृष्ण भगवान् कहते हैं—हे अर्जुन ! “यदि मैं थोड़ी देर के लिए भी कर्म करना छोड़ दूँ तो यह जगत् उत्सन्न हो जावे। यद्यपि मुझको कुछ कर्त्तव्य और प्राप्तव्य नहीं है, क्योंकि मैं आप्त-काम हूँ। न कर्म और उसके फल में मेरी वासना है, तथापि मैं कर्म करता हूँ, क्योंकि मुझे जगत् से प्रेम है। और इस प्रेम से ही सच्चा त्याग उत्पन्न होता है।” जहाँ भौतिक सम्बन्ध होता है, जहाँ मनुष्य सांसारिक विषयों में लिप्त रहते हैं वहाँ केवल शारीरिक सम्बन्ध रहता है। शरीर के परमाणुओं में आकर्षण उत्पन्न होता है, जिसके कारण दो भिन्न भिन्न शरीर थोड़ी देर के लिए एक दूसरे से मिलते हैं और यदि उनका मिलाप नहीं होता तो दुःख उत्पन्न होता है। पर जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ भौतिक सम्बन्ध का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। सच्चा प्रेम रखनेवाले मनुष्य चाहे हज़ारों कोस के अन्तर पर रहते हों, पर उनके प्रेम की दशा एक जैसी होगी। ऐसा प्रेम कभी मरता नहीं, चाहे शरीर भले ही नष्ट हो जावें। और न कभी उसमें दुःख की आशंका होती है।

इन नैष्कर्म्य पदवी के प्राप्त करने में कई जन्म लग जाते हैं। परन्तु जहाँ यह प्राप्त हो गई, मानो मनुष्य-जीवन का अभीष्ट सिद्ध

२८ कर्मयोग

हो गया। प्रेम का कोष हाथ आ गया और हम स्वाधीन हो गये। प्रकृति का बन्धन टूट गया। हम प्रकृति को उसके वास्तविक रूप रङ्ग में देखने लग जायँगे और फिर वह हमारे बन्धन के लिए नई कड़ियाँ और नई ज़ञ्जीरें न बना सकेगी। जहाँ अधीनता है, वहीं स्वार्थ-बुद्धि है और जहाँ स्वार्थ-बुद्धि है, वहीं फल की इच्छा है। जो मनुष्य स्वाधीन होकर प्रेम के साथ काम करता है, उसको कभी फल की इच्छा न होगी। और जब कि उसका कोई स्वार्थ नहीं है तो कर्म-फल उसके लिए दुःखदायक नहीं हो सकता।

क्या तुम कभी अपने पुत्रों से भी प्रेम का बदला चाहते हो? कभी नहीं। यह तुम्हारा धर्म है कि तुम उनके लिए काम करो। ऐसे ही जहाँ तुमको किसी मनुष्य-विशेष या नगर-विशेष या देश-विशेष के लिए काम करने की आवश्यकता हो वहाँ दृढ़ता और प्रेम के साथ काम करो। पर इनके साथ भी तुम्हारा बर्ताव वैसा ही हो, जैसा अपने लड़कों के साथ हुआ करता है। बदला, सेवा का मूल्य या फल की कभी इच्छा न करो। यदि तुम निःस्वार्थ लोगों को दान देते हो, निष्काम संसार का उपकार कर रहे हो तो विश्वास रक्खो कि तुम्हारा कर्म कभी बन्धन का हेतु न होगा। बन्धन केवल वहाँ होता है, जहाँ फल की इच्छा रहती है।

सेवक की भाँति काम करने में स्वार्थ-बुद्धि कभी जा नहीं सकती और वही बन्धन का हेतु है। यदि तुम स्वामी की भाँति कार्य करो तो उस काम का सच्चा प्रेम और आनन्द होगा। हम लोग प्रायः न्याय और अधिकार के विषय में वाद-विवाद करते रहते हैं। पर हम देखते हैं कि संसार में न्याय और अधिकार की वातें बच्चों

दूसरा अध्याय

२६

की बकवास से अधिक गौरव नहीं रखतीं। केवल दो वस्तुएँ हैं, जो मनुष्य के चारित्र्य की रचना या रक्षा करती हैं। एक दया और दूसरी शक्ति। शक्ति के घमण्ड में रहना और उसका अभ्यास करना स्वार्थ-परता है। प्रत्येक पुरुष या स्त्री अपने अधिकार और शक्ति से लाभ उठाने की चिन्ता में अहर्निश व्यग्र रहते हैं। दया स्वर्ग का द्वार है, जिसको धर्मात्मा बनना हो वह दया करे। न्याय, अधिकार और शक्ति इन सब का यथार्थ उपयोग भी दया पर निर्भर है। कर्म का बदला चाहने से आत्मिक उन्नति के मार्ग में रुकावट उत्पन्न होती है, जिससे आत्मा दुःखित होता है। फल से कुछ सम्बन्ध न रख कर केवल कर्म करने से बन्धन नहीं होता।

एक दूसरा उपाय भी है जिससे दया और निःस्वार्थ उदारता को चरितार्थ किया जा सकता है। वह यह है कि कर्म को "उपासना" समझ कर करो। यदि तुमको एक ईश्वर पर विश्वास है तो यह कर्म ही उसकी उपासना है। अतएव कर्म करो और उस का फल ईश्वर के अर्पण कर दो। जब तुम ईश्वर के उपासक हो तो फिर तुमको कब यह अधिकार है कि उससे उन कर्मों के फल की वाञ्छा रक्खो, जो तुम संसार के लिए कर रहे हो। ईश्वर स्वयं बिना किसी के सम्बन्ध और बिना किसी स्वार्थ के काम करता है। इसी प्रकार तुम भी करो। जैसे जल कमल-पत्र को तर नहीं कर सकता वैसे ही निष्काम कर्म करनेवालों के लिए कर्म बन्धन का हेतु नहीं होता। निःस्वार्थ पुरुष चाहे बड़े से बड़े नगर में रहे, चाहे वह निरन्तर पापियों से घिरा रहे, परन्तु वह कभी पाप-कर्म न करेगा।

३० कर्मयोग

निम्नलिखित आख्यान से इसका विशेष विवरण होगा। जब कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया तब पाण्डवों ने बहुत बड़ा यज्ञ किया, जिसमें दीनों को बहुत कुछ दान दिया गया। सब को आश्चर्य हुआ, क्योंकि कहीं ऐसा दान न देखने में आया न सुनने में। जब यज्ञ समाप्त हो गया तब एक नकुल वहाँ आया। उसका आधा शरीर सोने का था और आधा भूरे रङ्ग का। वहाँ आकर वह यज्ञ में लोटने लगा। थोड़ी देर के पश्चात् वह यज्ञ-कर्त्ताओं को सम्बोधन करके कहने लगा—“तुम सब के सब झूठे और धोखा देनेवाले हो। यह यज्ञ नहीं है।” यज्ञ-कर्त्ताओं ने कहा--“तुम क्या कहते हो ? क्या कभी पहिले किसी यज्ञ में इतना दान हुआ था ? देखो कङ्गाल धनी और दुःखी सुखी बन गये।” न्यौले ने उत्तर दिया--“सुनो, एक छोटा सा गाँव था। उसमें एक दीन ब्राह्मण सकुटुम्ब रहता था। इसके कुटुम्ब में चार प्राणी थे, एक वह आप, दूसरी उसकी स्त्री, तीसरा उसका पुत्र और चौथी उसकी पुत्रवधू। इनकी आजीविका भिक्षा पर निर्भर थी। दैव-दुर्विपाक से देश में तीन वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ा। वह ब्राह्मण अत्यन्त ही दरिद्र था, इसलिए उसके कष्ट की कोई सीमा न रही। पाँच दिन तक बराबर चारों प्राणियों ने निराहार व्रत किया। छठे दिन किसी ने उनको थोड़े से यव (जौ) दिये, जिनके सत्तू बनाये गये। ब्राह्मण ने उचित रीति पर उसके चार भाग कर दिये। अभी खाने का आरम्भ नहीं हुआ था कि किसी ने द्वार खटखटाया। ब्राह्मण ने द्वार खोल दिया और अभ्यागत को भीतर आने की आज्ञा दी। आर्यावर्त्त में सदा से यह रीति चली आई है कि गृहस्थ आप भूखे रह कर भी अतिथि को

दूसरा अध्याय ३१

दूसरा अध्याय ३१

भोजन देते हैं। दीन ब्राह्मण ने अभ्यागत का स्वागत करके अपने भाग का सत्तू उसके सामने रख दिया। अभ्यागत भूखा था, एक सपाटे में सब खा गया और कहने लगा—"तुमने मुझको मार डाला। मैं दस दिन से भूखा हूँ। इस लघु भोजन ने मेरी भूख को और भी भड़का दिया।" तब ब्राह्मण की स्त्री ने अपने पति से कहा कि "मेरा भाग भी इसको दे दो।" पति ने कहा, "नहीं।" स्त्री हठ करने लगी "देखो, यह दीन मनुष्य आज हमारा अतिथि है, भूखा है। हमारा धर्म है कि हम इसको भोजन दें। क्योंकि मैं आपकी अर्द्धाङ्गिनी हूँ, इसलिए मुझको अधिकार है कि आपकी अतिथि-सेवा में भाग लूँ।" यह कह कर उसने भी अपना भाग अतिथि को अर्पण कर दिया। उसको भी खाकर अतिथि ने कहा कि मेरी भूख शान्त नहीं हुई। तब पुत्र ने कहा कि "मेरा भाग भी ले लो। क्योंकि मैं पिता के दाय का भागी हूँ, इसलिए अपने कर्त्तव्य-पालन में उसकी सहायता करना मेरा धर्म है।" किन्तु पुत्र के भाग को भी पा कर अतिथि की तृप्ति नहीं हुई। तब पुत्र की स्त्री ने भी अपना भाग उठा कर उसको दे दिया। अभ्यागत ने तृप्त हो कर भोजन किया और आशिष देकर वह वहाँ से प्रस्थित हो गया। उसी रात को ये चारों भूख का कष्ट सहते सहते मर गये। उस सत्तू की भूसी वहाँ भूमि पर पड़ी हुई थी। मैं उस पर लोटने लगा और मेरा आधा शरीर, जैसा कि तुम देख रहे हो, सुवर्ण का हो गया। उस समय से लेकर मैं बराबर संसार में इस उद्देश से भ्रमण कर रहा हूँ कि कहीं और ऐसा ही यज्ञ हुआ हो तो वहाँ लोट लगाऊँ और यह शेष आधा शरीर भी सुवर्ण का हो जावे। पर इस तुम्हारे

३२

कर्मयोग

यज्ञ में लोटने से ऐसा नहीं हुआ, इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम झूठे हो और यह यज्ञ नहीं है।

शोक कि उदारता और अतिथि-सेवा का यह आदर्श दिन प्रति दिन आर्यावर्त्त से लुप्त होता जा रहा है। जब मैंने पहले अँगरेज़ी पढ़ना आरम्भ किया, तब एक लड़के का वृत्तान्त पढ़ा जो बाहर काम करने के लिए गया हुआ था और विदेश से रुपया भेज कर माता की सहायता करता रहा। उसकी प्रशंसा में एक पुस्तक के चार पृष्ठ रँगे गये थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह क्या बात है। हिन्दू-सन्तान की दृष्टि में तो यह कोई असाधारण बात नहीं। पर अब मैंने समझा कि क्यों इस लड़के की इतनी प्रशंसा की गई थी। यूरोप में यह शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी चिन्ता आप करनी चाहिए। वहाँ प्रायः लोग केवल अपनी ही चिन्ता करते हैं और उनको इस बात की परवा तक नहीं होती कि माँ-बाप लड़के-बाले और घरवाली की क्या दशा होगी। यह अत्यन्त ही निन्दनीय प्रथा है। गृहस्थ के लिए यह आदर्श कभी न होना चाहिए।

अब तुम विचार करो कि कर्मयोग क्या वस्तु है? अन्तिम समय तक दूसरों का उपकार करना और प्रत्युपकार (बदले) का नाम तक मुँह पर न आने देना कर्मयोग है। दीनों को दान देकर कभी उनसे धन्यवाद या कृतज्ञता की आशा न करो। किन्तु तुम आप उनके कृतज्ञ बनो कि उनके कारण तुमको उदारता और दया के अभ्यास करने का अवसर हाथ आया। इसलिए गृहस्थाश्रम का धर्म संन्यासाश्रम के धर्म से कहीं कठिन है। कार्मिक जीवन त्याग के जीवन से कहीं दुराराध्य है।

तीसरा अध्याय

तीसरा अध्याय

धर्म क्या है ?

कर्मयोग की मीमांसा करने में यह जानना भी परमावश्यक है कि धर्म क्या है ? यदि मुझको कुछ काम करना है तो काम करने से पहले यह जान लेना चाहिए कि मेरा धर्म क्या है ? तभी मैं उसको भले प्रकार कर सकूँगा। धर्म के विषय में भिन्न भिन्न मतों के विचार भिन्न भिन्न हैं। मुसलमान कहते हैं कि जो कुछ कुरान में लिखा हुआ है, वही उनका धर्म है। हिन्दू कहते हैं कि वेद की जो आज्ञायें हैं, वही धर्म है। ईसाई अपनी इंजील का प्रमाण देते हुए उसकी आज्ञाओं को अपना धर्म बतलाते हैं। इन सब पर विचार करने से हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि मनुष्य-समुदाय के भिन्न भिन्न भागों में, इतिहास के भिन्न भिन्न समयों में और मनुष्य की भिन्न भिन्न जातियों में धर्म की अवस्था भिन्न भिन्न प्रकार की थी। और बहुत सी कठिन परिभाषाओं की तरह धर्म की व्याख्या करना भी कोई सुकर कार्य नहीं है। हम केवल पार्श्ववर्त्ती चिह्नों तथा कर्म के प्रत्यक्ष फलों को देख कर धर्म का कुछ विधान कर सकते हैं। जिस समय हमारी आँखों के सामने कोई घटना संघटित होती है, उस समय हमको विशेष रीति पर उसके कारण के

३४ कर्मयोग

अनुसन्धान करने की आवश्यकता प्रतीत होती है । धर्म के विषय में यह भाव सर्वगत मालूम होता है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने आत्मा के अनुकूल काम करना चाहिए । परन्तु प्रश्न यह है कि वह क्या वस्तु है, कि जो हमारे कर्म को धर्म का पर्याय बनाती है ? यदि किसी ईसाई को गोमांस मिल जाय और वह अपने प्राण बचाने के लिए उसको काम में न लावे तो वह समझेगा कि उसने पाप किया । परन्तु यदि किसी हिन्दू से ऐसा काम हो जाय तो वह इसे आत्मघात से भी अधिक पाप समझेगा । ये सब बातें सामयिक शिक्षा और संसर्ग के फल हैं । पिछली शताब्दी में भारतवर्ष में लुटेरों के समुदाय रहते थे, जिनको ठग कहते थे । मार्ग चलते हुए पथिकों को मार कर उनकी सम्पत्ति लूट लेना ही वे अपना धर्म समझते थे । जितने अधिक मनुष्यों की वे हिंसा करते थे, वे समझते थे कि उतनाही अधिक हमने धर्म का काम किया है, वैसे यदि भूल से भी किसी की गोली किसी के लग जाय तो उसे पश्चात्ताप होगा और वह समझेगा कि मैंने पाप किया है । यदि वही मनुष्य सिपाही बन कर लड़ाई में जावे तो एक दो को नहीं, किन्तु बीसियों मनुष्यों को मार गिरावेगा और इस बात का अभिमान करेगा कि मैंने धर्म का काम किया है । इसलिए धर्म के विषय में सर्वत्र एक ही प्रकार की व्यवस्था देना भारी भूल होगी पर तो भी धर्म का कुछ निरूपण किया जा सकता है । जिन कामों के करने से हम ईश्वर की ओर चलते हैं, या जिनसे हम ईश्वर की समीपता प्राप्त करते हैं, वे धर्म हैं। और जिन कर्मों के करने से हम ईश्वर से विमुख या दूर होते हैं या जो काम हम