कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Karpuramanjari Sattaka of Rajasekhara with Commentary
महाकवि राजशेखर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ कर्पूरमञ्जरी भैरवानन्दः—(स्वगतम्।) अज्ज वि ण एदि देवी। (प्रविश्य।) राज्ञी—(परिक्रम्यावलोक्य च।) अए, इअं भयवदी चामुंडा। (प्रण- मलोक्य च।) अथ इअं कप्पूरमंजरी। ता किं णेदं। (भैरवानन्दं प्रति।) इदं विष्णवीअदि, णिअभवणे विवाहसामग्गिं कडुअ आअद म्हि। तदो गेण्हिअ आगमिस्सं। भैरवानन्दः—वच्छे! एवं कीरदु। (राज्ञी व्यावृत्त्य परिक्रामति।) भैरवानन्दः—(विहस्य। स्वगतम्।) इअं कप्पूरमंजेरीघरं अण्णे- सिदुं गदा। (प्रकाशम्।) पुत्ति कप्पूरमंजरि! सुरंगादुवारेण ज्जेव तुरि- दपदं गदुअ णिअभवणे चिट्ठ। देवीआगमणे पुणो आगंतव्वं। (कर्पूरमञ्जरी तथा करोति।) देवी—इदं रक्खाघरं (प्रविश्यावलोक्य च) अए, इअं कप्पूरमंजरी। सा का वि सारिक्खिआ मए दिट्ठा। (प्रकाशम्।) वच्छे कप्पूरमंजरि! कीदिसं भैरवानन्दः— अद्यापि नागच्छति देवी। राज्ञी— अये, इयं भगवती चामुण्डा। अथ इयं कर्पूरमञ्जरी। तत्किमिदम्? इदं विज्ञा- प्यते—निजभवने विवाहसामग्रीं कृत्वा आगतास्मि। ततस्तां गृहीत्वाऽगमिष्यामि। भैरवानन्दः— वत्से! एवं क्रियताम्। भैरवानन्दः— इयं कर्पूरमञ्जरीस्थानमन्वेष्टुं गता। पुत्रि कर्पूरमञ्जरि! सुरङ्गाद्वारेणैव त्वरितपदं गत्वा स्वस्थाने तिष्ठ। देव्यागमने पुनरागन्तव्यम्। देवी— इदं रक्षागृहम्। अये, इयं कर्पूरमञ्जरी। सा कापि सदृशा मया दृष्टा। वत्से कर्पूरमञ्जरि! कीदृशं ते शरीरम्? 1 'मञ्जरीठाणं' इति टीकाकृतः पाठः। 2 'सट्ठाणे' इति टीकानुगुणः पाठः।