कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Karpuramanjari Sattaka of Rajasekhara with Commentary
महाकवि राजशेखर द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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८० कर्पूरमञ्जरी लोआणं लोअणेहिं सह कमलवणं अद्धणिद्दं कुणंतो मुंचंतो तिव्वभावं सह अ संहरिसं माणिणीमाणसेहिं। मंजिट्ठारत्तसुत्तच्छविकिरणचओ चक्कवाएक्कमित्तो जादो अत्थाचलत्थो उवह दिणमणी पक्कणारंगपिंगो॥ ५० राजा—भो वअस्स! संणिहिदो संझासमओ वट्टदि। विदूषकः—संकेदकालो कथिदो बंदीहि। कर्पूरमञ्जरी—सहि विअक्खणे! गमिस्सं दाव। विआलो संपत्तो। विचक्षणा—एवं कीरदु। (इति परिक्रम्य निष्क्रान्ताः सर्वे।) इति द्वितीयं जवनिकान्तरम्।