करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतो दूसरा हमारा जो मत है, वो है भृंग - मता । यह क्या है ? भाई, बाकी जो जीव हैं, वो पेट में रखकर जन्म देते हैं बच्चे को । पर भृंगा यह नहीं कर रहा है । वो पल-भर में अपने समान कर रहा है । इस तरह हम भी आपको अपनी तरह करके चल रहे हैं। इसलिए जितने भी उदाहरण दिये, साहिब की वाणी से । बाकी की फ़िलासफ़ी में दोष है, धोखा है, छल है। धर्मदास जी भी पहले ठाकुरपूजा करते थे । साहिब से कहा कि एक ही परमात्मा हैं—ठाकुर जी । साहिब जी धर्मदास जी को बड़े तरीके से लाइन पर लाए, कहा—
तीन लोक जो काल सतावे । ताको सब जग ध्यान लगावे ॥
निराकार जेहि वेद बखानै । सोई काल कोइ मरम न जानै ॥
त्रिगुण जाल यह जग फँदाना । गहै न अविचल पुरुष पुरान॥
जाकर ई जग भक्ति कराई। अंतकाल जिव सो धरि खाई ॥
कहा कि सब काल की भक्ति कर रहे हैं । जिसको सारा संसार भगवान समझ कर पूजा कर रहा है, वही अंतकाल में जीवों को खा जाता है । उसी निरंजन के त्रिदेव पुत्र हैं ।
सबै जीव सतपुरुष के आहीं । यम दै धोखा फँदाइस ताहीं ॥
प्रथमहि भये असुर यमराई । बहुत कष्ट जीवन कहँ लाई ॥
दूसरि कला काल पुनि धारा । धरि अवतार असुर सँघारा ॥
प्रभुता देखि देखि कीन्ह विश्वासा | अंतकाल पुनि करै निरासा ॥
जीवन बहु विधि कीन्ह पुकारा । रक्षा करन बहु करै पुकारा ॥
कहा कि सभी परम-पुरुष की आत्माएँ हैं, पर निरंजन ने धोखे से उन्हें फँसाकर रखा । पहले तो वो खुद ही राक्षस बनता है, जीवों को सताता है, फिर खुद ही अवतार धारण कर राक्षसों को खा जाता है । जीव लीला देखकर सोचते हैं कि यही हमारा रक्षक है, पर अंतकाल में यही जीवों को निराश करता है। साहिब ने कोई भी बात फिज़ूल में नहीं कही । तर्क दिये हैं । कह रहे हैं—
गीता पाठ कै अर्थ बतलावा । पुनि पाछे बहु पाप लगावा ॥
द्वापर देखहु कृष्ण की रीती । धर्मनि परिखहु नीति अनीति ॥
अर्जुन कहँ तिन्ह दया दृढ़ावा । दया दृढ़ाय पुनि घात करावा ॥
बँधु घातकर दोष लगावा । पाण्डो कहँ बहु काल सतावा॥