भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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भेजि हिमालय तेहि गलाये । छल अनेक कीन्ह यमराये ॥

बहु गंजन जीवन कहँ दीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा॥

द्वापर में देख लो, कृष्ण जी ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, फिर घात करवाया। साहिब ने धर्मदास से कहा कि जिनकी भक्ति कर रहे हो, उनमें दोष है । मुझे बताना पड़ेगा; मेरी मजबूरी है। लोगों ने निंदा समझ लिया। बताना पड़ेगा कि यह काल के दायरे की भक्ति है, इससे ऊपर उठ । तो फिर बाद में कहा कि तू पाप कर गया है । अर्जुन चौंका, कहा कि आपने ही तो कहा था। उसने तर्क दिया । पर कृष्ण जी ने कहा- नहीं, वो राजनीति थी, पर तूने बंधुओं को मारा है, धर्म के अनुसार यह पाप है। यदि मैं मोहनलाल को कहूँ कि फलाने को मार । वो कहे कि यह तो पाप है, कैसे करूँ! मैं कहूँ कि मैं आज्ञा दे रहा हूँ, मार। वो मारे तो बाद में मैं कहूँ कि तूने तो पाप कर दिया तो यह कैसा है ! यह तो विरोधी वाणी हुई। मेरे शब्द विरोध में नहीं जाते हैं । तो फिर यज्ञ करवाया। लेकिन तब भी पिण्डा नहीं छूटा पाण्डवों का। फिर कहा कि हिमालय में जाकर प्रायश्चित करो। इतनी सर्दी में गलना पड़ा। फिर भी नहीं छूटा पिण्डा । फिर नरक में जाना पड़ा। तो यह सब निंदा है क्या! नहीं, यह तो सभी को पता है । बस, साहिब तो तर्क देकर समझा रहे हैं कि मुक्ति के लिए कहीं आगे बढ़ना होगा। 'बहु गंजन जीवन कहँ कीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥ ' यह कौन सी मुक्ति थी ! तो साहिब धर्मदास को आगे समझाते हुए कह रहे हैं-

बलि ते सो छल कीन्ह बहूता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥

छल बुद्धि दीन्हे ताहिं पताला । कोई न लखै प्रपंची काला॥

लघु सरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवी लीन्ह पुनि स्वस्ति कराये ॥

स्वस्ति कराइ तबै प्रगटाना । दीर्घ रूप देखि बलि भय माना ॥

तीन परग तीनौ पुर भयऊ । आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥

देहु पुराय नृप आधा पाऊँ । तो नहिं तव पुण्य प्रभाव नसाऊँ ॥

तेहि कारण पातालहिं दीन्हा । अन्धा जीव जल प्रगट न चीन्हा ॥