भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

भेजि हिमालय तेहि गलाये । छल अनेक कीन्ह यमराये ॥

बहु गंजन जीवन कहँ दीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा॥

द्वापर में देख लो, कृष्ण जी ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, फिर घात करवाया। साहिब ने धर्मदास से कहा कि जिनकी भक्ति कर रहे हो, उनमें दोष है । मुझे बताना पड़ेगा; मेरी मजबूरी है। लोगों ने निंदा समझ लिया। बताना पड़ेगा कि यह काल के दायरे की भक्ति है, इससे ऊपर उठ । तो फिर बाद में कहा कि तू पाप कर गया है । अर्जुन चौंका, कहा कि आपने ही तो कहा था। उसने तर्क दिया । पर कृष्ण जी ने कहा- नहीं, वो राजनीति थी, पर तूने बंधुओं को मारा है, धर्म के अनुसार यह पाप है। यदि मैं मोहनलाल को कहूँ कि फलाने को मार । वो कहे कि यह तो पाप है, कैसे करूँ! मैं कहूँ कि मैं आज्ञा दे रहा हूँ, मार। वो मारे तो बाद में मैं कहूँ कि तूने तो पाप कर दिया तो यह कैसा है ! यह तो विरोधी वाणी हुई। मेरे शब्द विरोध में नहीं जाते हैं । तो फिर यज्ञ करवाया। लेकिन तब भी पिण्डा नहीं छूटा पाण्डवों का। फिर कहा कि हिमालय में जाकर प्रायश्चित करो। इतनी सर्दी में गलना पड़ा। फिर भी नहीं छूटा पिण्डा । फिर नरक में जाना पड़ा। तो यह सब निंदा है क्या! नहीं, यह तो सभी को पता है । बस, साहिब तो तर्क देकर समझा रहे हैं कि मुक्ति के लिए कहीं आगे बढ़ना होगा। 'बहु गंजन जीवन कहँ कीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥ ' यह कौन सी मुक्ति थी ! तो साहिब धर्मदास को आगे समझाते हुए कह रहे हैं-

बलि ते सो छल कीन्ह बहूता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥

छल बुद्धि दीन्हे ताहिं पताला । कोई न लखै प्रपंची काला॥

लघु सरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवी लीन्ह पुनि स्वस्ति कराये ॥

स्वस्ति कराइ तबै प्रगटाना । दीर्घ रूप देखि बलि भय माना ॥

तीन परग तीनौ पुर भयऊ । आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥

देहु पुराय नृप आधा पाऊँ । तो नहिं तव पुण्य प्रभाव नसाऊँ ॥

तेहि कारण पातालहिं दीन्हा । अन्धा जीव जल प्रगट न चीन्हा ॥

तब लै पीठ नपाय तेहि दीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥

यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्ति हरि हमको दीन्हा ॥

बलि की क्या ग़लती थी ! साहिब तर्क से समझा रहे हैं, मुक्ति के विषय में सोचने को कह रहे हैं। आख़िर हम सब कौन सी मुक्त चाह रहे हैं, यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बाकी उनकी किसी से दुश्मनी नहीं थी । तो कहा कि पहले छोटा रूप धारण कर बलि से साढ़े तीन पग धरती माँग ली, फिर बाद में अपना रूप बड़ा करके तीन-लोक तीन पग में नाप लिये और आधा पाँव रह गया । आधा पाँव बलि राजा दान नहीं दे सका तो उसके परिणाम स्वरूप उसे पाताल भेज दिया गया। साहिब कह रहे हैं कि यह अंधा मनुष्य समझता नहीं है। स्पष्ट देखकर भी समझता नहीं है। यह सब होने के बाद कहता है कि हरि ने मुक्ति दी । पाताल में भेज दिया गया। क्या यह थी मुक्ति ? लोग तो साहिब की वाणी को तोड़ मरोड़ कर कह रहे हैं- तू राम सुमर पछतायेगा। हम कह रहे हैं— तू नाम सुमर पछतायेगा । हम आपको शुद्ध चीज़ दे रहे हैं । हम घी खिला रहे हैं और वो भी शुद्ध दे रहे हैं, बिना लस्सी वाला दे रहे हैं। बाकी से अलग भक्ति दे रहे हैं। बाकी काल की भक्ति दे रहे हैं, हम परम-पुरुष की भक्ति दे रहे हैं । बाकी जितने भी पंथ हैं, सत्य मानना, सब काल - पुरुष की भक्ति कर रहे हैं । कुछ हमारी तरह बातें बोल रहे हैं। सच खंड, अमर लोक, सत्पुरुष की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में भक्ति वो भी काल - निरंजन की ही कर रहे हैं । क्योंकि वाणियों में वो बातें लिखी हैं, इसलिए वो पढ़कर बोल रहे हैं। लेकिन उनके पास अपना कुछ नहीं है । अन्दर से वो खालमखाली हैं। हम बाकी पंथों मुख्य पाँच कारणों से अलग हैं। ये कारण हैं कि हम- तीन लोक से परे एक चौथे लोक ( अमर लोक ) की बात कर रहे हैं ।

तीन लोक से भिन्न पसारा | अमर लोक सतगुरु का न्यारा ।।

तीन लोक प्रलय कराई । चौथा लोक अमर है भाई ।।

सबसे पहले हम तीन लोक से परे एक चौथे लोक (अमर-लोक) की बात कर रहे हैं । कबीर साहिब ने सबसे पहले इस अमर लोक का संदेश संसार को दिया। उन्होंने उस अद्भुत देश की बात कही, जिसकी ख़बर पहले किसी को नहीं थी। जैसे वैज्ञानिक लोग ब्रह्माण्ड के रहस्य जानने के इच्छुक हैं । वे नित्य नयी-नयी सूचनाएँ संसार को दे रहे हैं। इसी तरह साहिब ने भी संसार को एक अनुपम रहस्य दिया । उन्होंने ऐसे अद्भुत लोक की बात कही, जहाँ प्रलय नहीं है। यह तीन लोक तो प्रलय की सीमा में आ जाते हैं यानी इनकी एक निश्चिय अवधि है। जैसे हमारे शरीर की एक अवधि है, हर चीज की एक अवधि है । एक अवधि तक हमारा शरीर रहता है, फिर नष्ट हो जाता है । यानी इसकी एक सीमा है। इसी तरह हर चीज़ की एक सीमा है, पर हमारी आत्मा का किसी भी देश, काल या अवस्था में नाश नहीं होता । यह कभी नष्ट नहीं होती । जिस चीज की उत्पत्ति है, उसका नाश भी अवश्यंभावी है, पर हमारी आत्मा की उत्पत्ति नहीं, इसलिए यह नष्ट भी नहीं होती। यहाँ पर सोचो । यदि आत्मा अमर है तो इस आत्मा का देश या इस आत्मा का असली ठिकाना भी ऐसा होना चाहिए न, जिसका कभी नाश न हो, जो परम सत्य हो । क्योंकि—

सत्य सोई जो विनशे नाहीं ।।

यह तीन लोक काल - पुरुष का देश है । उसी ने सब जीवों को शरीर रूपी पिंजड़े में कैद करके रखा हुआ है। इसी तीन- लोक से परे जो अमर-लोक है, वहाँ परम-पुरुष का निवास है । सब संतों ने उसे साहिब नाम दिया है । परमात्मा नाम तो काल - पुरुष का है। गुरु नानक देव जी ने तो साफ़-साफ़ कह दिया— आठ अटा की अटारी मझारा, देखा पुरुष न्यारा । निराकार आकार न ज्योति, नहिं वह वेद विचारा । ओंकार कत्र्ता नहिं कोई, नहिं वहाँ काल पसारा। वो साहिब सब संत पुकारा, और पाखंड है सारा । सतगुरु चीन्ह दीन्ह यह मारग, नानक नजर निहारा । हम सब मुक्ति की बात करते हैं, पर हमें पता नहीं है कि हम मुक्ति क्यों चाहते हैं। वास्तव में जिस संसार में हम रह रहे हैं, वो काल - पुरुष का संसार है। यहाँ पर आत्मा को दुख ही दुख दिया जा रहा है। काल - पुरुष सब जीवों को कष्ट दे देकर तंग कर रहा है। इसलिए हम सब काल पुरुष की इस

दुनिया से छूटना चाह रहे हैं. पर झंझट यह है कि हमें यह ज्ञान नहीं है कि पूरा तीन लोक काल की सीमा के अन्दर है । हम मृत्यु लोक से छूटकर या स्वर्ग लोक जाना चाहते हैं या ब्रह्म लोक या पार- ब्रह्म लोक। इससे परे की दुनिया का हमें ज्ञान ही नहीं है । हमें आत्मा के सही ठिकाने का पता नहीं है । जाने- अनजाने में हम सभी उस साहिब की तलाश में हैं, पर ठीक से इस रहस्य को समझ न सकने के कारण हमने काल पुरुष को ही अपना परमात्मा मान लिया है। दुख और कष्ट देने वाले को ही अपना परम मित्र समझ लिया है। तभी तो साहिब कह रहे हैं—

जो रक्षक तहँ चीह्नत नाहीं । जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं । ।

काल- पुरुष का यह तीन लोक पाँच तत्वों से बना है । पाँचों तत्वों की एक सीमा है। शास्त्रों का भी मानना है कि महाप्रलय में ये पाँचों तत्व नष्ट हो जायेंगे। दयानन्द सरस्वती जी के सत्यार्थ प्रकाश में भी इसका उल्लेख मिलता है और वैज्ञानिक लोग भी इस सच्चाई को समझ रहे हैं । क्या यह तीन लोक, जिसमें स्वर्ग लोक, पितर लोक, ब्रह्म लोक आदि आते हैं, नष्ट हो जायेगा ? हाँ, यह सब समाप्त हो जायेगा, इसलिए यह विश्वास के योग्य नहीं है। संत-महापुरुषों ने तभी तो संसार को झूठा, अनित्य, स्वप्नवत् आदि कहा है। इसमें कुछ भी सच नहीं है, क्योंकि सब नाशवान् है । इस अनन्त को संतों ने तीन भागों में बाँटा है - शून्य, महाशून्य और अमर लोक। शून्य और महाशून्य दोनों नाशवान् हैं, पर शून्य वो स्थान है, जहाँ पर ग्रह, उपग्रह आदि हैं, जबकि महाशून्य में निर्गुण सृष्टि है । वहाँ आर्टिकल्स नहीं हैं । यानी जहाँ तक सूर्य, चाँद, तारे, ग्रह, उपग्रह आदि हैं, वो शून्य स्थान कहलाता है । शून्य की सीमा यहाँ तक है। इसके ऊपर फिर महाशून्य है । महाशून्य में ये सब नहीं है। निर्गुण स्थान है । महाशून्य में सात आकाश हैं। इन सात आकाशों को संतों ने सात सुरति कहा है । ये आकाश बड़े विराट् हैं । इनके अन्दर बड़े चुंबकीय आकर्षण हैं। इनमें एक अलोकिक आनन्द है । ये इतने विराट् हैं कि शून्य जैसी करोड़ों सृष्टियाँ एक-एक में समाती जायेंगी । सर्वप्रथम शून्य से पाँच असंख्य योजन ऊपर जाने पर चिंत लोक आता है। अचिंत लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर सोहंग लोक आता है। सोहंग लोक से पुनः पाँच असंख्य योजन ऊपर

जाने पर मूल - सुरति लोक है । यहीं से चेतना आई है। सुरति लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर अंकुर लोक होता है । उसके ऊपर फिर इच्छा लोक, फिर वाणी लोक, जहाँ से अनहद धुनें भी आती हैं। अंत में फिर सहज लोक है। ये सात लोक सात आकाश भी कहलाते हैं। सहज लोक अर्थात सातवें आकाश तक भी प्रलय है। इन लोकों से ऊपर अर्थात सहज लोक से एक असंख्य योजन ऊपर जाने पर अमर लोक आता है। यही वो स्थान है, जहाँ कभी नाश नहीं है । यह तीन लोक तो नष्ट हो जाता है, पर वहाँ प्रलय नहीं है । तभी तो साहिब ने ऐसे लोक की बात कही है, जो अमर है, सत्य है, तीन लोक से परे है, सप्त आकाश से भी परे है । वहाँ कभी प्रलय नहीं है । यदि आत्मा अमर है तो निश्चय ही वो अमर देश ही आत्मा का सही ठिकाना है । चल हंसा तू देश हमारे, साहिब देत पुकारा है ।

सत्य तो केवल अमर लोक है, झूठा सब संसारा है।।

साहिब पुकार-पुकार कर कह गये हैं कि हे बंदे, इस झूठी दुनिया से ऊपर उठ और अपने देश चल। यह देश आत्मा का नहीं है । साहिब की वाणी बार-बार चेता रही है।

चलना तो है दूर मुसाफिर काहे सोवे रे ॥

यह आत्मा बड़ी दूर से आई है । यह देश इसका नहीं है। यदि यह परमात्मा का देश होता तो साहिब की वाणियाँ यह क्योंकर कहतीं ! चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो ।

यहि संसार काल है राजा, कर्म का जाल पसारा हो ॥

चौदह खंड बसे वाके मुख में, सबही को करत अहारा हो ।

बारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥

ब्रह्मा विष्णु शिवतन धरिया, और को कौन विचारा हो ।

सुन नर मुनि सब छलछल मारले, चौरासी में डारा हो ॥

मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।

ताको रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भानु उजियारा हो ॥

श्वेत स्वरूप शब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो ।

कोटिन चाँद सूर्य छिपि जैहैं, एक रोम उजियारा हो ॥

वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृत धारा हो ।

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥

कह रहे हैं कि हे हंस ! इस संसार को छोड़ो और हमारे सत्यलोक में चलो। यह संसार तो काल - पुरुष का देश है, जहाँ कर्म का जाल फैला हुआ है। यह काल-पुरुष सबको मार-मारकर बुरा हाल कर रहा है । त्रिदेव आदि भी यहाँ शरीर धारण कर रहे हैं। वो सुर, नर, मुनि आदि सबको धोखा दे रहा है और चौरासी में डाल रहा है। वो स्वयं तो आकाश में ज्योति-स्वरूप होकर बैठा हुआ है । वहाँ करोड़ों सूर्यों का प्रकाश है। पर उससे परे एक देश है। वहाँ अमृत-धारा बह रही है। वहाँ करोड़ों चाँद और सूर्य एक रोम के प्रकाश से लजा जाते हैं। हे धर्मदास ! परम-पुरुष के उस दरबार को देखो। यह संसार काल-पुरुष का देश है । यहाँ पर कुछ भी आत्मा के हित में नहीं है। वो सबको यहाँ पर दुख दे रहा है। लोग अवतारों की महिमा गाते हैं, पर साहिब कह रहे हैं कि वो भी उसी की सीमा में हैं। तीन-लोक में जो भी , सब काल के दायरे में है । यह हरदो यहाँ काल पुरुष के है हिजारे । हर सिम्त व हर जाय में यम जाल

पसारे ॥

यक लोक व यक वेद दो दरिया के किनारे | सैयाद के काबू में हैं सब जीव

बेचारे ॥

चलती है यहाँ तेग व तलवार दोधारे । चल हंस अचल मोलिदो

मावाय हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब काल का ही है। हर शै में उसका जाल फैला हुआ है। दुनिया के सब लोग उस क्रूर के काबू में हैं। इसलिए हे हंस ! तू हमारे देश में चल । आगे कह रहे हैं- जब भूल गया आदम को आपही आपा । पावन्द हुवा तिफली जवानी व

बुढ़ापा ॥

सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा । है आग लगी बेश: जलेगा यह

सरापा ॥

जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरीरे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय

हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब पर मौत का साया मण्डरा रहा है । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आग लगी हुई है, जिसमें सारा संसार जल रहा है। इसलिए इस जलते हुए संसार को छोड़ और हमारे देश में चल। अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत। एक इश्क जदः भई है हर कौन किया भौन है यह हुस्न है औरत ॥ मोहिनी मूरत । दिल पार हुवा पार: बमह पारए

सूरत॥

बाजार खड़े मार वा बीमार नजारे ।

चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥

यहाँ पर आत्मा का धर्म लूट लिया गया है, उसका लोप हो गया है। यहाँ पर प्रेम करने के लिए एक सुन्दर स्त्री बनी है। सब उसी पर मोहित हो रहे हैं। यहाँ सबको यह रोग लगा हुआ है। इसलिए हे हंस! तू इस संसार को छोड़ और हमारे देश में चल । कैलास चलेगा व अमरावती अलकावती गोलोक जिनूँ लोक चलेगा ॥ चलेगा। सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा। जो हद्द जनो मर्द में सो लोक

चलेगा ॥

वो भी जल जावे जहाँ नौलाख

सितारे | चल हंस अचल मोलिदो मावाय

हमारे ॥

यहाँ जो कुछ भी देख रहे है, एक दिन नष्ट हो जायेगा। स्वर्ग लोक, तप लोक आदि भी नहीं रहेगा। नौ लाख तारे भी नहीं रहेंगे । इसलिए हे अमर हंस! तू इस नश्वर संसार को छोड़कर उस अमर - धाम को चल । कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा । आवे जो वहाँ से सो ख़बर उसकी

कहेगा ॥

सब कौल कर शमः अजिले सोल बहेगा ।

जिसको वह नजर आवे सो फिर कछु न

चहेगा ॥

निश्चल सो रहे कायक जहाँ अमृतधारे ।

चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥

अगर कुछ अमर है, अगर कुछ रहेगा तो वो परम - पुरुष का लोक ही

रहेगा और अन्य कुछ भी नहीं रहेगा; सब मिट जायेगा । जो वहाँ से आयेगा, वो उसकी ख़बर कहेगा। जिसको वो नज़र आ गया, फिर वो कुछ न चाहेगा । इसलिए हे हंस! तू उसी देश को चल ।

हंसों की हुन खूबी कही जाए सो कैसे ।

यह नातिकः गुम सुम्म बयां कीजिए ऐसे ॥

एक मूय मुनौविर कह इस नूरका जैसे 1

छिप जाय करोड़ों महेहुर तलअत तैसे ॥

सब हंस पुरुष रूप पुरुष उनको दुलारे ।

चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥

वहाँ हंसों की सुन्दरता का बखान नहीं किया जा सकता है। करोड़ों सूर्य और चंद्रमा वहाँ के प्रकाश के आगे फीके पड़ जाते हैं । परम - पुरुष वहाँ सब हंसों से प्रेम करते हैं । हे हंस ! तू भी वहाँ चल ।

जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चंदा ।

सोहंग दुरै चँवर करे पुरुष अनन्दा ॥

यक मूरत सारे न खुदावन्द न बन्दा ।

इस मंजिल नजदीक नहीं काल का फंदा ॥

जिस लोक हमेशा को परमहंस पधारे ।

चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥

वहाँ न रात है, न दिन है, न सूर्य है, न चाँद, न कोई खुदा, न बन्दा । सब उसी के रूप हैं । जिस लोक में परमहंसों का आना-जाना लगा रहता है, है हंस! तू भी उस देश में चल । सतगुरु की शरण लेके चलो बहके उस पार । वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीव का

मददगार ॥

पहुँचावे वतन में न बुतन में होवे कर पल में सुबुक दोष उठा उसका गरां बार । आजिज से गुनहगार कतारों को जो औतार ॥ तारे ।

चल हंस अचल मोलिदो मावाय

हमारे ॥

हे हंस ! सतगुरु की शरण ग्रहण कर, क्योंकि वो ही जीव का सच्चा सहायक है। वो तुझे पल में वहाँ पहुँचा देगा। वो तेरे सब दोषों को मिटाकर तुझे वहाँ ले जायेगा। हे हंस ! इस तरह सद्गुरु की शरण लेकर उस देश में चल।

काल- पुरुष ने इस संसार में कुटुंब परिवार आदि के मोह - जाल में जीव को फँसा दिया है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि में जीव उलझ गया है । साहिब चेता रहे हैं-

खलक है रैन का सपना। समझझ दिल कोई नहीं अपना ॥

कहीं है लोभ की धारा । बहा जग जात है सारा ॥

घड़ा ज्यों नीर का फूटा । पतर जैसे डार से टूटा ॥

ऐसी निर्जान जिंदगानी। अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥

सजन परवार सुतदारा। सभी उस रोज हों न्यारा ॥

निकल जब प्राण जावेंगे। कोई नहिं काम आवेंगे ॥

निरख मत भूल तन गोरा । जगत में जीवना थोरा ॥

सदा जिन जान यह देही । लगाओ सतनाम से नेही ॥

कटे यम काल की फाँसी। कहें कबीर अविनाशी ॥

कह रहे हैं कि यह संसार तो रात के सपने की तरह हैं । यहाँ पर कोई भी अपना नहीं है। यहाँ पर लोभ की कठिन धारा बह रही है और सारा संसार उसी में बहे जा रहा है। जैसे पानी का घड़ा फूटता है, जैसे डाली से पत्ता टूटता है, ऐसे ही यह जिंदगी एक दिन समाप्त हो जायेगी । इसलिए हे अभिमानी जीव ! सावधान हो जा। मित्र, कुटुम्बी, पुत्र, स्त्री आदि कोई भी तेरे काम नहीं आयेगा। ये सब एक दिन छूट जायेंगे। जब तेरे प्राण निकल जायेंगे तो ये सब तेरे काम नहीं आयेंगे। तू गोरे तन को देखकर मत भूल। इस संसार में थोड़ा-सा ही जीवन है। इसलिए तू अहंकार, लोभ और सारी चतुराई को त्यागकर इस संसार की माया से परे रह और सत्यनाम से प्रीत कर, जिससे काल की फाँस कट सके । साहिब बार-बार कह रहे हैं- हंसा सुध करो आपन

देश ॥

जहाँ से आयो सुधि बिसरायो, चले गयो परदेश ॥

वहि देशवा में जोते न बोवै, मोती फिरै हमेश ॥

वहि देशवा में मरै न बिगड़ै, दुक्ख न पड़त कलेश ॥

चलो हंसा बसो मानसरोवर, मोती चुगो हमेश॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, अजर अमर वह देश ॥

वो विद्वानों की समझ से बाहर है, क्योंकि वो वेद-शास्त्रों की सीमा

से भी कहीं ऊपर है। वहाँ बुद्धि और कल्पना की पहुँच भी नहीं है । वहाँ जाकर फिर कभी इस मृत्यु लोक में नहीं लौटना है। तहँ के गये बहुरि न आवै, ऐसा देश हमारा है । अवधू बेगम देश हमारा है। वेद कितेब पार नहीं पावत, कहन सुनन से न्यारा है । बिन बादल जहँ बिजुरी चमके, बिन सूरज उजियारा है। बिना सीप जहाँ मोती उपजे, बिन मुख बैन उच्चारा है । ज्योति लगाए ब्रह्म जहाँ दरशे, आगे अगम अपारा है ।

कहैं कबीर तहाँ रहनि हमारी, बूझे गुरुमुख प्यारा है ।।

सगुण निर्गुण से परे सत्य भक्ति की बात कर रहे हैं

भक्ति-भक्ति सब जगत बखानी । भक्ति भेद कोई बिरले जानी।।

संन्यासी योगी लटधारी । करी भक्ति पर युक्ति न धारी ।।

यह भक्ति की कैसी युक्ति ! कुछ लोग सगुण उपासना कर रहे हैं, ठीक है । उसकी निंदा नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि जो भक्ति करने वाला है, वो ज़रूर आम आदमी से अच्छा है । उसमें प्रेम भी होगा, इसलिए वो निंदनीय नहीं है, पर हरेक भक्ति की अपनी पहुँच है, संतों ने यह कहा, निंदा की ही नहीं। सगुण और निर्गुण भक्ति में गुरु का ज़्यादा महत्व नहीं है। गुरु का काम केवल शिष्य को राह बताना है। सफर शिष्य को ही तय करना है । यह शिष्य की ताक़त पर निर्भर करता है कि वो कहाँ तक पहुँच पाता है। इसमें नाम का भी ज़्यादा महत्व नहीं है । यह नाम भी सांसारिक ही होता है । इसी कारण शिष्य ब्रह्माण्ड तक ही सीमित रहता है, उससे परे नहीं जा पाता । सगुण- भक्ति से सामीप्य और सालोक्य मुक्ति की प्राप्ति होती है जबकि निर्गुण-भक्ति से सारोप्य और सायुज्य मुक्ति मिलती है। सामीप्य मुक्ति : सामीप्य मुक्ति क्या है ? अच्छे काम करो, किसी को न सताओ, श्राद्ध आदि करो, सारा जीवन अपने कुल देवता की उपासना करते रहो तो यह मुक्ति आसानी से मिल जाती है । इसमें मरने के बाद जीव पितर लोक में चला जाता है और हज़ारों साल तक वहाँ रहता है । वहाँ पर संसार जैसा कष्ट नहीं है। सुख है वहाँ पर । वहाँ आत्मा को एक सूक्ष्म देही होती है,

इसलिए यदि दो मित्र वहाँ पहुँच जाएँ तो वे एक-दूसरे को पहचान लेते हैं। पर केवल हज़ारों साल की मुक्ति । यह कैसी मुक्ति है ! फिर अपने कर्मों का फल भोगकर संसार में गोते खाना, फिर-फिर माँ के पेट में आना। क्या यही होती है मुक्ति !! सालोक्य मुक्ति : सामीप्य मुक्ति की तरह इसमें भी सारा जीवन अच्छे काम करो, किसी को कष्ट मत दो, तीर्थ, व्रत आदि जितना कर्मकाण्ड शास्त्रों में बताया गया है, उसके अनुसार चलो और सारा जीवन किसी भी इष्ट या देवी- देवता की उपासना करते रहो तो यह मुक्ति प्राप्त होती है। इसमें साधक मरने के बाद स्वर्गलोक में जाता है । इसमें भी जीव अपने कर्मानुसार लाखों साल तक का सुख भोगता है और फिर उसके बाद पुन: माँ के पेट में कष्टों का सिलसिला जारी रहता है । स्वर्ग तीन तरह के हैं। एक नीचे है, फिर दूसरा उससे ऊपर और तीसरा सबसे ऊपर । जो पहला है, उसमें भी आनन्द है, पर जो उससे ऊपर है, उसमें और ज़्यादा आनन्द है और जो सबसे ऊपर है, उसमें सबसे अधिक आनन्द है । स्वर्ग-नरक में कई धाम हैं, सभी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं । वे सब मूर्तियाँ चेतन हैं। जब भी साधक अपने इष्ट से प्रश्न करता है तो उसे उत्तर मिलता है। वो मूर्ति उसे जवाब देती है । स्वर्ग के धामों की नकल पर ही संसार में मंदिर आदि बने हैं। यह एक रहस्यमय सत्य है । हमारे जो पूर्वज साधना करके जीते-जी वहाँ पहुँचे, उन्होंने संसार के लोगों को अपने अनुभव दिये, पर इतना ही पर्याप्त नहीं था, इसलिए उन्होंने उनकी नकल पर संसार में मंदिर आदि का निर्माण कराया ताकि भक्तों के दिल में भक्ति का एक शौक पैदा हो सके, वे भी वहाँ जाने का शौक पैदा कर सकें। पर फिर यह मुक्ति भी थोड़े समय के लिए ही थी । शास्त्र स्वयं कह रहे हैं कि कर्मों के क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आना पड़ेगा, क्योंकि स्वर्ग-लोक भी तो तीन-लोक के अन्दर ही है । सारोप्य और सायुज्य : इन दोनों की प्राप्ति योग से होती है । सारोप्य में जीव ब्रह्म में लीन हो जाता है और सायुज्य में जीव निराकार में लीन हो जाता है । इसमें जीव का करोड़ों साल तक जन्म नहीं होता है, लेकिन फिर जब प्रलय होती है और नयी सृष्टि बनती है तो निराकार वालों को भी संसार में जन्म लेना

पड़ जाता है । सोचो, क्या यही होती है मुक्ति ! नहीं ! मुक्ति होती है—सदा के लिए संसार - सागर से छूटना, फिर कभी भी माँ के गर्भ में नहीं आना । पर ये कैसी मुक्तियाँ हैं ? तभी तो— संत न मुक्ति चाहते, नहीं पदार्थ चार। नहीं पदार्थ चार, मुक्ति संतन की चेरी || संसार के सब जीव छूटना चाह रहे हैं। संसार को दुखों का सागर मानकर पार होने का प्रयत्न कर रहे हैं । तीर्थ, स्नान, व्रत, जप, तप, योग, ध्यान और न जाने क्या-क्या कर रहे हैं। पर अफ़सोस ! छुटकारा नहीं मिल पा रहा है । काल का दण्ड सबको छलनी किये जा रहा है । भक्ति का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति होना चाहिए, पर कैसी विडंबना है कि हम भक्ति के बावजूद मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। क्यों ? संतों का मानना है कि ब्रह्माण्ड में जितनी भी भक्तियाँ प्रचलित हैं, वे सभी काल-पुरुष की सीमा तक का चक्कर कटवाने वाली उसी की भक्तियाँ हैं और उन भक्तियों से महानिर्वाण की प्राप्ति में हम सफल नहीं हो सकते हैं । तो क्या वेद - शास्त्र आदि हमारी आत्मा के कल्याण की बात नहीं कर रहे हैं ? कर रहे हैं । अवश्य कर रहे हैं । लेकिन वे भी चार सीमित समय की मुक्तियों की बात कर रहे हैं। जिन मुक्तियों के लिए वो कह रहे हैं, उनसे हमारी आत्मा का कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि उनसे हमारी आत्मा सदा के लिए नहीं छूट सकती है । यह बात वे स्वयं भी स्वीकार कर रहे हैं। उनका मानना है कि कर्मानुसार ही जीव इन मुक्तियों को प्राप्त करता है और कर्मानुसार ही इनकी अवधि है । कर्मों के क्षीण होने पर पुनः मृत्यु-लोक में आना पड़ता है । कहने का भाव यह है कि इन मुक्तियों से T भी बार-बार जन्म मिलेगा, बार- बार माँ के पेट में आना पड़ेगा। सगुण भक्ति का लक्ष्य स्वर्ग की प्राप्ति है, पर पुनर्जन्म फिर होगा । कोई सोचे कि सगुण से पुनर्जन्म से छुटकारा पा लेंगे तो ऐसा नहीं होगा । निर्गुण में बाहरी पूजा को महात्म नहीं दिया गया, योग को महात्म दिया गया । फिर निर्गुण का लक्ष्य क्या है ? सारोप्य और सायुज्य मुक्ति। क्या यह लक्ष्य खराब है? नहीं। हम यह नहीं कह रहे । हम कह रहे हैं कि पुनर्जन्म होगा । फिरके डारि दे भूमाहिं । भू से कोई न्यारा नाहिं॥ पुनर्जन्म होगा, यह अवश्य होगा। प्रलय बाद, लाखों करोड़ों जन्मों बाद धरती पर आना होगा ।

यह निगुर्ण पाँच मुद्राओं से इर्द-गिर्द घूम रही है । ये पंच मुद्राएँ ही निर्गुण भक्ति है । कोई भी मत मतान्तर इनसे परे नहीं है । अगर हम निगाह डालें तो पता चलता है कि लोगों को आज इस मुद्राओं का ज्ञान भी नहीं है। कई लोग आते हैं, मैं पूछता हूँ कि अगर आप अंदर में गये, प्रकाश आदि देखा, सिद्धियाँ प्राप्त कीं तो कृपा करके बताओ कि कैसे गये ? संयोग से गये या किसी सूत्र से गये । सांख्य योग में आता है कि सूत्र हैं। यूरोप की फलॉइट ली तो यूरोप पहुँचेंगे, ऐसे ही जिस मुद्रा से ध्यान करेंगे तो वहीं जायेंगे। पर अफ़सोस है कि वर्तमान के इन मुद्राओं के ज्ञाता भी बहुत कम हैं। जब पूछता हूँ तो भूचरी आदि का ज्ञान नहीं होता है । कालांतर में छ: महायोगेश्वर हुए, उसके पास इन मुद्राओं का ज्ञान था । साहिब ने इनके ऊपर कहा है । निर्गुण का लक्ष्य है योग, कमाई, साधना । जो कुछ मिलना है, उसका आधार है कमाई, योग, गुरु की जरूरत है, पर वो गौण है। संतत्व की धारा गुरु की बात कर रही है । मैंने नाना मत-मतान्तरों से जानकारी ली तो वास्तव में जानकारी नहीं थी । केवल अंदर में है, कहने से कुछ नहीं होगा। भारत के 16 बड़े पंथों से कोई विरोध नहीं है, पर कहना चाहता हूँ कि उनकी साधना केवल पंच मुद्राओं तक है और वो भी सही जानकारी नहीं है, केवल किताबी ज्ञान तक ही है । एक तो बाहरी योग है, एक पीटी उस्ताद भी स्कूलों में बताता है, पर दूसरा योग है - सूक्ष्म योग, जिससे आन्तरिक कोशिकाओं को जगाना होता है। योग कहते हैं जोड़ को, योग कहते हैं संधि को । बाहरी योग से अंदर में नहीं जा सकते हैं। देखते हैं कि किन-किन मुद्राओं द्वारा अंदर जाया जा सकता है। यह सबके लिए है या कठिन है। विभिन्न पंथों से जुड़े लोग हैं, अंदर से नहीं जुड़े हैं, नहीं जाते हैं, पर संतुष्ट हैं। आवश्यकता है कि निर्गुण वाले भी भक्ति को ठीक से समझें। फिर यह भी समझ लें कि इससे महानिर्वाण की प्राप्ति नहीं हो पायेगी, सदा के लिए जन्म-मरण का बंधन नहीं छूट पायेगा । लेकिन साहिब तथा संतों ने जिस भक्ति की बात की है, उन्होंने दावे के साथ कहा है कि उससे जन्मने और मरने का क्रम सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। क्योंकि उस सत्य - भक्ति से आत्मा अपने सही स्वरूप को प्राप्त कर उस अमर-देश में पहुँच जाएगी, जहाँ से फिर कभी लौटना न होगा।

हम संतों की बात को ठीक से समझ नहीं रहे हैं और सोच रहे हैं कि सब भक्तियाँ एक-समान ही हैं। नहीं, यह एक ही बात नहीं है। बहुत से लोग स्वर्ग में जाना चाहते हैं, लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि कितने दिन रहोगे स्वर्ग में, तो कुछ कहते नहीं पता। साफ़-साफ़ तो कह रहे हैं हमारे धर्म - शास्त्र कि अपने कर्मों का फल भोगने के लिए स्वर्ग में जाएगा और कर्मों के क्षीण होने पर पुनः मृत्यु-लोक में आएगा । बहुत दूर भी नहीं जा पाएगा, इसी ब्रह्माण्ड के अन्दर ही घूमता रहेगा और छुट्टी भी नहीं मिलेगी। क्या इसीलिए मिला था— मानव-तन। कहते हैं कि कई देवता भी मृत्यु - लोक में गुरु की तलाश करते हैं। वे भी मानव - तन पाने की इच्छा करते हैं । फिर हम हैं कि मानव-तन पाकर पुन: वहाँ जाना चाहते हैं T सगुण-निर्गुण में उलझ जाने से हम सच्ची मुक्ति की ओर नहीं जा पा रहे हैं । वास्तव में सगुण-निर्गुण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, पर निर्गुण भक्ति करने वाले इस बात को ठीक से समझ नहीं पाते हैं। एक बार एक निर्गुण-भक्त से बात हुई। उससे पूछा कि सगुण और निर्गुण में क्या अन्तर है ? उसने कहा कि सगुण भक्ति पाँच तत्वों की होती है और ये पाँचों तत्व नाशवान् हैं जबकि निर्गुण भक्ति इससे परे है। मैंने कहा कि कृप्या मुझे वे पाँचों तत्व गिनाकर तो बताओ, जो नाशवान् हैं। उसने गिनाना शुरू किया। निर्गुण भक्त : जल मैं : दूसरा निर्गुण भक्त : आग मैं : ठीक है, तीसरा निर्गुण भक्त : वायु मैं : अब चौथा निर्गुण भक्त : : पृथ्वी अच्छा, तो अब पाँचवाँ तत्व क्या है ? निर्गुण भक्त : ( दोनों हाथों को एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर रखकर बी में शून्य स्थान पर इशारा करते हुए) यह मैं : यह क्या है ? निर्गुण भक्त : आकाश मैं : यह आकाश क्या है, समझाओ निर्गुण भक्त : शून्य

मैंने कहा कि अफ़सोस है कि तुम किसी पंथ के प्रचारक होकर घूम रहे हो। तुम्हें किसने बताया कि आकाश तत्व शब्द है। नहीं, शब्द आकाश तत्व नहीं है। जो दो हाथों के बीच है, वो है आकाश तत्व । तुम वहीं रुकना । अपनी बात से फिसल नहीं जाना ।

दो बिन होय न अधर अवाजा ।।

आवाज दो के बिना होती नहीं । वायु और पृथ्वी के सम्पर्क से ध्वनि हुई । तुम्हें किसने बताया कि शब्द आकाश तत्व है। आकाश तत्व क्या है ? यूरोपियन ब्लैक मैटर पर रिसर्च कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि जीवन का आधार ब्लैक मैटर है, पर हम खोज कर रहे हैं कि कहाँ से आया यह। वो गप्पी नहीं हैं। 90 प्रतिशत ब्रह्माण्ड में ब्लैक मैटर बोल रहे हैं। यानी 10 प्रतिशत रोशनी है। वो ठीक कह रहे हैं । जहाँ तक सूर्य की किरणें जाती हैं, वहाँ तक रोशनी है, बाकी अँधकार है ब्रह्माण्ड में। जैसे आप घर में दीपक जलाकर रोशनी करते हैं तो एक सीमा तक ही उसका प्रकाश जाता है। ऐसे ही एक सीमा तक ही सूर्य का प्रकाश पहुँचता है। ...तो वो कह रहे हैं कि हम शोध कर रहे हैं। मैंने सोचा कि पूरी उम्र बेकार में ही गँवाओगे, मेरे पास आ जाओ, दो मिनट में बता दूँगा ।

जो ब्लैक मैटर है, वो है आकाश तत्व । पाँचों तत्व देखे जा सकते हैं।

पीलो रंग है धरती को, मीठो इसको स्वाद ।।

धरती का रंग पीला है और स्वाद है - मीठा ।

लाल रंग है अग्नि को, तीखो इसको स्वाद ।।

आग का रंग लाल है और स्वाद है तीखा ।

श्वेत रंग है जल को, खारो इसको स्वाद ।।

जल को स्वादहीन, रंगहीन कहते हैं । यह भूल है। कभी आप अनजा में भी कहते हैं कि पानी की तरह सफेद । जल का रंग सफेद है। इसका स्वाद है— खारा ।

नीलो रंग है वायु को, खट्टो इसको स्वाद ।।

हवा का रंग नीला है और स्वाद है - खट्टा । नीला आकाश कह रहे हैं । यह वायु तत्व है। नज़दीक से नहीं दिखता है।

कालो रंग आकाश को, फीको इसको स्वाद ।।

आकाश का रंग काला है और स्वाद है - फीका | ....तो मैंने उसे समझाया कि जब पाँचवाँ तत्व आकाश है तो निर्गुण भी तो पाँच तत्वों में आ गया, वो भी तो नाशवान् हो गया । कुछ भक्त लोग सगुण - भक्ति से ऊपर उठ जाते हैं, पर वे निर्गुण भक्ति में अटक जाते हैं । वे समझते हैं कि निर्गुण-भक्ति से उनकी आत्मा का कल्याण हो जाएगा, मुक्ति मिल जाएगी । इसलिए कबीर साहिब ने सब भक्तियों की पहुँच बताई है, सबको सावधान किया है और सत्य भक्ति को इनसे परे बताया है।

सगुण भक्ति करे संसारा । निर्गुण योगेश्वर अनुसारा ।।

इन दोनों के पार बताया । मेरो चित एको नहीं आया।।

दूसरी भक्ति है निर्गुण । धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं कि है साहिब! सारा संसार सगुण भक्ति कर रहा है और योगी लोग निर्गुण भक्ति कर रहे हैं, पर आप दोनों से परे बता रहे हैं, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। कालांतर में जितने भी भक्त हुए, सगुण - निर्गुण का संदेश दिया। आखिर आपकी भक्ति किस चीज़ का संदेश है ! दादू जी ने भी कहा – 'कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय । अटपट चाल कबीर की, मोसे कही न जाय ।।' दरअसल लोग आज योग और अध्यात्म को एक चीज़ मान रहे हैं। योग में शरीर की अत्यन्त सूक्ष्म कोशिकाओं को जगाने का नियम है और यह पंच मुद्राओं पर आश्रित है। इसके लिए ब्रह्मचर्य की जरूरत पड़ती है। सगुण में बाहरी भक्ति है । 33 कोटि देवताओं की भक्ति है । हम इसका भी खंडन नहीं कर रहे। ये प्रीपेयर करती हैं भक्ति के लिए । नर्सरी में भेज रहे हैं तो अगली क्लास में जाने के लिए तैयार कर रहे हैं । इस तरह जब तक कोई आधार न मिला तो कोई उपासना करता रहे। दूसरी निर्गुण भक्ति है । यह उससे ऊँची है। यह अन्तरगम्य में ले जाती है । इसलिए निर्गुण उपासक पंच मुद्राओं पर एकाग्र होते हैं । ये धाराएँ हैं भक्ति की। हमारे हिंदू धर्म में है। हम सगुण उपासकों की निंदा नहीं कर रहे । पर वो भी तो ठीक से करो । वहाँ भी पाप वर्जित है । किसी नियम का पालन नहीं कर रहे तो यह ठीक नहीं है। इस तरह निर्गुण भक्ति हमारी सहायक है । जो उन्हें छोड़कर हमारे पास आता है तो मामला आसान हो जाता है |

जो नर्सरी पढ़कर आया है, मास्टर के लिए आसान है। कम से कम तहजीब तो होगी न। मालिक को समझने वाला आदमी नेक होगा। पर निर्गुण वो करे जो ब्रह्मचारी है, जो सन्यासी है। निर्गुण वो करे, जो विषय विकार न करता हो।

जहाँ भोग तहाँ योग विनाशा ।।

जो भी विषय करता है, उसके लिए पंच मुद्राओं की भक्ति वर्जित है । जैसे शराबी पहलवानी नहीं कर सकता है । सिद्धान्त के अनुसार छोड़नी होगी, क्योंकि स्टेमिना चाहिए । इस तरह ब्रह्मचर्य चाहिए योग में । क्योंकि ब्रेन को कंट्रोल करना होता है, स्थिरता की जरूरत होती है । गृही होकर कथै ज्ञान, अमली होकर धरै ध्यान ।

साधु होकर कूटै भग, कहैं कबीर ये तीनों ठग ॥

साहिब समझा रहे हैं कि विषय-विकार करने वाला साधु नहीं हो सकता है। गृही होकर यदि कोई ज्ञान की बातें कर रहा हो; नशा करके यदि कोई ध्यान कर रहा हो और साधु होकर यदि कोई संभोग कर रहा हो तो समझ लेना कि ये तीनों ठग हैं । | ....तो खेचरी, भूचरी आदि मुद्राएँ हैं, पर लोग किस सिद्धान्त से उपासना कर रहे हैं, पता नहीं है । व्यायाम और योग के लिए भी आयु है । भुजंगासन 70 साल के बूढ़ा या नन्हें बालक को नहीं करना है । आयु का भी दायरा है वृद्धों के लिए अलग है । परिश्रम करने वालों के लिए अलग हैं। तो पूर्वजों ने कहा कि योग कर सकते हो तो आ जाओ । यदि नहीं कर सकते तो सगुण भक्ति ही कर लो । यदि गहराई में खोज करना चाहते हो तो बनो योगी। अभी हुआ क्या है ? हम सब भक्ति की दिशा कहाँ से भटके हैं ? सगुण निर्गुण की जगह नहीं है। निर्गुण में सगुण की जगह नहीं है । कह रहे हैं—

जेते दृश्यम तेते अनित्यम । जेते अदृश्यम तेते नित्यम ।।

दोनों में अलग स्थानों की प्राप्ति होती है । सगुण में स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति हो जाती है, पर यदि चाहें कि सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति हो, ब्रह्म लोक की प्राप्ति हो तो नहीं हो सकती है । उसके लिए योग करना होगा । निर्गुण में साधक आत्म-तत्व पर एकाग्र होता है। हालांकि सुगण में भी एकाग्र होता है । पर वहाँ गुरु कहता है कि तीर्थ जा, स्नान कर, शुभ कर्म कर, देवोपासना कर,

शास्त्रों का अध्ययन कर । निर्गुण में जाना है तो पंच मुद्राओं में से कोई कर । योगी कहते हैं कि योग करो। शुकदेव जी सन्यासी थे, ब्रह्मचारी थे। गोरखनाथ ने शादी नहीं की। दत्तात्रेय आदि ने शादी नहीं की, ब्रह्मचारी थे । दुनिया तो खिचड़ी भक्ति कर रही है । बिन जाने जो भक्ति करई । सो नहीं भवसागर से तरई । एक शब्द मैंने कई बार दोहराया है—

प्रथम पूरन पुरुष पुरातन, पाँच शब्द उच्चारा ।

सोहं, सत्, ज्योति निरंजन कहिये, ररंकार, ओंकारा ।।

शब्द ही सगुण, शब्द ही निरं गुण, शब्द ही वेद बखाना ।

शब्द ही पुनि काया के भीतर कर बैठा अस्थाना ।।

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जो जाकी उपासना कीना, उसका कहूँ ठिकाना ।।

साहिब कह रहे हैं कि सर्वप्रथम उस सर्वशक्तिमान ने पाँच शब्द पुकारे—सोहं, सत्, ज्योति - निरंजन, ररंकार, ओंकार । ये पाँच शब्द परमात्मा ने पुकारे। कहने का भाव है कि इन शब्दों को पुकारने वाला परमात्मा था, इनमें से कोई शब्द नहीं । इसलिए जो शब्द को परमात्मा कहते हैं, वो इस निरंजन की ही भक्ति करते हैं, सच्चे साहिब की नहीं । सगुण-निर्गुण दोनों भक्तियाँ इन शब्दों पर आश्रित हैं । शब्द ही काया में स्थान करके बैठा है । कह रहे हैं कि जो जिसकी भक्ति किया, जहाँ तक पहुँचा, उसका ठिकाना कहता हूँ । सगुण तो 33 करोड़ देवताओं तक है। इसकी महापुरुषों ने निंदा नहीं की, पर कहा कि इससे दो मुक्तियों की प्राप्ति होगी, आत्म साक्षाकार नहीं है । स्वर्ग आदि लोकों में आत्म ज्ञान नहीं है । तो I आओ, देखते हैं कि पंच मुद्राओं द्वारा हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत की, क्या हासिल किया, क्या सूत्र हमारे लिए छोड़ गये ! साहिब इस चीज़ों को नकार नहीं रहे हैं, पर कह रहे हैं कि यह अध्यात्म नहीं है, योग है ।

ज्योति निरंजन चाचरी मुद्रा, सो है नैनन माहिं ।

तेहि को जाना गोरख योगी, महा तेज है ताही ।।

कुछ आज भी ये मुद्राएँ कर रहे हैं । गोरख जी चाचरी मुद्रा से ध्यान करते थे। गोरखनाथ जी ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे । इनकी दिशा देने वाले ब्रह्मचारी हुए। पर आज गृहस्थ में योग की

बात कर रहे हैं। वो कामयाब नहीं होंगे। उसके लिए धीरता की जरूरत पड़ती है । साहिब तो कह रहे हैं-

यहाँ भोग तहाँ योग विनाशा ।।

... पर इस मुद्रा से आत्म ज्ञान नहीं मिलेगा। आदमी के शरीर में काफ़ी ताक़तें भरी पड़ी हैं। इसे नारायणी चोला कहा जाता है । इसमें सब कुछ है। जब तीसरे तिल की कोशिकाएँ जागती हैं तो बड़े आलोकिक रहस्य दिखाती हैं । हम चिकित्सा विज्ञान के युग में जी रहे हैं । रोम-रोम की डॉक्टरों ने ख़बर ली है, पर वैज्ञानिक मानव तन की कोशिकाओं का पूरा रहस्य नहीं जान पाए। कोशिश कर रहे हैं, पर गहराई में नहीं जान पाए अभी । तो कह रहे हैं कि चाचरी मुद्रा में बड़ी अनुभूतियाँ होती हैं । चाबी ताले को खोलती है। ऐसे ही ध्यान कोशिकाओं को खोलता है । साधक को तब ज्ञान हो जाता है । जब कोशिकाएँ खुलती हैं तो बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, बड़े ब्रह्माण्ड दिखते हैं, अलख ब्रह्म दिखता है । तभी योगी अलख ब्रह्म की बात कर रहे हैं। वो प्रकाश इतना है कि इसे ही परमात्मा माना गया।

शब्द ओंकार भूचरी मुद्रा, त्रिकुटी है अस्थाना ।

व्यासदेव ताको पहिचाना, चाँद सूर्य सो जाना ।।

व्यास जी ध्यान करते थे - आज्ञा चक्र में । यहाँ ध्यान रोकने से यहाँ की नाड़ियाँ खुलती हैं। 'कर नैनों दीदार महल में प्यारा है ।' जब यहाँ पर पूरा ध्यान एकाग्र होता है तो बड़े नज़ारे दिखते हैं । जब कोई समस्या आती है तो ध्यान यहीं पर रोक कर आप बैठ जाते हैं । यानी कहीं यहाँ पर समस्या का हल है । इनको ओपन करता है— ध्यान । ध्यान मास्टर की है, इसलिए –' ध्यान ही वेद शास्त्र कहत हैं, ध्यान ही वेद बखाना । ' आज भी हमारे देश में बहुत लोग यहाँ ध्यान रोक रहे हैं । ये तो कोशिकाएँ खुलीं। इन्हें जगाया गया, पर आत्मा नहीं जगी। साहिब की गोरख से गोष्ठी हुई तो साहिब ने कहा कि योग तो करो, पर जब इड़ा - पिंगला, सुषुम्ना सब नष्ट हो जायेंगी तब कहाँ ध्यान रोकोगे! ‘इड़ा विनशे, पिंगला विनशे, विनशे सुषम्न नाड़ी । कहें कबीर सुनो हो गोरख, कहाँ लगाइहों ताड़ी ।।' इसका मतलब है कि इन नाड़ियों का नाश हो जाता है । कहा- हे नाथ जी ! तब कहाँ जायेंगे !

गोरख की अवस्था 700 साल थी । छ: योगेश्वर धरती पर हुए, जिनमें शिवजी और गोरखनाथ का महत्व है । 'शिव गोरख सो पार ना पाए । और जीव की कौन चलाए ।' शिवजी प्रथम योगेश्वर हैं और अंतिम गोरख जी हैं। इसलिए इनके ध्यान सूत्र हमारे धर्म और योग में प्रचलित हैं । गोरख जी ने मणिपूरक योग द्वारा अस्थियों और माँस को एक कर दिया था। वज्र का शरीर हो गया था; कोई हथोड़ा मारे तो वापिस हो जाता था। शिवजी का भी वज्र शरीर है। गोरख जी ने 700 साल तक अपनी काया को रखा। रामानन्द जी भी 500 साल तक रहे । ..... तो साहिब की उम्र कोई 15 साल थी, गोरख जी ने व्यंग्य से पूछा- कबते भये बैरागी कबीर जी, कबते भये बैरागी । साहिब ने कहा— नाथ जी हम जबसे भये वैरागी, मेरी आदि अंत सुधि लागी । धुधूकार आदि को मेला, नहीं गुरु नहीं चेला । जबका तो हम योग उपासा, तबका फिरों अकेला । कहा—जब न गुरु था, न चेला था, तब का सन्यासी हूँ । अब सवाल उठा कि क्या इतनी अवस्था थी ! कह रहे हैं-

जो बूझे सो बावरा, क्या उमर हमारी ।

असंख्य युग परलय गई, तबके ब्रह्मचारी।।

हम तो सदा महबूब हैं, कोटि निरं जन हो गये, परलोक सोहं ब्रह्मचारी ।। सिधारी ।

दश कोटि ब्रह्मा भये, नौ कोटि कन्हैया ।

सात कोटि शंभू भये, मोरी एक पलैया।।

कोटिन नारद हो गये, मुहम्मद से चारी ।

देवतन की गिनती नहीं, क्या सृष्टि बिचारी ।।

नहीं बूढ़ा कहै कबीर सुन गोरख, यह उमर नहीं बालक, नहीं भाट भिखारी । हमारी । जो परम चेतन अवस्था में रहने वाला है, वो चाहे इस लोक में रहे, चाहे उस लोक में, नीचे नहीं आता है; उसका ज्ञान कम नहीं होता है, वो दूसरी अज्ञानमय अवस्थाओं को प्राप्त नहीं होता है । इसलिए कह रहे हैं कि करोड़ों