करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे भी कहीं ऊपर है। वहाँ बुद्धि और कल्पना की पहुँच भी नहीं है । वहाँ जाकर फिर कभी इस मृत्यु लोक में नहीं लौटना है। तहँ के गये बहुरि न आवै, ऐसा देश हमारा है । अवधू बेगम देश हमारा है। वेद कितेब पार नहीं पावत, कहन सुनन से न्यारा है । बिन बादल जहँ बिजुरी चमके, बिन सूरज उजियारा है। बिना सीप जहाँ मोती उपजे, बिन मुख बैन उच्चारा है । ज्योति लगाए ब्रह्म जहाँ दरशे, आगे अगम अपारा है ।
कहैं कबीर तहाँ रहनि हमारी, बूझे गुरुमुख प्यारा है ।।
सगुण निर्गुण से परे सत्य भक्ति की बात कर रहे हैं
भक्ति-भक्ति सब जगत बखानी । भक्ति भेद कोई बिरले जानी।।
संन्यासी योगी लटधारी । करी भक्ति पर युक्ति न धारी ।।
यह भक्ति की कैसी युक्ति ! कुछ लोग सगुण उपासना कर रहे हैं, ठीक है । उसकी निंदा नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि जो भक्ति करने वाला है, वो ज़रूर आम आदमी से अच्छा है । उसमें प्रेम भी होगा, इसलिए वो निंदनीय नहीं है, पर हरेक भक्ति की अपनी पहुँच है, संतों ने यह कहा, निंदा की ही नहीं। सगुण और निर्गुण भक्ति में गुरु का ज़्यादा महत्व नहीं है। गुरु का काम केवल शिष्य को राह बताना है। सफर शिष्य को ही तय करना है । यह शिष्य की ताक़त पर निर्भर करता है कि वो कहाँ तक पहुँच पाता है। इसमें नाम का भी ज़्यादा महत्व नहीं है । यह नाम भी सांसारिक ही होता है । इसी कारण शिष्य ब्रह्माण्ड तक ही सीमित रहता है, उससे परे नहीं जा पाता । सगुण- भक्ति से सामीप्य और सालोक्य मुक्ति की प्राप्ति होती है जबकि निर्गुण-भक्ति से सारोप्य और सायुज्य मुक्ति मिलती है। सामीप्य मुक्ति : सामीप्य मुक्ति क्या है ? अच्छे काम करो, किसी को न सताओ, श्राद्ध आदि करो, सारा जीवन अपने कुल देवता की उपासना करते रहो तो यह मुक्ति आसानी से मिल जाती है । इसमें मरने के बाद जीव पितर लोक में चला जाता है और हज़ारों साल तक वहाँ रहता है । वहाँ पर संसार जैसा कष्ट नहीं है। सुख है वहाँ पर । वहाँ आत्मा को एक सूक्ष्म देही होती है,