भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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इसलिए यदि दो मित्र वहाँ पहुँच जाएँ तो वे एक-दूसरे को पहचान लेते हैं। पर केवल हज़ारों साल की मुक्ति । यह कैसी मुक्ति है ! फिर अपने कर्मों का फल भोगकर संसार में गोते खाना, फिर-फिर माँ के पेट में आना। क्या यही होती है मुक्ति !! सालोक्य मुक्ति : सामीप्य मुक्ति की तरह इसमें भी सारा जीवन अच्छे काम करो, किसी को कष्ट मत दो, तीर्थ, व्रत आदि जितना कर्मकाण्ड शास्त्रों में बताया गया है, उसके अनुसार चलो और सारा जीवन किसी भी इष्ट या देवी- देवता की उपासना करते रहो तो यह मुक्ति प्राप्त होती है। इसमें साधक मरने के बाद स्वर्गलोक में जाता है । इसमें भी जीव अपने कर्मानुसार लाखों साल तक का सुख भोगता है और फिर उसके बाद पुन: माँ के पेट में कष्टों का सिलसिला जारी रहता है । स्वर्ग तीन तरह के हैं। एक नीचे है, फिर दूसरा उससे ऊपर और तीसरा सबसे ऊपर । जो पहला है, उसमें भी आनन्द है, पर जो उससे ऊपर है, उसमें और ज़्यादा आनन्द है और जो सबसे ऊपर है, उसमें सबसे अधिक आनन्द है । स्वर्ग-नरक में कई धाम हैं, सभी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं । वे सब मूर्तियाँ चेतन हैं। जब भी साधक अपने इष्ट से प्रश्न करता है तो उसे उत्तर मिलता है। वो मूर्ति उसे जवाब देती है । स्वर्ग के धामों की नकल पर ही संसार में मंदिर आदि बने हैं। यह एक रहस्यमय सत्य है । हमारे जो पूर्वज साधना करके जीते-जी वहाँ पहुँचे, उन्होंने संसार के लोगों को अपने अनुभव दिये, पर इतना ही पर्याप्त नहीं था, इसलिए उन्होंने उनकी नकल पर संसार में मंदिर आदि का निर्माण कराया ताकि भक्तों के दिल में भक्ति का एक शौक पैदा हो सके, वे भी वहाँ जाने का शौक पैदा कर सकें। पर फिर यह मुक्ति भी थोड़े समय के लिए ही थी । शास्त्र स्वयं कह रहे हैं कि कर्मों के क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आना पड़ेगा, क्योंकि स्वर्ग-लोक भी तो तीन-लोक के अन्दर ही है । सारोप्य और सायुज्य : इन दोनों की प्राप्ति योग से होती है । सारोप्य में जीव ब्रह्म में लीन हो जाता है और सायुज्य में जीव निराकार में लीन हो जाता है । इसमें जीव का करोड़ों साल तक जन्म नहीं होता है, लेकिन फिर जब प्रलय होती है और नयी सृष्टि बनती है तो निराकार वालों को भी संसार में जन्म लेना