भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 264 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 114

काल- पुरुष ने इस संसार में कुटुंब परिवार आदि के मोह - जाल में जीव को फँसा दिया है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि में जीव उलझ गया है । साहिब चेता रहे हैं-

खलक है रैन का सपना। समझझ दिल कोई नहीं अपना ॥

कहीं है लोभ की धारा । बहा जग जात है सारा ॥

घड़ा ज्यों नीर का फूटा । पतर जैसे डार से टूटा ॥

ऐसी निर्जान जिंदगानी। अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥

सजन परवार सुतदारा। सभी उस रोज हों न्यारा ॥

निकल जब प्राण जावेंगे। कोई नहिं काम आवेंगे ॥

निरख मत भूल तन गोरा । जगत में जीवना थोरा ॥

सदा जिन जान यह देही । लगाओ सतनाम से नेही ॥

कटे यम काल की फाँसी। कहें कबीर अविनाशी ॥

कह रहे हैं कि यह संसार तो रात के सपने की तरह हैं । यहाँ पर कोई भी अपना नहीं है। यहाँ पर लोभ की कठिन धारा बह रही है और सारा संसार उसी में बहे जा रहा है। जैसे पानी का घड़ा फूटता है, जैसे डाली से पत्ता टूटता है, ऐसे ही यह जिंदगी एक दिन समाप्त हो जायेगी । इसलिए हे अभिमानी जीव ! सावधान हो जा। मित्र, कुटुम्बी, पुत्र, स्त्री आदि कोई भी तेरे काम नहीं आयेगा। ये सब एक दिन छूट जायेंगे। जब तेरे प्राण निकल जायेंगे तो ये सब तेरे काम नहीं आयेंगे। तू गोरे तन को देखकर मत भूल। इस संसार में थोड़ा-सा ही जीवन है। इसलिए तू अहंकार, लोभ और सारी चतुराई को त्यागकर इस संसार की माया से परे रह और सत्यनाम से प्रीत कर, जिससे काल की फाँस कट सके । साहिब बार-बार कह रहे हैं- हंसा सुध करो आपन

देश ॥

जहाँ से आयो सुधि बिसरायो, चले गयो परदेश ॥

वहि देशवा में जोते न बोवै, मोती फिरै हमेश ॥

वहि देशवा में मरै न बिगड़ै, दुक्ख न पड़त कलेश ॥

चलो हंसा बसो मानसरोवर, मोती चुगो हमेश॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, अजर अमर वह देश ॥

वो विद्वानों की समझ से बाहर है, क्योंकि वो वेद-शास्त्रों की सीमा