भारतकोश
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करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

कहाँ से आया नाम साहिब (परम पुरुष) से बिछुड़ने के बाद आत्माएँ निरंजन की कैद में आ गयीं । अब निरंजन ने एक भी जीव को अमर लोक वापिस नहीं जाने दिया। बड़े बड़े ऋषि, मुनि, योगी, तपस्वी, सन्यासी आदि सब मन के इशारे पर नाचने लगे। निरंजन ने पाप और पुण्य में जीवों को बाँध दिया। नरक और स्वर्ग में अपने पाप और पुण्य का फल भोगकर जीव मृत्युलोक में चौरासी की यातना भोगने लगे। चौरासी की महाकष्टकारक यातना के बाद उन्हें मानव तन दिया गया, जो ज्ञानमय था, पर उसमें भी उन्हें अपार कष्ट दिया गया । मानव तन को मुक्ति की प्राप्ति के लिए मिला। पर जीव निरंजन तक ही पहुँच पाए, क्योंकि अमर लोक का ज्ञान देने वाला कोई न था । इस तरह एक भी जीव अमर लोक नहीं पहुँच पाया। निरंजन सब जीवों को तप्त शिला पर भून-भून कर खाने लगा, उन्हें कष्ट देने लगा। सब जीव त्राहि त्राहि कर उठे । उन्होंने पुकार की— कहा कि यदि कोई परमात्मा है तो हमें बचाओ, काल पुरुष का कष्ट हमसे सहा नहीं जा रहा है। जीवों की वो पुकार सातवें आकाश को चीरती हुई चौथे लोक में परम पुरुष के पास पहुँची । परम पुरुष जान गये कि जीव असहनीय कष्ट में हैं। तब उन्होंने कबीर साहिब को बुलाया, कहा कि जाओ, शून्य में निरंजन जीवों को बड़ा कष्ट दे रहा है, काल के दण्ड से जीवों को आजाद करके यहाँ ले आओ।

कर परनाम ज्ञानी चले, करन हंस के काज ।

जोपै काल न मानि हैं, तुम्हीं पुरुष को लाज ।।

ऐसे में साहिब हर युग में निरंजन के लोक में आते हैं और जीवों को काल के कष्ट से छुड़ाकर अमर - लोक ले जाते हैं। पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा—नहीं । परम- पुरुष ने पूछा- क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है । जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है । तब परम- पुरुष ने कहा कि

यह लो गुप्त वस्तु (नाम) । जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा। तब परम-पुरुष को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से साहिब शून्य में निरंजन के लोक की ओर आए। जब साहिब आने लगे तो निरंजन झांझरी दीप साहिब के सम्मुख आया, बोला- यहाँ क्यों आए हो ? वापिस जाओ । यहाँ पर निरंजन और साहिब के मध्य बड़ी गोष्ठी हुई। साहिब ने कहा— तासो को सुनो धर्मराई । जीव काज संसार सिधाई || तप्त शिला पर जीव जरावहु । जारि वारि निज स्वाद करावहु ||

तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ।।

जीव चिताय लोक लै जाऊँ । काल कष्ट से जीव बचाऊँ ।।

कहा कि हे निरंजन, तुमने बहुत छल, बल से जीवों को बाँधा हुआ है। तप्त शिला पर उन्हें अनेक कष्ट देकर आनन्द लूट रहे हो । परम पुरुष ने मुझे यहाँ भेजा है, मैं जीवों को यहाँ से छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊँगा।

तबै निरंजन बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ।।

तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ।।

निरंजन ने कहा कि मैंने सबको उलझाया हुआ है। 360 ऐसे स्थान हैं, जहाँ निरंजन ने थोड़ी-थोड़ी शक्तियाँ रखी हुई हैं। उन्हीं को देख जीव उलझा हुआ है। निरंजन ने कहा कि कैसे छुड़ाओगे हंसों को ?

तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ।।

पुरुष नाम को कहूँ समझाई। जम राजा तब छोड़ि पराई ।।

घाट घाट बैठे उरझेरा। हमरे शब्द ते होय निबेरा ।।

सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द संग हंसा घर जाई ||

साहिब ने कहा कि मेरे पास नाम है, जिसके सहारे हंस अमर लोक पहुँच जायेगा। अब तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे । तब निरंजन ने कहा-

का ज्ञानी देहो अधिकारा। हमरो नाहिं छूटे जम जारा ।।

पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ।।

तामें पाप पुण्य का वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ।।

जहाँ तहाँ जग भरमावै । ज्ञान संधि कुछ रहन न पावै ।।

एक शब्द की केतिक आशा । मेरे हैं चौरासी फाँसा ।।

कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर नहीं ले जा सकते हो। मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप पुण्य में जीवों को बाँध दिया है। फिर मन रूप में खुद भी अन्दर समाया हुआ हूँ। किसी को सोचने भी नहीं दे रहा हूँ कि क्या मामला है। तुम्हारा एक शब्द क्या करेगा, मैंने 84 लाख फाँसें बनाई हुई हैं, एक में से निकाल दूसरी में फेंक देता हूँ । बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटे चौरासी की धारी ।

छूटै पाँच पचीस गुण तीनों । ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हो ।।

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा जबरदस्त नाम है, जिस घट में दे दूँगा, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, वो आजाद हो जायेगा । निरंजन ने कहा-

हे ज्ञानी का करो बढ़ाई। हमते नाहिं छूट जीव जाई ।।

इतने युग भये तुम देखा । ज्ञानी हंस न एको पेखा।।

का तुम करो का शब्द तुमारा । तीन लोक परलय कर डारा ।।

साधु संत हम देखी रीति । परलय परे सकल जगग जीति । ।

करम रेख बाँधै सब साधा। सुन नर मुनि सकलो जग बाँधा ।।

कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी हंस सतलोक पहुँचा। मैंने इतनी ताक़त से जीवों को बाँधा हुआ है कि छूट नहीं सकते हैं। तुम और तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा । मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ । निरंजन ने कई बार सृष्टि का प्रलय भी किया है । जलेबी बना देता है दुनिया की । ये सब काम साहिब के नहीं हैं। तो निरंजने ने कहा कि इतने पर भी कर्मों में जीव को बाँधा हुआ हूँ। आम आदमी की क्या बात है, देवता, मुनि आदि सबको बाँधा हुआ है। एक भी हंस को जाने नहीं दूँगा ।

ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ।।

हंस हमारा शब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ।।

नाम जपै अरु सुरति लगाई । मिले कर्म लागे नहीं काई ।।

शब्द मानि होय शब्द सरूपा । निश्चय हंसा होय अनूपा । ।

साहिब ने कहा कि हे निरंजन, तब इनके पास सच्चा नाम नहीं था, तूने खा लिया। अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा और तुम्हारा जोर अब जीव पर नहीं चलने दूँगा । पाप और पुण्य का ज्ञान भी जीव को अन्दर से होता जायेगा। नाम उनकी रक्षा करेगा और सब बंधनों से छुड़ाकर अमर - लोक ले जायेगा।

निरगुन काल तब बोले बानी । उरझे जीव सकल जमखानी।।

कैसे के तुम शब्द पसारो । कौने विधि तुम जीव उबारो ।।

ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँ चैं पुरुष की सरनी।।

जग में जीव क्रोध विकारा । कैसे पहुँचै पुरुष के द्वारा ।।

निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोधादि विकारों में जीव को फँसा दिया है। फिर वे परम पुरुष के लोक में कैसे पहुँचेंगे। इस पर भी यम के 14 दूत मैंने प्रत्येक शरीर में बिठाए हुए हैं। तुम उन्हें कैसे निकालोगे ? कहा कि जीव बड़ा गंदा हो गया है, तुम्हारी बात कोई नहीं मानेगा ।

ज्ञानी कहे करहु वरियारा। हमतो कीन्ह सकल निरवारा ।।

जोई ज्ञानी होय हमारा। काम क्रोध ते होय नियारा ।।

तृस्ना लोभहि देई बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ।।

नाम ध्यान बल हंसा घर जाई । क्या रे काल तुम करो बड़ाई ।।

साहिब ने कहा कि जिस शरीर में नाम दे दूँगा, वहाँ तेरा जोर नहीं चलेगा। वहाँ काम, क्रोध आदि कुछ नहीं कर सकेंगे और वो जीव निर्मल हो जायेगा। तुम उस जीव को छू भी नहीं पाओगे और वो हंस रूप होकर अपने देश चला जायेगा |

कहे निरंजन सुनो हो ज्ञानी । कथि हो ज्ञान तुम्हारी बानी ।।

युगत महात्म सबै बताऊँ । तुम्हारा नाम ले पंथ चलाऊँ ।।

अब निरंजन अपनी जगह पर आया, कहा कि मैं भी तुम्हारा नाम लेकर अपना पंथ चलाऊँगा यानी नकली नाम का प्रचार करूँगा । आज आप देखें तो सभी सद्गुरु बने हुए हैं, सभी संत बने हुए हैं, सभी नाम दे रहे हैं। यह सब निरंजन का ही खेल है। बात वे निरंजन की ही कर रहे हैं और मोहर संतों की लगा रखी है। तो निरंजन ने यह भी कहा

ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम माना । ।

इनको माने सब संसारा । कलि में गंगा मुक्ति द्वारा।।

देही दान से उतरे पारा। ऐसे सुमृत कहे विचारा ।।

यह विधि जग जीव भुलाहीं । जरा मरन सब बंध बंधाहीं ।

सूतक पातक वेद विचारा। पूछ वेद से करहि संहारा ।।

एकादशी मुक्ति को भाई । योग जग्य करवे अधिकाई ॥

कहा कि मैंने वेद आदि के द्वारा कर्मकाण्डों में जीव को उलझाया हुआ है। सब इन्हीं को मानते हैं। वेद में निरंजन ने अपनी ही बात की है । उसी ने बनाए हैं वेद । इसलिए साहिब का रहस्य उसमें नहीं दिया। तो उसने कहा कि कोई तुम्हारी बात नहीं मानेगा, इसलिए मत जाओ दुनिया में । साहिब ने कहा—

सुनहु काल ज्ञान की संधि । छोरो जीव सकल की फँदी ।।

जब निज बीरा हंसा पावै । योग बरत तप सबै नसावै ।।

वेद किताब की छोड़े आसा । हंसा करे शब्द विस्वासा ।।

ताके निकट काल नहिं आवै । निज बीरा जो सुरत लगावै ।।

जोग बरत पतहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ।।

कहा कि जिसे नाम मिल जाएगा, उसका सारा वहम अन्दर से धुल जाएगा। वो फिर कर्मकाण्डों को छोड़कर नाम में ही विश्वास करेगा । नाम सदा उसकी रक्षा करेगा । काल उसके निकट नहीं आ पायेगा । नोट- सत्यपुरुष का पाँचवां पुत्र निरंजन है जिसको निराकार, निरंजन, नारायण, अथवा मन आदि नामों से जाना जाता है जिसे संसारिक लोग राम, ब्रह्मा, आदि निरंजन, कादर, क्रीम, प्रमेश्वर, प्रमात्मा, हरी, हरि, अद्वैत, भगवान, तथा अलख निरंजन आदि नामों से याद करते हैं । इसी निरंजन के ग्रंथ पोथियों में हज़ारों नाम लिखे गए हैं।

जब निरंजन की बात न चली, वो कटने लगा तो उसने क्रोधित होकर कहा कि तुमने पहले भी मुझे मानसरोवर से निकाला था और अब मेरी दुनिया में तुम आए हो, इसलिए मैं बदला भी लूँगा । यह कह निरंजन ने विकराल हाथी का रूप धारण किया और साहिब पर झपटा।

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सूँड़ दाँत गहि मोरा ।।

मारेऊ शब्द पाँय पर पेली । तोर सूँड़ समुद्र गहि मेली ।।

पुरुष रूप तबहीं पुनि धारा । जौन सरूप सकल औतारा ।।

साहिब कह रहे हैं कि तब मैंने वहाँ परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया और उसकी सूँड़ पकड़कर समुद्र में फेंक दिया। तब निरंजन अधीन हुआ, कहा कि क्षमा करो, मैंने आपको पहचाना नहीं था, आप तो स्वयं साहिब हैं, मेरा बड़ा भाग्य है कि जो आपने मुझे दर्शन दिये। अब आप दुनिया में जाएँ, पर मेरी भी एक विनती सुनें। कहा कि यदि आप सभी जीवों को अपने लोक ले जायेंगे तो मेरे शाप का क्या होगा । (क्योंकि निरंजन को रोज एक लाख जीव निगलने का शाप मिला था ) । निरंजने ने कहा कि जो जीव पाप कर्म करेंगे, क्या वो भी पार हो जायेंगे । तब साहिब ने कहा कि जो जीव मेरे शब्द पर चलेंगे, मेरा कहा मानेंगे, उन्हें तुम हाथ भी नहीं लगाओगे। पर दूसरी ओर जो मेरे शब्द के विपरीत चलेंगे, उन्हें तुम ले जाना ।

सुनो निरंजन वचन हमारा। नहीं सत्त वो जीव तुम्हारा ।।

इस तरह साहिब का निरंजन से करार है । यही कारण है कि मैं आपसे कह रहा हूँ कि भजन हो सके तो करना नहीं तो कोई बात नहीं है, पर नाम लेकर ग़लत नहीं चलना। जो वस्तु दी, उसे संभालना। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करना । सत्य नाम निज औषधी, खरी नियत से खाय

औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ।।

6. जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है

जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्माण्ड

में कहीं नहीं है

है

जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है । यह बात अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । इसमें कहीं भी अहंकार की बात नहीं है । यह अलग बात है कि लोग अपनी समझ से इसका कैसा भी अर्थ लगाएँ। पर यह बात बड़े गहरे विश्वास के साथ बोल रहा हूँ। यह अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । अहंकार से बड़ा परहेज करता हूँ। मेरा मानना है कि जैसे शरीर को कैंसर खा जाता है, इसी तरह अहंकार ज्ञान को खा जाता है । कितना भी ज्ञानी हो, अहंकार उसे ख़त्म कर देगा। इसलिए मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । यह बात सत्य बोल रहा हूँ। मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूँ। सत्य मानना, मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ। मैं यह बात विचार करके बोल रहा हूँ, मैं यह बात विवेक से बोल रहा हूँ, मैं यह बात ज्ञान से बोल रहा हूँ। मैं इन शब्दों को प्रमाणित कर सकता हूँ। हम अपने आस-पास में नाना मत-मतान्तर देख रहे हैं। अगर ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि 70 प्रतिशत माँस, शराब का इस्तेमाल करते हैं । हालांकि वो भक्ति की बात भी कर रहे हैं, हालांकि वो संत- मत की बात भी बोल रहे हैं, पर उनका खान-पान ठीक नहीं है, उनकी आचार संहिता भी ठीक नहीं है, कर्म से भी वो उत्तम नहीं हैं। बहुत डाउन हैं वे । आप खान-पान में भी बेहतरीन हैं और कर्म से भी बड़ा अन्तर है । वो छल, कपट, धोखा आदि कर रहे हैं, लेकिन आपकी जिंदगी एक स्थिर जिंदगी है । आप चाहकर भी ग़लत नहीं कर पाते हैं। जैसे ही करने जाते हैं, एक शक्ति आपको सतर्क करती है, आपको सावधान करती है । यह प्रासंगिक बदलाव हरेक नामी की जिंदगी में दिखाई देता है। और फिर सुरक्षा के मामले में भी आप लाजवाब हैं। ज्ञान के

मामले में भी आप परम- ज्ञानी हैं। क्या करने योग्य है, क्या नहीं करने योग्य है, यह भी आपको समझाने की ज़रूरत नहीं है । जैसे ही आप कोई ग़लती करने जाते हैं, अन्दर से एक प्रेरणा मिलती है, आपको वो ताक़त चेतन करती है, बताती है कि यह न किया जाए । यह ज्ञान आपके पास है । आप महसूस करते हैं। भक्ति-क्षेत्र में आप अनूठे हैं। जब आप अन्य मत-मतान्तरों की तरफ देखते हैं तो एक बात का पता चलता है कि कभी वे भैरो को मानते हैं, कभी काली जी को मानते हैं, कभी कुछ करते हैं। इसका बोध मिलता है, इसकी जानकारी मिलती है । वे भ्रम में हैं; वे अनिश्चित हैं । आपको इसका ज्ञान है कि दुष्टात्माएँ कैसे व्यवधान डालती हैं । आपको इसका बोध हो जाता होगा । आप भक्ति में मजबूत हैं । आप दुनिया से निराले हैं। दुनिया का हरेक आदमी मन के नशे में है, मन की पकड़ में है । हरेक को मन, जैसे चाहे, नचाता है, पर आप मुक्त हैं । आपके ऊपर मन का ज़ोर नहीं चल पाता है। साहिब कह तो रहे हैं-

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह जग बाँध नचावे ॥

नि:संदेह इस मन का कोई ज़ोर आपपर नहीं चल रहा है । मन बेबस है | पूरी दुनिया को यह नचा रहा है। एक नशा - सा मन का सबके ऊपर है। माया का एक नशा-सा सबके ऊपर छाया है । पर आप मन की पकड़ से आज़ाद हैं। मन का नशा छाता है तो काम, क्रोध आदि जाग्रत होते हैं । ये चीजें आपमें भी हैं, पर आपके पूरे कण्ट्रोल में हैं। आपका ये चीजें कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं। आपमें आध्यात्मिक शक्ति भरपूर है । आपके पंथ में लाजवाब शक्तियाँ हैं । आप मन, कर्म, वचन से किसी को पीड़ा नहीं देने वाले, अन्दर से शांत और सुखी हैं। एक ताक़त आपको प्रेरित कर रही है । आप पूरे सुरक्षित हैं। भूत-प्रेत आपके पास नहीं आ पा रहे हैं। आपके पास आना तो दूर, यदि आप किसी ऐसे ग़ैरनामी के पास बैठकर नाम करेंगे जिसके पास में भूत होगा तो वहाँ से भी भाग जायेगा । आपपर कोई जादू, टोना, सिद्धि ताक़त प्रभाव नहीं डाल पा रही है। मेरा मानना है कि साहिब एक बात की अनुभूति दिलाता है। जीवन में एक बार, दो बार या कई बार, पर दिलाता है। यह काम साहिब खुद करता है । एक बार धर्मदास जी उदास हो गये । साहिब अपनी जगह धर्मदास को देकर

जा रहे थे। धर्मदास ने कहा कि काल - पुरुष में जान है; सबको भ्रमित कर दिया; मुझसे कैसे होगा ? लोगों को भक्ति में कैसे जोडूंगा? साहिब ने कहा कि चिंता मत कर ।

पुरुष शक्ति जब आन समाई । तब नहीं रोके काल कसाई ॥

कहा कि जब परम-पुरुष की ताक़त आकर समायेगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा। जिस दिन नाम मिलता है उस दिन परम - पुरुष की ताक़त आकर समाती है। तब काल का ज़ोर नहीं चलता है । आप इन बातों पर मनन करें। इनमें से कितनी बातें आपके साथ में हो रही हैं। यह आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता है । आपके साथ में एक ताक़त है, यह मेरी वाणी से अधिक आप स्वयं जान सकते हैं। मुझे आपको कुछ समझाने की ज़रूरत ही नहीं है । मेरी वाइब्रेशन ही आपको समझा देगी। सत्संग में बैठकर उलटी गिनती गिनूँगा तो भी समझ आ जायेगी और आप कभी बोर भी नहीं होंगे। वाणी से समझाना तो एक बहाना है । रावण का दिल बदला ही नहीं। राम जी थे । दुर्योधन का दिल बदला ही नहीं। कृष्ण जी थे । पर साहिब कह रहे हैं- सतगुरु मोर रंगरेज, चुनरि मोरी

रंग डारी ॥

यह काम बड़ा मुश्किल है । इस पंथ में आने में रुकावटे हैं कुछ । निरंजन रुकावटें डालता है । मेरे लिए लोग जो-जो भी कह रहे हैं, अच्छा ही कह रहे हैं, ठीक ही कह रहे हैं। केवल अपनी शैली बदल रहे हैं। मैं सब चीज़ सकारात्मक लेता हूँ। मैं नकारात्मक में जाता ही नहीं हूँ । कुछ लोग कह रहे हैं कि इसके पास हिप्नोटिज्म है। इससे उच्चाटन किया जाता है। सही तो कह रहे हैं। जो वस्तु मेरे पास है, वो किसी के पास नहीं है। पर वो हिप्नोटिज्म कह रहे हैं । संतों के शरीर से अध्यात्म किरणें निकलती हैं; वो जगाती हैं । तो उन्हें यह हिप्नोटिज्म लग रहा है । फिर दूसरा कह रहे हैं कि धर्म बदल देता है । यह भी सही है। दुनिया निरंजन के धर्म का पालन कर रही है, मैं परम-पुरुष के धर्म की ओर ले चल रहा हूँ। मैं कुछ भी नकारात्मक नहीं ले रहा हूँ। मैं उनकी बातों को ठीक-ठीक मान रहा हूँ। तो आपका बदलाव मामूली नहीं है। आप दुनिया से निराले हैं । आपके खोटे कर्मों को निकाला गया है। अगर गुरु चेले की ग़लती बोलने में

झिझक रहा है तो समझना कि वो गुरु मर चुका है। मैं उदण्ड नहीं हूँ, पर आप यह नहीं सोचना कि आप ग़लती करें और मैं कुछ न कहूँ। यह नहीं सोचना । गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट । अन्तर हाथ सम्हार दे, बाहर मारै

चोट ॥

आपमें जो बदलाव है, वो मामूली नहीं है । आप दुनिया से निराले हैं। जो काम आपसे नहीं संभलने वाला होता है, उसमें एक ताक़त आकर आपको मदद दे जाती है। वो एहसास करवाती है कि साथ में हूँ । मैंने जो कहा कि ‘जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है, ' प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है । 10वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नज़र आते हैं, पर जब 11वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है। वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा । अन्यथा कितनी भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा । कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था । पर नहीं हो सका मन काबू में । इसलिए—

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥

जब पूर्ण गुरु एक ताक़त रोपित कर देता है तो अन्दर का पूरा खेल दिखने लगता है, अपने अन्दर के शत्रुओं को साधक समझने लगता है, मन समझ में आ जाता है । मैंने बार-बार कहा है कि 'जो वस्तु मेरे पास है वो कहीं नहीं है'। यह सुन एक ने मुझसे कहा कि जो आप कहते हैं कि जो पॉवर मेरे पास है, किसी के पास नहीं, इसे प्रमाणित करो। मैंने उससे कहा कि मैं पॉवर नहीं बोल रहा हूँ, वस्तु बोल रहा हूँ । शब्दों की तरफ ध्यान दो । जैसे कोई दुकानदार कहता है कि जो मिर्ची मेरे पास है, कहीं नहीं मिल सकती। वो कहता है कि यह फलानी - फलानी जगह से आई है । ... तो मैं जिस 'वस्तु ं की बात कर रहा हूँ, वो भी इस संसार की नहीं है, तीन लोक में कहीं नहीं है। वो चौथे लोक की वस्तु है। जब वो वस्तु मिलती है तो तीन चीज़ें आ जाती हैं। मैंने अपनी इस चीज़ का अनुभव एक-दो पर नहीं, बल्कि लाखों

लोगों पर किया है । इसलिए इसमें कोई संशय नहीं है, पक्की बात है । तीन चीजें शर्तिया होती हैं। जिसे भी मैं नाम देता हूँ, तीन चीज़ें पक्का हो जाती हैं— 1. आत्मा और मन अलग हो जाते हैं। 2. संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है । 3. एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है। असर सामने है। मेरा हर नामी नाम पाकर बदल जाता है। हर इंसान मन तरंग में नाच रहा है । मन प्रबल है । पर मेरे नामी के साथ अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। नाम पाने के बाद मेरा हर नामी चेतन हो जाता है । अन्य पंथों के लोगों के साथ मेरे नामी की तुलना की जाए तो उनका अपने ऊपर कोई होल्ड नहीं मिलता है, कोई आध्यात्मिकता नहीं मिलती है। मेरे नामी अपने को सबसे अलग पाते हैं, उन्हें अपने अन्य साथी बेवकूफ़ लगते हैं, उनकी हरकतें पागलों वाली लगती हैं, क्योंकि उनके मूड का कोई पता नहीं होता कि कब अच्छे बन जाएँ और कब गंदे | कब मूड खराब हो जाए, कोई पता नहीं । यानी मन पर कोई होल्ड नहीं होता, इसलिए पागल लगते हैं । मेरे नामी का मन पर होल्ड होता है, क्योंकि नाम के साथ मैं मन से उसकी आत्मा का बिलगीकरण कर देता हूँ, दोनों को अलग कर देता हूँ, जिससे मन समझ में आने लगता है। यह काम दुनिया में सबसे कठिन है, जो कोई नहीं कर सकता है। जब मन समझ आने लग जाता है तो दुनिया फीकी लगने लग जाती है, उसका आकर्षण समाप्त होने लग जाता है । फिर तीसरा हर नामी को लगता है कि उसके साथ में एक सबल संरक्षक है, हरेक को वो संरक्षक अनुभव होता है । सच है, यह जो वस्तु मेरे पास है, किसी के पास नहीं है। इस वस्तु से मन की दुनिया समाप्त होती जाती है और आत्मा का रूप समझ आने लग जाता है I ध्यान क्यों किया जा रहा है ? यह जानने के लिए कि मैं क्या हूँ ? गुरु आत्मा और मन को अलग कर देता है । किसी कीमत पर यह काम अपनी ताकत से नहीं हो सकता है । मन ने ऐसे उलझा दिया है कि आत्मा कुछ समझ नहीं पा रही है। मन कहता है कि रोटी खानी है तो आत्मा कहती है कि यही मेरी इच्छा है। इस तरह मन ने आत्मा को अपने पीछे लगा रखा है। आत्मा सभी इच्छाओं में, कल्पनाओं में घूम रही है। जितने भी कर्म मनुष्य कर रहा है,

सभी उलझन वाले हैं । जब भी कोई चाहे कि इससे निकलें तो यह नहीं निकलने दे रहा है। इसकी पकड़ बड़ी दूर तक है। धन-दौलत दे देगा, सिद्धियाँ-शक्तियाँ दे देगा, पर अपने से आगे नहीं जाने देगा। एक अदद गुरु आपको बाहर निकाल देगा। मन की पहली ताकत है- अज्ञान । मन आत्मा में ऐसे घुल-मिल गया है कि बड़ा झमेला हो गया है। आत्मा यह झमेला लिए-लिए घूम रही है, इसे समझ नहीं पा रही है। चाहे कोई करोड़ों उपाय भी कर ले, इस झमेले को समझ नहीं सकता है, मन की सीमा से बाहर नहीं जा सकता है। गुरु यथार्थ में आत्म रूप दिखाता है। हंस की चोंच में गुण है। वो दूध पीता है । अगर उसमें पानी मिला हो तो वो उसे छोड़ देता है, केवल दूध-दूध पी जाता है। यदि पाव दूध में पाव पानी मिलाकर दे दिया जाए तो वो पूरा दूध पी लेगा और पूरा पानी छोड़ देगा। यह काम और कोई नहीं कर सकता है। केवल हंस। ऐसे ही पूर्ण सद्गुरु की सुरति में यह ताकत है कि आत्मा और मन को अलग कर सकता है । यह काम गुरु पल में कर देता है । फिर आत्मा दुबारा मन में नहीं समा सकती । चाहकर भी नहीं । जैसे- दूध को मथ घृत न्यारा किया,

पलट कर फिर ताहिं में नाहिं समाई ॥

दूध से घी बना लिया तो फिर दूध नहीं हो सकता। यदि दही को मथ मक्खन निकाल लिया तो फिर चाह कर भी उसमें नहीं समा सकता। जब पूर्ण गुरु आत्मा को मन से अलग कर देता है तो फिर आत्मा मन में नहीं समा सकती है। कितनी भी ताक़त लगा ले कोई, यह काम नहीं कर सकता है । पर-

कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥

तब एक संतुष्टि मिलती है । जैसे काँटा लगा हो तो निकालने पर आराम मिलता है। ऐसे ही मन का काँटा गुरु निकाल देता है । फिर आप चाहकर भी जगत के पदार्थों में रम नहीं पायेंगे । जगत के पदार्थ आपको रोमांचित नहीं कर पायेंगे। ऐसे पर ही कहा- सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण । नाम अकेला रह

गया, पाया पद निर्माण ॥

यह काम पल में किया। फिर तीसरा, एक सुरक्षक भी साथ हो गया। हर पल के लिए एक ताकत साथ में दे देता है । तभी तो कहा— जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहीं ।

प्रेम गलि अति साँकरी, तामें दो न समाहिं ॥

जो आप अपने को महसूस कर रहे हैं, यही धोखा है। यह आपा ही आसक्त है। यह पूरा खत्म हो जाता है । क्यों ? गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह । बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो

देह ॥

गुरु आपको अपने समान कर देगा । आप अपनी दुनिया ही भूल जाओगे । साहिब की वाणी में वजन है—

नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा ॥

सच मानना, अभी बार- बार चेताकर कह रहा हूँ, जब यहाँ से चला जाऊँगा तो दुनिया पछताएगी, क्योंकि सत्य है - जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।

पलटू कहै साँच कै मानो । और बात झूठ कै जानो ॥

जहवाँ धरती नाहिं अकासा । चाँद सूरज नाहिं परगासा ॥

जहवाँ ब्रह्मा विष्णु न जाहीं । दस अवतार न तहाँ समाहीं ॥

आदि जोति ना बसै निरंजन । जहवाँ शून्य शब्द नहिं गंजन ॥

निरंकार ना उहाँ अकारा । अक्षर शब्द नहिं विस्तारा ॥

जहवाँ जोगी जाए न पावै । महादेव ना तारी लावै ॥

जहवाँ हद अनहद नहिं जावै । बेहद वहाँ रहनी ना पावै ॥

जहवाँ नाहिं अगिनि परगासा । पाँच तत्व ना चलता स्वाँसा ॥

सुन्न गगन में उठत है, सो सब बोल में आवै ।

निःसदी वह बोलै नाहीं, सो सत सबद कहावै ॥

  • पलटू साहिब

7. नाम दान का दिन

नाम दान का दिन

जब आप नाम-दान लेने आ रहे हो तो एक बात जान लेना कि आज आपका नया जन्म होने जा रहा है । आज तक जीवन में जो कुछ भी छल- कपट किया, पाप-कर्म किये, भूल जाओ, क्योंकि तब अज्ञान में थे, पाप-पुण्य का इतना बोध नहीं था। वैसे पाप होना नहीं चाहिए, पर पूर्व संस्कारों से बुद्धि न हुई और इस कारण पाप हुए। खैर, अब आप अज्ञानी नहीं रहेंगे। पाप- पुण्य का बोध आपको हो जाएगा, इसलिए अब कुछ ग़लत नहीं करना । सात नियम आपको बताए जायेंगे, जिनपर आपको दृढ़ता से चलना होगा। चिंता मत करें, आपको नाम की ताक़त का सहयोग मिलेगा। कहीं गफलत में होंगे तो वो ताक़त आपको रोकेगी, समझायेगी, पर उसके अनदेखा नहीं करना । यदि उसे अनसुना करके जानबूझकर ग़लत किया तो माफी नहीं मिलेगी। सज़ा साथ- साथ मिलेगी। सत्य बोलना, माँस न खाना, नशा न करना, चरित्रवान रहना, हक की कमाई खाना, जुआ नहीं खेलना और चोरी नहीं करना । तो आपको पहले ये नियम बताए जायेंगे । आप एक विश्वास के साथ नाम लेने आ रहे हैं तो और जगहों पर आपका विश्वास नहीं होना चाहिए, क्योंकि जिसकी सभी में आस्था है, समझो कि उसकी किसी में आस्था नहीं है, इसलिए वो नास्तिक है। आप आस्तिक होकर आएँ। पूरे विश्वास के साथ आएँ। इसलिए यदि आपने कोई डोरे, ताबीज, ग्रहों वाली अँगूठियाँ आदि पहन रखी हैं तो वो सब उतार आएँ, एक पूरे विश्वास के साथ समर्पित भाव से आएँ। ‘एक नाम को जानकर दूजा देई बहाय ।।' समझ लें कि आप सही जगह जा रहे हैं। मैंने बार-बार कहा है कि जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। इस बात को दिमाग़ जल्दी नहीं मानता है । आप विश्वास रखें। ऐसे ही सब कुछ नहीं कहा। पर मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं ही साहिब हूँ, मैं ही सब

कुछ कर रहा हूँ। मैंने तो साहिब के लिए कहा। अपना नाम लेना ही नहीं है । पता है, दुनिया डर रही है। खैर, अभी तो साहिब पर्दा करके चल रहा है । जिस दिन पर्दा हट जायेगा, सब साहिब में लय हो जायेंगे । लय हो जायेंगे सब। आपको ऐसे ही सब कुछ छोड़कर आने को नहीं कहा है। इसके पीछे कोई रहस्य है। तो फिर नाम-दान के समय आपसे एक चीज़ माँगूगा — विश्वास । विश्वास है क्या? आप कहेंगे- हाँ, है । इसी विश्वास के बदले आपको नाम दूँगा। याद रहे, इसी विश्वास के बल पर आपको पार करना है । इसलिए सही में करना विश्वास । विश्वास क्या-

गुरु को अखंड ब्रह्म कर माने । गुरु को नहीं मानुष कर जाने ।।

फिर मैंने आपसे आपका तन, मन, धन - तीनों लेने हैं; कहूँगा कि सच्चे दिल से आँख बंद करके दो । पता है, ये क्यों लूँगा ! क्योंकि ये तीनों ही आत्मा पर बीमारी है। आत्मा भूल से इन्हें मेरा-मेरा कह रही है । इसलिए—

तन मन दिया तो भल किया, सिर का जासी भार ।

जो कछु कहे सो मैं दिया, बहुत सहे शिर मार ।।

बस, आप आँख बंद करके सच्चे दिल से दे देंगे। यदि सच्चे दिल से नहीं देंगे तो समझ लेना कि मैं भी सच में नहीं लूँगा। तो जब आप अपना तन, मन, धन–तीनों मुझे सौंप देंगे तो फिर बाद में मैं आपका तन आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा—जाओ ! घर में माता-पिता होंगे, बाल-बच्चे होंगे, उनकी सेवा करना, पर आज से इसे मेरा मानकर कोई भी ग़लत काम नहीं करना । आप तो मुझे सौंप चुके होंगे, पर मैं आपको वापिस कर दूँगा। फिर इस तरह धन भी आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा कि इससे कोई ग़लत काम नहीं करना, किसी पर झूठा मुकद्दमा भी नहीं करना। फिर आपका मन मैं आपको वापिस नहीं करूँगा, कहूँगा कि इसे मेरे पास ही रखना । इसके बाद फिर आपको शीश पर अपना हाथ रखकर एक-एक करके कान में मंत्र दूँगा और आपकी आत्मा को उस एक पल में मन से अलग करके आज्ञा चक्र पर एकाग्र कर दूँगा । आपकी आत्मा को अपने में समाहित करके फिर छोड़ दूँगा। इससे जो गुरु - अंश आपके साथ टच हो जायेगा, वो कभी समाप्त नहीं होने वाला । नाम रूप में साहिब खुद साथ खड़ा हो जायेगा ।

नाम पाय सत्य जो बीरा । संग रहूँ मैं दास कबीरा।।

बस, यहाँ पर अपना नया जन्म समझना। फिर आपको खोलकर नाम और मंत्र - दोनों समझा दिये जायेंगे । ध्यान में बिठाकर अभ्यास भी करवा दिया जायेगा। नाम लेने के बाद आप सुबह - शाम नाम - भजन में बैठना। वैसे तो खाते-पीते, सोते-जागते हर समय लगे रहना । पर बैठते समय पहले 4-5 मिनट गुरु-मंत्र करना यानी आपने गुरु को याद करने बुला लिया। अब जो नाम बताया गया, उसका स्वाँसों में सुमिरन करते हुए शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान को एकाग्र करके जैसे बताया, वैसा करना । इस भ्रम में नहीं पड़ना कि यह नाम तो जपने में आ रहा है। जैसे तार पर बिजली चलती है, ऐसे ही इसके द्वारा आध्यात्मिक किरणें आपके अंदर आयेंगी। जो नाम आपको दिया, वो कहने- सुनने में आने वाला नहीं है। वो आपके साथ है । 'सार नाम सत्पुरुष कहाया।।' वो खुद परम- पुरुष है, जिसे प्रकट कर दिया। तो इस भ्रम में न पड़कर नाम का सुमिरन करना, क्योंकि इसी से ध्यान एकाग्र होगा। वैसे कभी भी बैठ सकते हो और सच पूछो तो आधी रात का समय बड़ा सुंदर है, क्योंकि उस समय मैं मिल भी जाऊँगा । 'देखा देखी सब कहें, भोर भये गुरु नाम । अर्धरात को जागसी, खानाजाद गुलाम ।।' छ: महीने तक गुरु पूरा-पूरा आपके साथ होगा। इस बीच यदि उसे पा लिया तो पा लिया अन्यथा बाद में थोड़ी मुश्किल होगी। इसलिए जमकर ध्यान करना - पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ। यदि नाम या मंत्र भूल जाओ तो किसी भी नामी से पूछ सकते हो। पर याद रहे, अपनी पत्नी से नहीं । यदि उससे पूछा तो फिर भाई-बहन का रिश्ता हो जायेगा। किसी दूसरे गैरनामी के सामने नाम (शब्द) को प्रकट नहीं करना अन्यथा बुरी हालत हो जायेगी । नामी से आप कुछ भी समझ सकते हैं। यदि आन्तरिक दुनिया में कोई रुकावट आए तो उसके लिए मैं हर समय उपलब्ध हूँ, पूछ सकते हो।

8. हमारा पंथ क्या है

हमारा पंथ क्या है

‘साहिब' परम-पुरुष को कहते हैं और 'बंदगी' प्रणाम का पर्यायवाची सूचक है। इस तरह उस परम - पुरुष को प्रणाम का दूसरा नाम ' साहिब - बंदगी' है । साहिब बंदगी पंथ कोई कबीर पंथ नहीं है । यह संत - मत भी नहीं है। संत-मत इसलिए नहीं है कि कबीर साहिब से नाम लेने से पहले सभी काल-पुरुष की भक्ति ही तो कर रहे थे । इसलिए उनकी वाणी में काल - पुरुष की भक्ति से संबंधित शब्द भी हैं, जिन्हें पढ़कर भक्त लोग भ्रमित हो जाते हैं। और संकलनकर्ता कोई संत तो है नहीं कि सत्य - भक्ति से संबंधित शब्द छाँटकर अलग कर सके। तो दूसरा हम कबीर पंथी भी नहीं हैं। वर्तमान में जितने भी कबीर पंथी हैं, वो साहिब की मूल शिक्षा पर चल ही नहीं रहे हैं, भूल चुके हैं। काल-पुरुष सबको उलझा देता है। कईयों में ऐसा है कि दीक्षा हमसे लो पर गुरु कबीर साहिब को मानो । कबीर साहिब यह कहकर नहीं गये कि मेरी भक्ति करना। वो तो सद्गुरु की भक्ति के लिए बोल गये । वास्तव में मुझे कबीर साहिब की वाणी को लेने की ज़रूरत भी नहीं है। यह तो मैं मजबूरी में उदाहरण के लिए, अपनी बात का प्रमाण देने के लिए ले रहा हूँ, क्योंकि मैं जो बोल रहा हूँ, वो अनुभूति की बात कर रहा हूँ, आँखों देखी बात कर रहा हूँ जबकि बहुत से महात्मा द्वारा कबीर साहिब की वाणी को तो कई जगहों से तोड़-मरोड़कर मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है । इसलिए यदि आप कबीर साहिब की वाणी को ही पढ़ेंगे तो भी भ्रमित हो जायेंगे। क्योंकि शुद्धता नहीं रह गयी है। मैं आपके सामने शुद्ध अध्यात्म पहुँचा रहा हूँ। इसलिए आपको कबीर साहिब या संतों की वाणी के गिर्द न घुमाकर अपने गिर्द ही घुमा रहा हूँ। एक ने कहा कि आप निरंकारी भी नहीं हैं, राधा स्वामी भी नहीं हैं, जैनी भी नहीं हैं, मुसलमान भी नहीं हैं, फिर मामला क्या है ? फिर क्या हैं? मैंने कहा कि यह फ़िलासफ़ी समझने में बड़ा समय लग जायेगा । किसी को इस्लाम समझाना हो तो कुरान आगे रख दो, समझ जायेगा। हिंदू धर्म समझाना हो तो बता दिया जाता है कि त्रिदेव हैं । ईसाई धर्म समझाना हो तो क्राइस्ट का

संदेश दे दो। पर किसी को साहिब बंदगी समझाना हो तो पसीना छूट जाता है। इसलिए आप परेशान हो जाते हैं। मैंने समझा दिया है आपको। आपके बस की बात नहीं है । पहले जितने भी आए, काल की भक्ति कही । हम ऋषि-मुनियों के उदाहरण नहीं दे रहे हैं। क्योंकि उन्होंने तो काल की बात की है। हमारी फ़िलासफ़ी तो ऐसी है कि एक छोटा-सा लड़का गाता फिरता है— 'मुझे अपने ही रंग में रँगदा फिरे, साहिब अपने ही रंग में रँगदा फिरे ॥' जो कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, ठीक कह रहे हैं । हम मीराबाई की फ़िलासफ़ी पर नहीं हैं। क्योंकि उन्होंने तो पहले सगुण भक्ति की है, सगुण पद भी गाए हैं। बाद में जब रविदास जी से दीक्षा तो सत्य - भक्ति में आई। तो पहले वाला कोई पढ़ेगा तो कहेगा कि एक ही बात है। हम अंतर ठीक से समझायेंगे । पलटू साहिब भी पहले निरंजन के दायरे में घूम रहे थे। गुरु नानक देव स्वयं ओंकार की उपासना कर रहे थे। बाद में साहिब से नाम लिया । और दसवें द्वार से भी आगे बोल दिया। हम एक को बॉयकाट नहीं कर रहे हैं । उसकी वाणी पर चलो, यह नहीं कह रहे । जो लोग कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, वो ठीक ही कह रहे हैं। कबीर साहिब की फ़िलासफ़ी पर चलना, यह भी नहीं कह रहा हूँ। समय के साथ लोगों ने उनकी वाणी को इतना तोड़-मरोड़ दिया है कि कुछ कहते नहीं बनता । भ्रमित हो जाता है इंसान। सबने अपनी बात बीच में मिला दी है। अपनी सुविधाओं के अनुसार लिख दिया है। इसलिए मैं जो आपके पास पहुँचा रहा हूँ, वो शुद्ध है। एक माई ने कहा कि 'साहिब' (परम-पुरुष) को मेरे लिए कहना कि मेरा कष्ट दूर करे। मैं पूछना चाहता हूँ कि वो फाल्ट में थी कि नहीं ! एक ने कहा कि जब ध्यान में बैठती हूँ तो कभी आपके गुरु जी आ जाते हैं, कभी कबीर साहिब आ जाते हैं। मैंने कहा—माई, तू तीन किश्तियों पर क्यों खड़ी है ! आपने मेरे गुरु से क्या लेना है ! आपको कबीर साहिब से क्या लेना है! आपको तो मुझसे काम होना चाहिए, केवल मुझसे । 'मुझे है काम सतगुरु से....' वो कबीर साहिब अपनी शरण नहीं बता गया; सारा भार गुरु को सौंप गया। कहा-

गुरु मानुष कर मानते, चरणामृत को पान ।

ते नर नरकै जायेंगे, जन्म जन्म होय स्वान॥

मेरे गुरुदेव मेरे गुरुभाइयों को बोल गये कि इन्हें ही गुरु मानना मेरे जाने के बाद, क्योंकि मैं अब अपने बिंदू पर जा रहा हूँ। तो हम सद्गुरु फ़िलासफ़ी पर चल रहे हैं ।

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाहीं ।

कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहीं ॥

हम कह क्या रहे हैं, यह समझो । गुरु ताक़त देता है; उसी से पार हो सकते हैं। मेरी वाणी में कमाई की बात नहीं मिलेगी । सेवा करो, यह भी नहीं कह रहा हूँ। जैसे किसान ने बीज बोया तो बहुत बड़ा काम हो गया। जमीन को गोड़ित किया, सींचा। फिर समय समय पर खाद भी डालनी है, सींचते भी रहना है। इस तरह आगे भी देखना है । मैंने जो आपको देना है, दे चुका हूँ । अब तो गहन सत्संग द्वारा उलझनों से परे कर रहा हूँ। बस, एक व्यक्तित्व कबीर साहिब को ओवरटेक नहीं कर रहा हूँ। बाकी किसी की फ़िलासफ़ी पर नहीं चल रहे हैं। मगहर में किताबें मिल रही थीं तो मैंने कहा कि नहीं ख़रीदना। पर कुछ ने मेरे मना करने पर भी चुपके से ख़रीद लीं। उसमें तो ग़लत बताया गया है । बाद में लोगों ने अपने विचार उसमें मिला दिये हैं । उसमें बताया गया है कि कबीर ने आत्मा को ही सब कुछ कहा है; किसी सत्लोक की बात नहीं है । तो मैं आपको शुद्ध चीज़ दे रहा हूँ । माँ ने बेटे को जन्म दिया तो बाद में खिलाया, पढ़ाया, लाड़-प्यार देकर बड़ा किया। नाम-दान के समय मेरा काम ख़त्म नहीं हो गया। माँ को परवरिश करनी होती है। तो मैं इसलिए दौड़ता घूम रहा हूँ। रोज़ के 5-5 सत्संग दे रहा हूँ। इसलिए हमारी फ़िलासफ़ी है – सद्गुरु भक्ति । जो सत्लोक की बात कह रहे हैं, उनमें भी भ्रांतियाँ हैं । वो तो पढ़कर बोल रहे हैं। कोई कहे कि जम्मू शहर समुद्र के बीच टापू पर है तो जो जम्मू में रहने वाले हैं, उनको कैसा लगेगा ! ऐसे ही मैं जान जाता हूँ कि ये खुद नहीं गये हैं। मैं तो स्वर्ग जाना हो तो चला जाता हूँ, ब्रह्माण्ड में घूमता रहता हूँ । पर सच यह है कि मैं अपने से बाहर नहीं निकलना चाहता हूँ ।

तो दूसरा हमारा जो मत है, वो है भृंग - मता । यह क्या है ? भाई, बाकी जो जीव हैं, वो पेट में रखकर जन्म देते हैं बच्चे को । पर भृंगा यह नहीं कर रहा है । वो पल-भर में अपने समान कर रहा है । इस तरह हम भी आपको अपनी तरह करके चल रहे हैं। इसलिए जितने भी उदाहरण दिये, साहिब की वाणी से । बाकी की फ़िलासफ़ी में दोष है, धोखा है, छल है। धर्मदास जी भी पहले ठाकुरपूजा करते थे । साहिब से कहा कि एक ही परमात्मा हैं—ठाकुर जी । साहिब जी धर्मदास जी को बड़े तरीके से लाइन पर लाए, कहा—

तीन लोक जो काल सतावे । ताको सब जग ध्यान लगावे ॥

निराकार जेहि वेद बखानै । सोई काल कोइ मरम न जानै ॥

त्रिगुण जाल यह जग फँदाना । गहै न अविचल पुरुष पुरान॥

जाकर ई जग भक्ति कराई। अंतकाल जिव सो धरि खाई ॥

कहा कि सब काल की भक्ति कर रहे हैं । जिसको सारा संसार भगवान समझ कर पूजा कर रहा है, वही अंतकाल में जीवों को खा जाता है । उसी निरंजन के त्रिदेव पुत्र हैं ।

सबै जीव सतपुरुष के आहीं । यम दै धोखा फँदाइस ताहीं ॥

प्रथमहि भये असुर यमराई । बहुत कष्ट जीवन कहँ लाई ॥

दूसरि कला काल पुनि धारा । धरि अवतार असुर सँघारा ॥

प्रभुता देखि देखि कीन्ह विश्वासा | अंतकाल पुनि करै निरासा ॥

जीवन बहु विधि कीन्ह पुकारा । रक्षा करन बहु करै पुकारा ॥

कहा कि सभी परम-पुरुष की आत्माएँ हैं, पर निरंजन ने धोखे से उन्हें फँसाकर रखा । पहले तो वो खुद ही राक्षस बनता है, जीवों को सताता है, फिर खुद ही अवतार धारण कर राक्षसों को खा जाता है । जीव लीला देखकर सोचते हैं कि यही हमारा रक्षक है, पर अंतकाल में यही जीवों को निराश करता है। साहिब ने कोई भी बात फिज़ूल में नहीं कही । तर्क दिये हैं । कह रहे हैं—

गीता पाठ कै अर्थ बतलावा । पुनि पाछे बहु पाप लगावा ॥

द्वापर देखहु कृष्ण की रीती । धर्मनि परिखहु नीति अनीति ॥

अर्जुन कहँ तिन्ह दया दृढ़ावा । दया दृढ़ाय पुनि घात करावा ॥

बँधु घातकर दोष लगावा । पाण्डो कहँ बहु काल सतावा॥