करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहाँ से आया नाम साहिब (परम पुरुष) से बिछुड़ने के बाद आत्माएँ निरंजन की कैद में आ गयीं । अब निरंजन ने एक भी जीव को अमर लोक वापिस नहीं जाने दिया। बड़े बड़े ऋषि, मुनि, योगी, तपस्वी, सन्यासी आदि सब मन के इशारे पर नाचने लगे। निरंजन ने पाप और पुण्य में जीवों को बाँध दिया। नरक और स्वर्ग में अपने पाप और पुण्य का फल भोगकर जीव मृत्युलोक में चौरासी की यातना भोगने लगे। चौरासी की महाकष्टकारक यातना के बाद उन्हें मानव तन दिया गया, जो ज्ञानमय था, पर उसमें भी उन्हें अपार कष्ट दिया गया । मानव तन को मुक्ति की प्राप्ति के लिए मिला। पर जीव निरंजन तक ही पहुँच पाए, क्योंकि अमर लोक का ज्ञान देने वाला कोई न था । इस तरह एक भी जीव अमर लोक नहीं पहुँच पाया। निरंजन सब जीवों को तप्त शिला पर भून-भून कर खाने लगा, उन्हें कष्ट देने लगा। सब जीव त्राहि त्राहि कर उठे । उन्होंने पुकार की— कहा कि यदि कोई परमात्मा है तो हमें बचाओ, काल पुरुष का कष्ट हमसे सहा नहीं जा रहा है। जीवों की वो पुकार सातवें आकाश को चीरती हुई चौथे लोक में परम पुरुष के पास पहुँची । परम पुरुष जान गये कि जीव असहनीय कष्ट में हैं। तब उन्होंने कबीर साहिब को बुलाया, कहा कि जाओ, शून्य में निरंजन जीवों को बड़ा कष्ट दे रहा है, काल के दण्ड से जीवों को आजाद करके यहाँ ले आओ।
कर परनाम ज्ञानी चले, करन हंस के काज ।
जोपै काल न मानि हैं, तुम्हीं पुरुष को लाज ।।
ऐसे में साहिब हर युग में निरंजन के लोक में आते हैं और जीवों को काल के कष्ट से छुड़ाकर अमर - लोक ले जाते हैं। पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा—नहीं । परम- पुरुष ने पूछा- क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है । जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है । तब परम- पुरुष ने कहा कि