करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुनत मोह क्रोध तब कीन्हा । धनुष उठाय कर गहि लीन्हा ॥
ममता बाण तबहीं ताना । विचित्र बाण विवेक संधाना ॥
आलस शक्ति मोह उपजाई । चैतन शक्ति विवेक चलाई ॥
तब क्रोध करके मोह ममता रूपी बाण चलाता है । इधर विवेक विचित्र बाण चलाता है । मोह आलस्य शक्ति मारता है तो विवेक चेतन शक्ति मारता है। घोर युद्ध होता है ।
निद्रा शक्ति मोह संचारी । जाग्रत शक्ति विवेक तहँ मारी ॥
मोह फाँस माया बिस्तारी । विवेक विचार छिनक महँ टारी ॥
उपजायो तब मोह अँधेरा । हँसै विवेक यह बल तेरा ॥
प्रकाश बाण विवेक चलयऊ। ततक्षन अंधकार मिटि गयऊ ॥
सत्यबाण विवेक संचारा । असत खवास मोह कहँ मारा ॥
ज्ञान बाण विवेक जब छाड़ा। मूर्छित मोह महारथ पाड़ा॥
करि विवेक मोह तज दीढ़ी । विचल्यो मोह हृदय गौ पीढ़ी ॥
विच्लयो मोह दशहू दिशि गयऊ। सुपंथ सकल द्वन्द मिटि गयऊ ॥
अब मोह निद्रा शक्ति का संचार करता है, पर विवेक जाग्रत शक्ति चलाकर उसे निष्फल कर देता है । मोह माया जाल का विस्तार करता है जबकि विवेक विचार करके उससे बाहर निकल आता है । अब मोह अंधकार फैला देता है। यह देख विवेक हँसता है, कहता है कि यही तुम्हारी शक्ति है । फिर विवेक प्रकाश बाण चलाकर उसी अँधकार का नाश कर देता है । इसके बाद विवेक सत्य का बाण चलाकर मोह के सेवक असत्य को मार गिराता है । अब विवेक ज्ञान का बाण छोड़ता है, जिससे मोह भी मूर्छित हो जाता है।
कहै कबीर विवेक दल, अटल ज्ञान दल गाज ।
अब तो निर्मल हो गये, गये मोह दल भाज ॥
तो इस तरह नाम के बाद ये शत्रु कमज़ोर पड़ जाते हैं । रहते तो हैं, पर अपना काम नहीं कर पाते हैं, मूर्छित रहते हैं । साहिब तो कह रहे हैं-
सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान ।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान ॥
अब देखते हैं कि जिस नाम की इतनी महिमा है, वो नाम आया कहाँ से । सुनें ।