भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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देख्यो गर्व मोह सकाना। करी क्रोध बाण संधाना ॥

बहु बड़ाई सो बोलन लाग्यो । ज्ञान विवेक कहाँ अब भाग्यो॥

आवे सन्मुख मोसे सब काहू । सुनत वचन नोह उत्साहू॥

बेसुध बाण गर्व तब धारा। उतते चैतन बाण सम्भारा॥

बल करि गर्व उठे समुदाई । तबहिं खवास गयो ठहराई॥

उग्रज्ञान राजा पहँ गयऊ। गर्व गँवार दृढ़ अति भयऊ॥

राजा मोकहँ आयुस देहू | कौन बाण ते

मारौ एहू ॥

गर्व का ज्ञान के साथ युद्ध होता है। उधर गर्व बेसुध करने वाले बा चलाता है तो इधर ज्ञान चेतना के बाण चलाता है, पर जब गर्व का नाश नहीं हो पाता तो वो विवेक राजा के पास जाता है और पूछता है कि गर्व को किस बाण से मारूँ ?

दीन तब बाण राजा कर लयऊ। हित कै उग्र ज्ञान कहि दयऊ ॥

मार्यो ज्ञान दीन तेहि बाना । हार्यो गर्व लाग्यो विरहाना ॥

तब राजा उसे दीनता का बाण देता है, जिसके लगते ही गर्व बिरह से व्याकुल हो उठता है। मोह अब पछताता है कि मेरी तो ख़ैर नहीं है।

गर्व मुये विकल होई, चले आप रणमाहिं ।

मनहिं मन पछतावई, मोर कुशल अब नाहिं ॥

अब मोह राजा खुद सामने आता है।

सुन्यो मोह चल्यो गलगाज । जीतन विवेक चला दल साजी ॥

पहुँची रण अस बोलै मोहा। कहाँ विवेक आऊ मम सोहा ॥

महा मोह राय मम नामा। सहो ज्ञान मोरो संग्रामा ॥

सबै उराव गयो हराय । अब नहिं होई तोर कुशलाई ॥

मैं बाण चलाओं जबहीं । क्षणमहँ होहु नाश तुम तबहीं ॥

मोह ललकारता है, विवेक और ज्ञान को कहता है कि मेरे सब सरदारों को तुमने हरा दिया है, अब तुम्हारी कुशल नहीं है, मैं अब तुम्हारा नाश कर दूँगा।

कहै विवेक बड़का हाको। करो लड़ाई नाशहि ताको॥

विवेक कहता है कि बातें करना बंद करो और लड़ाई करो, नाश तुम्हारा ही होना है।

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