भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अब संतोष और लोभ का घमासान युद्ध होता है। लोभ हृदय में चिंता शक्ति छोड़ता है कि पैसे के बिना कुछ नहीं होगा, पर संतोष ज्ञान की शक्ति द्वारा उसका वार निष्फल कर देता है। लोभ पैसे का, सोने का, हीरे का लालच देता है, पर संतोष कहता है कि कुछ चाहिए ही नहीं, क्योंकि बड़े - बड़े राजा भी इसे यहीं छोड़ गये, कुछ भी साथ नहीं जाने वाला है और फिर जीवन की अवधि भी थोड़ी ही है। इस तरह हृदय में उदासी जगाकर लोभ को पराजित कर देता है संतोष । मोह खींझ उठता है...... अब तो राज गया । काम क्रोध विचले, विचले लोभ अकाज । महामोह मनमहँ झखे, गयो हमारो

राज ॥

काम, क्रोध और लोभ के हार जाने पर मोह मन ही मन खींझता है, भयभीत होता है कि अब तो राज्य गया।

मोह बुलाय गर्व सन कहेऊ । विचलो सबै एक तुम रहेऊ ॥

अब मेरो तुम करो सहाऊ । मोरे संग गर्व उठि धाऊ ॥

ज्ञान विवेक को मारि भगावें । जप तप साधन मारि सब लावें ॥

बोले गर्व मोह ते तबहीं। का विसात विवेक की अहहीं ॥

मेरो हंकार फिरे जेहि देशा। रहै न ज्ञान विचार को लेशा॥

बाकी सैन रहे सब जोही । लीन्ह बुलाय मोह तब ओही ॥

लीन्ह सजाय सैन बहु रंगी। मोह गर्व चढ़े एक संगी॥

मोह दल जब पहुँचे रणमाहीं । खबर भयो विवेक पहँ ताहीं ॥

सज्यो सेन तब बहु समुदाई । होय निशंक चले रण भाई ॥

उतते मोह रण रंग मचावा । इत विवेक राजा चढ़ि आवा॥

मोह तब अहंकार को बुलाकर कहता है कि अब तो एक तुम ही मेरे सहारे रह गये हो, जो ज्ञान और विवेक को मारकर मेरे देश से भगा सकते हो। आओ, हम दोनों मिलकर विवेक को अपने देश से निकाल दें। तब अहंकार कहता है कि तुम चिंता मत करो, मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ ज्ञान और विचार थोड़ा भी नहीं रह पाता है । तब मोह सारी सेना को सजाता है और स्वयं गर्व के साथ विराजमान होकर युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। उधर विवेक को जब ख़बर मिलती है कि मोह राजा अहंकार को साथ लेकर पूरी सेना सहित आ रहा है तो वो भी अपनी सेना को तैयार कर रण में पहुँच जाता है ।