भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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चिन्ता शक्ति पाप को मूला । कोउ न जानै मम डर भूला ॥

आशा तृष्णा तहाँ अति बहै । सुनत ज्ञान तहाँ नहिं रहै ॥

नहिं जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा॥

छाड़हु ज्ञान हमारो ठाऊँ । नहिं तो तोहि धरि धरि खाऊँ ॥

लोभ जानकर ज्ञान से कहता है कि हमारा देश छोड़ दो, तुम नहीं जानते हो कि मेरा नाम लोभ है, मैं बड़ा प्रचण्ड हूँ, मेरे होते ज्ञान नहीं रह सकता है। यदि तुमने हमारा देश नहीं छोड़ा तो मैं तुम्हें खा जाऊँगा । तब ज्ञान पुनः विवेक के पास आता है और कहता है—

राजा मंत्र करो ठहराई । लोभ न मोपै जीतो जायी ॥

जो तुम लोभ जीतो आजू । तो तुम करो निकंटक राजू ॥

ज्ञान कहता है कि लोभ मुझसे नहीं जीता जाता । यदि तुम आज उसे जीत लो तो फर निर्विघ्न राज्य करना । तब मंत्री कहता है कि लोभ तो संतोष से जीता जा सकता है। अब राजा संतोष को बुलाता है और उसे समझाकर ज्ञान, भक्ति आदि के साथ रण में भेजता है।

इत भौ लोभ उत भौ संतोषा । मनसा भूमि उठयो रन रोषा ॥

लालच बाण लोभ संचारा । क्षमा बाण संतोष तेहि मारा ॥

लोभ चलावै धनुष कहँ खींची। संतोष लीन्ह सुमिरन की ऐंची ॥

चिंता शक्ति लोभ पठायी। ज्ञान शक्ति सो निष्फल जायी॥

अति दुख फाँसी लोभ कर लयऊ। उग्र ज्ञान संतोष मिटैऊ॥

परम संताप लोभ कर लयऊ । सो दया खड्ग ते निष्फल गयऊ ॥

अचेत शक्ति लोभ चलाई। जागृत शक्ति संतोष पठाई ॥

लोभ कहै पैसा तुम लहिये । संतोष कहै कुछ नहिं चाहिए ॥

लोभ कहै नीका है रूपा । संतोष कहै छाड़ि गये

भूपा ॥

लोभ कहै लेव कंचन मोरा । संतोष कहै जीवन है

थोरा ॥

लोभ कहै घोड़ा जोड़ा नीका। संतोष कहै कारज नहिं जीका ॥

लोभ कहै हीरा ल्यो लालू । संतोष कहै संग नहिं चालू ॥

साँच धनुष कर गहि धयऊ। चपल लोभ चापि दल गयऊ॥

उदासी शक्ति उरमें उपजायी । कंप्यो लोभ ज्यों विष खायी ॥

धीरज खड्ग गह्यो संतोषा । विचल्यो लोभ मिट्यो सब धोखा ॥