भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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भलो भलो सब कोई कहै, रहि गइ क्षमा दुहाई । कहैं कबीर शीतल भये, गयी सो अनि बुझाई || क्षमा से ही क्रोध की आग बुझाई जा सकती है। जब भी क्रोध आता है तो आदमी का दिल करता है कि बस मारूँ, यूँ । गाली बकता है वो। इसलिए साहिब कह रहे हैं-

गाली आवत एक है, उलटत होत अनेक ।

कहैं कबीर न पलटिये, रहे एक की एक ॥

काम, क्रोध दोनों की पराजय देख मोह राजा अब लोभ को बुलाता है और समझाकर रण में भेजता है।

हार्यो क्रोध काम जब जाना । महामोह राजा डर माना ॥

चकित मोह मंत्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥

लोभ मंत्री आय भये ठाढ़ा। देखत राव छोभ अति बाढ़ा ॥

तब लोभ मोहहि माथ नवाई | कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥

हौं निज सर्व पाप का मूला । मोरे ते तुम रहत हौ फूला ॥

जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुड़ाई ॥

तो कहँ फिर मैं देहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥

काम और क्रोध के रण में हार जाने से मोह राजा भयभीत हो जाता है। वो अपने मंत्री लोभ को बुलाता है। मंत्री आकर राजा को धैर्य बँधाता है, कहता है कि जब तक मैं हूँ, तब तक ज्ञान नहीं टिक सकता है । मैं सारे पापों की जड़ हूँ, मैं विवेक और ज्ञान को जीतकर अपना देश उनसे छुड़ा लूँगा। फिर आप निष्कंटक राज्य करना ।

यह सुन हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभ को आयसु दयऊ॥

लोभ की बातें सुनकर राजा खुश हो जाता है और उसे आशीर्वाद देकर रण में भेजता है । लोभ आकर ज्ञान से कहता है-

जाई रण दियो लोभ हंकारा । ज्ञान तुम का करहु तकरारा ॥

हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोड़ हु ज्ञान हमारो देशा ॥

तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाऊँ । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाऊँ ॥

अब मैं रनमहँ अग्नि परजारौं । करि बल एक एक कै मारौ ॥