करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह लो गुप्त वस्तु (नाम) । जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा। तब परम-पुरुष को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से साहिब शून्य में निरंजन के लोक की ओर आए। जब साहिब आने लगे तो निरंजन झांझरी दीप साहिब के सम्मुख आया, बोला- यहाँ क्यों आए हो ? वापिस जाओ । यहाँ पर निरंजन और साहिब के मध्य बड़ी गोष्ठी हुई। साहिब ने कहा— तासो को सुनो धर्मराई । जीव काज संसार सिधाई || तप्त शिला पर जीव जरावहु । जारि वारि निज स्वाद करावहु ||
तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ।।
जीव चिताय लोक लै जाऊँ । काल कष्ट से जीव बचाऊँ ।।
कहा कि हे निरंजन, तुमने बहुत छल, बल से जीवों को बाँधा हुआ है। तप्त शिला पर उन्हें अनेक कष्ट देकर आनन्द लूट रहे हो । परम पुरुष ने मुझे यहाँ भेजा है, मैं जीवों को यहाँ से छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊँगा।
तबै निरंजन बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ।।
तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ।।
निरंजन ने कहा कि मैंने सबको उलझाया हुआ है। 360 ऐसे स्थान हैं, जहाँ निरंजन ने थोड़ी-थोड़ी शक्तियाँ रखी हुई हैं। उन्हीं को देख जीव उलझा हुआ है। निरंजन ने कहा कि कैसे छुड़ाओगे हंसों को ?
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ।।
पुरुष नाम को कहूँ समझाई। जम राजा तब छोड़ि पराई ।।
घाट घाट बैठे उरझेरा। हमरे शब्द ते होय निबेरा ।।
सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द संग हंसा घर जाई ||
साहिब ने कहा कि मेरे पास नाम है, जिसके सहारे हंस अमर लोक पहुँच जायेगा। अब तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे । तब निरंजन ने कहा-
का ज्ञानी देहो अधिकारा। हमरो नाहिं छूटे जम जारा ।।
पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ।।
तामें पाप पुण्य का वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ।।