करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंजहाँ तहाँ जग भरमावै । ज्ञान संधि कुछ रहन न पावै ।।
एक शब्द की केतिक आशा । मेरे हैं चौरासी फाँसा ।।
कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर नहीं ले जा सकते हो। मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप पुण्य में जीवों को बाँध दिया है। फिर मन रूप में खुद भी अन्दर समाया हुआ हूँ। किसी को सोचने भी नहीं दे रहा हूँ कि क्या मामला है। तुम्हारा एक शब्द क्या करेगा, मैंने 84 लाख फाँसें बनाई हुई हैं, एक में से निकाल दूसरी में फेंक देता हूँ । बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटे चौरासी की धारी ।
छूटै पाँच पचीस गुण तीनों । ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हो ।।
साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा जबरदस्त नाम है, जिस घट में दे दूँगा, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, वो आजाद हो जायेगा । निरंजन ने कहा-
हे ज्ञानी का करो बढ़ाई। हमते नाहिं छूट जीव जाई ।।
इतने युग भये तुम देखा । ज्ञानी हंस न एको पेखा।।
का तुम करो का शब्द तुमारा । तीन लोक परलय कर डारा ।।
साधु संत हम देखी रीति । परलय परे सकल जगग जीति । ।
करम रेख बाँधै सब साधा। सुन नर मुनि सकलो जग बाँधा ।।
कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी हंस सतलोक पहुँचा। मैंने इतनी ताक़त से जीवों को बाँधा हुआ है कि छूट नहीं सकते हैं। तुम और तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा । मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ । निरंजन ने कई बार सृष्टि का प्रलय भी किया है । जलेबी बना देता है दुनिया की । ये सब काम साहिब के नहीं हैं। तो निरंजने ने कहा कि इतने पर भी कर्मों में जीव को बाँधा हुआ हूँ। आम आदमी की क्या बात है, देवता, मुनि आदि सबको बाँधा हुआ है। एक भी हंस को जाने नहीं दूँगा ।
ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ।।
हंस हमारा शब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ।।
नाम जपै अरु सुरति लगाई । मिले कर्म लागे नहीं काई ।।
शब्द मानि होय शब्द सरूपा । निश्चय हंसा होय अनूपा । ।