भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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यह निगुर्ण पाँच मुद्राओं से इर्द-गिर्द घूम रही है । ये पंच मुद्राएँ ही निर्गुण भक्ति है । कोई भी मत मतान्तर इनसे परे नहीं है । अगर हम निगाह डालें तो पता चलता है कि लोगों को आज इस मुद्राओं का ज्ञान भी नहीं है। कई लोग आते हैं, मैं पूछता हूँ कि अगर आप अंदर में गये, प्रकाश आदि देखा, सिद्धियाँ प्राप्त कीं तो कृपा करके बताओ कि कैसे गये ? संयोग से गये या किसी सूत्र से गये । सांख्य योग में आता है कि सूत्र हैं। यूरोप की फलॉइट ली तो यूरोप पहुँचेंगे, ऐसे ही जिस मुद्रा से ध्यान करेंगे तो वहीं जायेंगे। पर अफ़सोस है कि वर्तमान के इन मुद्राओं के ज्ञाता भी बहुत कम हैं। जब पूछता हूँ तो भूचरी आदि का ज्ञान नहीं होता है । कालांतर में छ: महायोगेश्वर हुए, उसके पास इन मुद्राओं का ज्ञान था । साहिब ने इनके ऊपर कहा है । निर्गुण का लक्ष्य है योग, कमाई, साधना । जो कुछ मिलना है, उसका आधार है कमाई, योग, गुरु की जरूरत है, पर वो गौण है। संतत्व की धारा गुरु की बात कर रही है । मैंने नाना मत-मतान्तरों से जानकारी ली तो वास्तव में जानकारी नहीं थी । केवल अंदर में है, कहने से कुछ नहीं होगा। भारत के 16 बड़े पंथों से कोई विरोध नहीं है, पर कहना चाहता हूँ कि उनकी साधना केवल पंच मुद्राओं तक है और वो भी सही जानकारी नहीं है, केवल किताबी ज्ञान तक ही है । एक तो बाहरी योग है, एक पीटी उस्ताद भी स्कूलों में बताता है, पर दूसरा योग है - सूक्ष्म योग, जिससे आन्तरिक कोशिकाओं को जगाना होता है। योग कहते हैं जोड़ को, योग कहते हैं संधि को । बाहरी योग से अंदर में नहीं जा सकते हैं। देखते हैं कि किन-किन मुद्राओं द्वारा अंदर जाया जा सकता है। यह सबके लिए है या कठिन है। विभिन्न पंथों से जुड़े लोग हैं, अंदर से नहीं जुड़े हैं, नहीं जाते हैं, पर संतुष्ट हैं। आवश्यकता है कि निर्गुण वाले भी भक्ति को ठीक से समझें। फिर यह भी समझ लें कि इससे महानिर्वाण की प्राप्ति नहीं हो पायेगी, सदा के लिए जन्म-मरण का बंधन नहीं छूट पायेगा । लेकिन साहिब तथा संतों ने जिस भक्ति की बात की है, उन्होंने दावे के साथ कहा है कि उससे जन्मने और मरने का क्रम सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। क्योंकि उस सत्य - भक्ति से आत्मा अपने सही स्वरूप को प्राप्त कर उस अमर-देश में पहुँच जाएगी, जहाँ से फिर कभी लौटना न होगा।