भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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हम संतों की बात को ठीक से समझ नहीं रहे हैं और सोच रहे हैं कि सब भक्तियाँ एक-समान ही हैं। नहीं, यह एक ही बात नहीं है। बहुत से लोग स्वर्ग में जाना चाहते हैं, लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि कितने दिन रहोगे स्वर्ग में, तो कुछ कहते नहीं पता। साफ़-साफ़ तो कह रहे हैं हमारे धर्म - शास्त्र कि अपने कर्मों का फल भोगने के लिए स्वर्ग में जाएगा और कर्मों के क्षीण होने पर पुनः मृत्यु-लोक में आएगा । बहुत दूर भी नहीं जा पाएगा, इसी ब्रह्माण्ड के अन्दर ही घूमता रहेगा और छुट्टी भी नहीं मिलेगी। क्या इसीलिए मिला था— मानव-तन। कहते हैं कि कई देवता भी मृत्यु - लोक में गुरु की तलाश करते हैं। वे भी मानव - तन पाने की इच्छा करते हैं । फिर हम हैं कि मानव-तन पाकर पुन: वहाँ जाना चाहते हैं T सगुण-निर्गुण में उलझ जाने से हम सच्ची मुक्ति की ओर नहीं जा पा रहे हैं । वास्तव में सगुण-निर्गुण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, पर निर्गुण भक्ति करने वाले इस बात को ठीक से समझ नहीं पाते हैं। एक बार एक निर्गुण-भक्त से बात हुई। उससे पूछा कि सगुण और निर्गुण में क्या अन्तर है ? उसने कहा कि सगुण भक्ति पाँच तत्वों की होती है और ये पाँचों तत्व नाशवान् हैं जबकि निर्गुण भक्ति इससे परे है। मैंने कहा कि कृप्या मुझे वे पाँचों तत्व गिनाकर तो बताओ, जो नाशवान् हैं। उसने गिनाना शुरू किया। निर्गुण भक्त : जल मैं : दूसरा निर्गुण भक्त : आग मैं : ठीक है, तीसरा निर्गुण भक्त : वायु मैं : अब चौथा निर्गुण भक्त : : पृथ्वी अच्छा, तो अब पाँचवाँ तत्व क्या है ? निर्गुण भक्त : ( दोनों हाथों को एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर रखकर बी में शून्य स्थान पर इशारा करते हुए) यह मैं : यह क्या है ? निर्गुण भक्त : आकाश मैं : यह आकाश क्या है, समझाओ निर्गुण भक्त : शून्य