करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब लै पीठ नपाय तेहि दीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥
यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्ति हरि हमको दीन्हा ॥
बलि की क्या ग़लती थी ! साहिब तर्क से समझा रहे हैं, मुक्ति के विषय में सोचने को कह रहे हैं। आख़िर हम सब कौन सी मुक्त चाह रहे हैं, यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बाकी उनकी किसी से दुश्मनी नहीं थी । तो कहा कि पहले छोटा रूप धारण कर बलि से साढ़े तीन पग धरती माँग ली, फिर बाद में अपना रूप बड़ा करके तीन-लोक तीन पग में नाप लिये और आधा पाँव रह गया । आधा पाँव बलि राजा दान नहीं दे सका तो उसके परिणाम स्वरूप उसे पाताल भेज दिया गया। साहिब कह रहे हैं कि यह अंधा मनुष्य समझता नहीं है। स्पष्ट देखकर भी समझता नहीं है। यह सब होने के बाद कहता है कि हरि ने मुक्ति दी । पाताल में भेज दिया गया। क्या यह थी मुक्ति ? लोग तो साहिब की वाणी को तोड़ मरोड़ कर कह रहे हैं- तू राम सुमर पछतायेगा। हम कह रहे हैं— तू नाम सुमर पछतायेगा । हम आपको शुद्ध चीज़ दे रहे हैं । हम घी खिला रहे हैं और वो भी शुद्ध दे रहे हैं, बिना लस्सी वाला दे रहे हैं। बाकी से अलग भक्ति दे रहे हैं। बाकी काल की भक्ति दे रहे हैं, हम परम-पुरुष की भक्ति दे रहे हैं । बाकी जितने भी पंथ हैं, सत्य मानना, सब काल - पुरुष की भक्ति कर रहे हैं । कुछ हमारी तरह बातें बोल रहे हैं। सच खंड, अमर लोक, सत्पुरुष की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में भक्ति वो भी काल - निरंजन की ही कर रहे हैं । क्योंकि वाणियों में वो बातें लिखी हैं, इसलिए वो पढ़कर बोल रहे हैं। लेकिन उनके पास अपना कुछ नहीं है । अन्दर से वो खालमखाली हैं। हम बाकी पंथों मुख्य पाँच कारणों से अलग हैं। ये कारण हैं कि हम- तीन लोक से परे एक चौथे लोक ( अमर लोक ) की बात कर रहे हैं ।
तीन लोक से भिन्न पसारा | अमर लोक सतगुरु का न्यारा ।।
तीन लोक प्रलय कराई । चौथा लोक अमर है भाई ।।