करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंआकाश का रंग काला है और स्वाद है - फीका | ....तो मैंने उसे समझाया कि जब पाँचवाँ तत्व आकाश है तो निर्गुण भी तो पाँच तत्वों में आ गया, वो भी तो नाशवान् हो गया । कुछ भक्त लोग सगुण - भक्ति से ऊपर उठ जाते हैं, पर वे निर्गुण भक्ति में अटक जाते हैं । वे समझते हैं कि निर्गुण-भक्ति से उनकी आत्मा का कल्याण हो जाएगा, मुक्ति मिल जाएगी । इसलिए कबीर साहिब ने सब भक्तियों की पहुँच बताई है, सबको सावधान किया है और सत्य भक्ति को इनसे परे बताया है।
सगुण भक्ति करे संसारा । निर्गुण योगेश्वर अनुसारा ।।
इन दोनों के पार बताया । मेरो चित एको नहीं आया।।
दूसरी भक्ति है निर्गुण । धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं कि है साहिब! सारा संसार सगुण भक्ति कर रहा है और योगी लोग निर्गुण भक्ति कर रहे हैं, पर आप दोनों से परे बता रहे हैं, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। कालांतर में जितने भी भक्त हुए, सगुण - निर्गुण का संदेश दिया। आखिर आपकी भक्ति किस चीज़ का संदेश है ! दादू जी ने भी कहा – 'कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय । अटपट चाल कबीर की, मोसे कही न जाय ।।' दरअसल लोग आज योग और अध्यात्म को एक चीज़ मान रहे हैं। योग में शरीर की अत्यन्त सूक्ष्म कोशिकाओं को जगाने का नियम है और यह पंच मुद्राओं पर आश्रित है। इसके लिए ब्रह्मचर्य की जरूरत पड़ती है। सगुण में बाहरी भक्ति है । 33 कोटि देवताओं की भक्ति है । हम इसका भी खंडन नहीं कर रहे। ये प्रीपेयर करती हैं भक्ति के लिए । नर्सरी में भेज रहे हैं तो अगली क्लास में जाने के लिए तैयार कर रहे हैं । इस तरह जब तक कोई आधार न मिला तो कोई उपासना करता रहे। दूसरी निर्गुण भक्ति है । यह उससे ऊँची है। यह अन्तरगम्य में ले जाती है । इसलिए निर्गुण उपासक पंच मुद्राओं पर एकाग्र होते हैं । ये धाराएँ हैं भक्ति की। हमारे हिंदू धर्म में है। हम सगुण उपासकों की निंदा नहीं कर रहे । पर वो भी तो ठीक से करो । वहाँ भी पाप वर्जित है । किसी नियम का पालन नहीं कर रहे तो यह ठीक नहीं है। इस तरह निर्गुण भक्ति हमारी सहायक है । जो उन्हें छोड़कर हमारे पास आता है तो मामला आसान हो जाता है |