करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबात कर रहे हैं। वो कामयाब नहीं होंगे। उसके लिए धीरता की जरूरत पड़ती है । साहिब तो कह रहे हैं-
यहाँ भोग तहाँ योग विनाशा ।।
... पर इस मुद्रा से आत्म ज्ञान नहीं मिलेगा। आदमी के शरीर में काफ़ी ताक़तें भरी पड़ी हैं। इसे नारायणी चोला कहा जाता है । इसमें सब कुछ है। जब तीसरे तिल की कोशिकाएँ जागती हैं तो बड़े आलोकिक रहस्य दिखाती हैं । हम चिकित्सा विज्ञान के युग में जी रहे हैं । रोम-रोम की डॉक्टरों ने ख़बर ली है, पर वैज्ञानिक मानव तन की कोशिकाओं का पूरा रहस्य नहीं जान पाए। कोशिश कर रहे हैं, पर गहराई में नहीं जान पाए अभी । तो कह रहे हैं कि चाचरी मुद्रा में बड़ी अनुभूतियाँ होती हैं । चाबी ताले को खोलती है। ऐसे ही ध्यान कोशिकाओं को खोलता है । साधक को तब ज्ञान हो जाता है । जब कोशिकाएँ खुलती हैं तो बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, बड़े ब्रह्माण्ड दिखते हैं, अलख ब्रह्म दिखता है । तभी योगी अलख ब्रह्म की बात कर रहे हैं। वो प्रकाश इतना है कि इसे ही परमात्मा माना गया।
शब्द ओंकार भूचरी मुद्रा, त्रिकुटी है अस्थाना ।
व्यासदेव ताको पहिचाना, चाँद सूर्य सो जाना ।।
व्यास जी ध्यान करते थे - आज्ञा चक्र में । यहाँ ध्यान रोकने से यहाँ की नाड़ियाँ खुलती हैं। 'कर नैनों दीदार महल में प्यारा है ।' जब यहाँ पर पूरा ध्यान एकाग्र होता है तो बड़े नज़ारे दिखते हैं । जब कोई समस्या आती है तो ध्यान यहीं पर रोक कर आप बैठ जाते हैं । यानी कहीं यहाँ पर समस्या का हल है । इनको ओपन करता है— ध्यान । ध्यान मास्टर की है, इसलिए –' ध्यान ही वेद शास्त्र कहत हैं, ध्यान ही वेद बखाना । ' आज भी हमारे देश में बहुत लोग यहाँ ध्यान रोक रहे हैं । ये तो कोशिकाएँ खुलीं। इन्हें जगाया गया, पर आत्मा नहीं जगी। साहिब की गोरख से गोष्ठी हुई तो साहिब ने कहा कि योग तो करो, पर जब इड़ा - पिंगला, सुषुम्ना सब नष्ट हो जायेंगी तब कहाँ ध्यान रोकोगे! ‘इड़ा विनशे, पिंगला विनशे, विनशे सुषम्न नाड़ी । कहें कबीर सुनो हो गोरख, कहाँ लगाइहों ताड़ी ।।' इसका मतलब है कि इन नाड़ियों का नाश हो जाता है । कहा- हे नाथ जी ! तब कहाँ जायेंगे !