भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 264 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 123

शास्त्रों का अध्ययन कर । निर्गुण में जाना है तो पंच मुद्राओं में से कोई कर । योगी कहते हैं कि योग करो। शुकदेव जी सन्यासी थे, ब्रह्मचारी थे। गोरखनाथ ने शादी नहीं की। दत्तात्रेय आदि ने शादी नहीं की, ब्रह्मचारी थे । दुनिया तो खिचड़ी भक्ति कर रही है । बिन जाने जो भक्ति करई । सो नहीं भवसागर से तरई । एक शब्द मैंने कई बार दोहराया है—

प्रथम पूरन पुरुष पुरातन, पाँच शब्द उच्चारा ।

सोहं, सत्, ज्योति निरंजन कहिये, ररंकार, ओंकारा ।।

शब्द ही सगुण, शब्द ही निरं गुण, शब्द ही वेद बखाना ।

शब्द ही पुनि काया के भीतर कर बैठा अस्थाना ।।

,

जो जाकी उपासना कीना, उसका कहूँ ठिकाना ।।

साहिब कह रहे हैं कि सर्वप्रथम उस सर्वशक्तिमान ने पाँच शब्द पुकारे—सोहं, सत्, ज्योति - निरंजन, ररंकार, ओंकार । ये पाँच शब्द परमात्मा ने पुकारे। कहने का भाव है कि इन शब्दों को पुकारने वाला परमात्मा था, इनमें से कोई शब्द नहीं । इसलिए जो शब्द को परमात्मा कहते हैं, वो इस निरंजन की ही भक्ति करते हैं, सच्चे साहिब की नहीं । सगुण-निर्गुण दोनों भक्तियाँ इन शब्दों पर आश्रित हैं । शब्द ही काया में स्थान करके बैठा है । कह रहे हैं कि जो जिसकी भक्ति किया, जहाँ तक पहुँचा, उसका ठिकाना कहता हूँ । सगुण तो 33 करोड़ देवताओं तक है। इसकी महापुरुषों ने निंदा नहीं की, पर कहा कि इससे दो मुक्तियों की प्राप्ति होगी, आत्म साक्षाकार नहीं है । स्वर्ग आदि लोकों में आत्म ज्ञान नहीं है । तो I आओ, देखते हैं कि पंच मुद्राओं द्वारा हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत की, क्या हासिल किया, क्या सूत्र हमारे लिए छोड़ गये ! साहिब इस चीज़ों को नकार नहीं रहे हैं, पर कह रहे हैं कि यह अध्यात्म नहीं है, योग है ।

ज्योति निरंजन चाचरी मुद्रा, सो है नैनन माहिं ।

तेहि को जाना गोरख योगी, महा तेज है ताही ।।

कुछ आज भी ये मुद्राएँ कर रहे हैं । गोरख जी चाचरी मुद्रा से ध्यान करते थे। गोरखनाथ जी ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे । इनकी दिशा देने वाले ब्रह्मचारी हुए। पर आज गृहस्थ में योग की