भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

प्रलय हो गयी, तबका ब्रह्मचारी घूम रहा हूँ । पलटू साहिब भी कह रहे हैं. 'कोटि प्रलय हो गयी, हम न मरण हारा ।' मौत क्या है ! यह चार अवस्थाओं का खेल है— सुषुप्ति, स्वप्न, जाग्रत, तुरीया । हम इन चार में घूमते रहते हैं । सुषुप्ति अत्यंत कुंद अवस्था है । जब भी वहाँ पहुँच जाता है इंसान तो उसकी चेतना कुंद हो जाती है । आपको इन अवस्थाओं में इसलिए भुलाया गया कि आप पिछले जन्मों की सुधि न पा सकें, यह जान न सकें कि क्या थे । सुषुप्ति में आदमी की चेतना जाग्रत से 1000 गुणा कम होती है । इसलिए याददाशत आत्मा नहीं है, मन की अवस्था है। कभी सुषुप्ति में पहुँच जाते हैं । इसे गहरी निद्रा भी कहते हैं । फिर जब उठते हैं तो जानने की कौशिश करते हैं कि कहाँ हूँ ! थोड़ी देर में जब चेतना आज्ञाचक्र में आती है तो मालूम पड़ता है कि यहाँ हूँ । जब आपकी चेतना आज्ञाचक्र में होती है तो आप होश में होते हैं । कभी ऐसे भी किसी को कह देते हैं कि क्या बात है, होश में आओ। वो मानो सोकर उठा है । अब उठकर होश में कैसे आना है ! वो फौरन अपनी सुरति उठाकर आँखों में लाता है । यह है होश में आना । मन आपको सुषुप्ति, स्वप्न आदि में काफी देर घुमाकर बेहोश रखना चाहता है। मृत्यु के समय भी ऐसी अवस्था में ला दिया जाता है । कुछ को पूर्व जन्म याद होता है, क्योंकि सुषुप्ति में भी विस्मृति नहीं हुई। वे चेतन रहे । इसलिए पूर्वजन्म की सुध रहती है । अब जाग्रत में आप देखते हैं, पर सुषुप्ति कुंद थी । जब स्वप्न में जाते हैं तो भी निराली अवस्था होती है । जाग्रत में बैठे हैं तो छल है, दिल दिमाग़ एक नहीं है, पर स्वप्न अवस्था इस दृष्टि से बड़ी ही यथार्थ है, आदमी का दिल दिमाग़ एक होता है । जाग्रत में तो छल है, बनावट है। आप किसी के लिए कह देते हैं कि अच्छा है, पर दिल से नहीं कहते हैं । जाग्रत में हम जो-2 देख रहे हैं, सब सच्चा लग रहा है । यह खेल है अवस्था का। चौथी अवस्था तुरीया स्वाभाविक नहीं है । देवता लोग इसमें रहते हैं । योगी चौथी अवस्था में रहते हैं । वो अच्छे बिन्दु पर हैं। पर यहाँ भी मन रहता है । इसके बाद तुरीयातीत है । पर योगियों ने तुरीया तक की अवस्था प्राप्त की। वो भी कम नहीं है । उसमें 1000 गुणा ज्यादा ज्ञान होता है । इसी पर पहुँचकर वो कहता है कि 'अहं ब्रह्मस्मि ।' पाँचवीं है तुरीयातीत । कहने

में तो लोग कहते हैं कि महाप्रज्ञा अवस्था में हैं, पर यह आसान नहीं है । इसमें मन पर कण्ट्रोल होता है बड़ा, पर पूरा नहीं होता है । कुछ अंग कण्ट्रोल में आ जाते हैं । चेतना की बड़ी अवस्थाएँ देख सकते हैं । महायोगेश्वर इसमें पहुँच जाते हैं । मन माया में होता है, पर वो बहुत कण्ट्रोल में होता है । जैसे आदमी कॉमा में पहुँच जाता है तो रक्त तो चलता है, पर बंदा क्रिया नहीं कर पाता है । इस तरह मन उसमें होता है, जीवित हो सकता है फिर । आनन्द आत्मा में है । कहाँ से आता है ! इसमें है ही है स्वतः । मन के आवरण से नहीं मिल रहा है। जिन-2 पदार्थों में आनन्द देख रहे हैं, केवल आत्मा का है । और किसी पदार्थ में नहीं है । आपकी धुन जहाँ लगी, वहीं आनन्द है । आनन्द की अनुभूति मन वहाँ से करवाता है । माँ में सुरति लगती है तो बच्चे को वहीं से आनन्द मिलने लगता है। जब बड़ा होता है तो मन - माया उसकी धुन खेल में लगाते हैं । पहले माँ को छोड़ना नहीं चाहता था, पर अब ज़रूरत के समय ही जा रहा है माँ के पास.....खेलने में लग गया। धुन वहाँ लगी है। बालक का ध्यान खेल में रहता है। मज़ा रहता है । मज़ा उसमें नहीं था । वास्तव में मज़ा आत्मा में था। पूरे जीवन माया घुमाती है । यह दुनिया असार है, नीरस है, इसमें कोई आनन्द नहीं है । 'हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ।' जिसमें भी धुन लगी, आनन्द लगा। धुन खुद आनन्दमय है । इसी धुन को कहीं न लगाकर अपने में रमा लो तो आनन्द ही आनन्द है । ..... तो बालक की पढ़ाई में धुन लग जाती है। 12-12 बजे तक पढ़ रहे होते हैं बच्चे । यह है धुन । यह धुन जहाँ लगी, वहीं जाओगे। इसलिए संसार में धुन लगी रहने से बार-बार जन्म हो रहा है। जिसकी धुन जहाँ लगी, वो वहीं है। शादी में, विषयों में, फिर बच्चों में, फिर धन में, ना जाने कहाँ - 2 यह धुन लगी रहती है ! वृद्धावस्था में धन में ज़्यादा लोभ होता है । पैसे में बड़ा आनन्द आता है। जिस पदार्थ में आनन्द लगा, वहाँ आनन्द नहीं था । वो तो आपमें था । कहीं आपने आनन्द का ज़रिया खेल बना रखा है, कभी विषय-विकार, कभी धन, कभी मान-मर्यादा । यह ध्यान व्यस्त है । जब स्थिर होंगे तो पता लगेगा कि कितना आनन्द है । पर मन इसे स्थिर नहीं होने देता..... एक पल भी नहीं ।

तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरति निरति थिर होय ।

कहैं कबीर वा पलक को, कल्प ना पावै कोय।।

यानी तन भी, मन भी, सुरति - निरति भी स्थिर हो तो कल्पांतर की साधना से तुलना नहीं हो सकती है। आत्म अनुभूति कर लेंगे, पर एक पल ऐसा नहीं आता। मन-माया आत्मा को 24 घण्टे भटका रहे हैं । मन हरेक अवस्था में होता है । साधक महाशून्य की सृष्टियों में जाता है तो भी मन में होता है । जो सौर मण्डल को देख रहे हैं, ऐसे अनन्त विराट् एक-एक शून्य में समा जायेंगे। सोचें कि महापुरुष कितने बड़े वैज्ञानिक थे ! इस पिण्ड में बड़े रहस्य हैं। गुरु नानक देव जी भी कह रहे हैं - 'कोटि ब्रह्मण्डा दा तू मालिक... ।' ...... तो तब आदमी कितने भी जन्म लेता है, भूलता नहीं है । पर उससे परे एक अवस्था है, साहिब वहाँ रह रहे थे। वहाँ चेतना कभी नहीं मरती है। ‘तुरीयातीत ताहिं ते पारा। विनती करे तहँ दास तुम्हारा ।।' यह बड़ा विज्ञान है । जब उस अवस्था में पहुँचता है तो कभी भी नीचे नहीं आ सकता है । शरीर में भी रहेगा। तब जहाँ चाहेगा, आ जा सकता है ....... कभी-2 कुछ आत्माएँ मरने के बाद भी मिलने लग जाती हैं, क्योंकि एक ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गया कि शक्ति आ गयी । आत्मा के ऊपर पर्दे हैं । आत्मा के अंदर कुछ नहीं डाला जा सकता, पर इसके ऊपर आवरण डाल दिये गये हैं । ...तो साहिब ने कहा कि तब का ब्रह्मचारी हूँ । कह रहे हैं-करोड़ों बार निरंजन हुआ। ऐसे अनिर्वचनीय आन्नद में रहता है कि उसकी चेतना कभी विचलित नहीं होती । चेतना का कम बड़ा होना समाप्त हो जाता है । वासुदेव ने अर्जुन से कहा कि तेरे-मेरे बड़े जन्म हो चुके हैं, तुझे याद नहीं, पर मुझे याद हैं । हम जानने में भूल करते हैं । तुम्हें याद नहीं, क्योंकि तेरी अवस्था कुंद है । क्योंकि वे परम चेतन अवस्था में थे। काफी जन्मों तक उसकी चेतना रहती है । पर जो पाँचवी में पड़े, फिर कभी भी भूलता नहीं। पर जो छठी में पहुँचा, कभी वापिस ही नहीं आता । कभी हम कम्पोंउण्डर को भी डॉ० बोलते हैं। ऐसे ही हम सबको संत कह रहे हैं। ऐसे हम कहते हैं कि फलाना संत जी । .. तो देवता भी प्रज्ञा अवस्था में रहते हैं। किसी चीज़ को बाहर रखा तो जल्दी ख़राब हो जाती है। फ्रिज में रखा तो देर तक रहती है । कभी बहुत ठण्डी जगह रखें तो ख़राब नहीं होगी। बर्फ में पार्थिव शरीर बहुत देर तक रह जाता है ।

जीव ब्रह्म और माया सृष्टि चेतना का खेल है । पशु लोग स्वप्न अवस्था में हैं । मनुष्य जाग्रत में, देव तुरीया में, महान योगेश्वर तुरीयातीत में। उसके परे जो चेतना कभी नहीं बदलती, वो संत कहलाता है । 'नानक संत अकाल सदाहिं।।' उसमें विकार नहीं आ सकते हैं । लोहा था तो जंग लग सकती थी, जब पारस के स्पर्श से सोना बन गया तो कीमती हो गया । अब जंग नहीं लग सकती। एक संत ऐसी अवस्था को प्राप्त हो जाता है, फिर मन में नहीं आता। लोहा सोना बन गया तो जंग का ख़तरा हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है । ....तो कह रहे हैं कि करोड़ों निरंजन हो गये । शून्य सृष्टियाँ भी समाप्त हो जाती हैं, महाशून्य की भी समाप्त हो जाती हैं। कहा— मेरे सामने 10 करोड़ बार ब्रह्मा जी जन्म ले चुके हैं, सात करोड़ बार शम्भू हो चुके हैं, पर मेरा एक पल होता है तब । शास्त्रों में भी आता है कि जब मृत्यु लोक का एक वर्ष होता है, पितर लोक का एक दिन होता है । पितर लोक का एक वर्ष होता है तो ब्रह्मा जी का एक पल होता है। ब्रह्मा जी के सो वर्ष विष्णु जी का एक पल होता है । विष्णु जी सो वर्ष शिवजी का एक पल होता है । शिवजी का एक पूरा जन्म माया का एक पल होता है । माया का पूरा जीवन निरंजन का एक पल होता है और निरंजन के कई जन्म होते हैं, तब साहिब कह रहे हैं कि एक पल होता है मेरा। लोग तो लड़ाई करने आ जाते हैं । ...... ..तो कह रहे हैं कि मेरी आयु पूछ रहे हो तो यह है मेरी आयु । यानी इस आत्मावस्था से नीचे नहीं आता हूँ । आत्मा की कोई उम्र नहीं है अमर लोक में । मैं इससे बारीक कहूँगा तो पता नहीं चलेगा, समझ नहीं आयेगा, इसलिए उतना ही कहना है, जितना समझ सको। तो भाईयो ! 'तहाँ नहीं परले की छाया।' वहाँ प्रलय नहीं है । तो साहिब वहाँ से आए थे। वे कह रहे हैं- हाड़ माँस लोहू ना मोरे, हौं सतनाम उपासी ।

तारन तरन अभय पद दाता, कहैं कबीर अविनाशी ॥

सत्य स्वरूप नाम साहिब को, सो हैं नाम हमारा ।

ज्योति स्वरूप अलख निरंजन, सो जपै नाम हमारा ।।

जिस समय यह आत्मा अनन्त ब्रह्माण्डों को चीरते हुए अमर लोक में जाती है तो ऐसा थोड़े लगता है कि हम यहाँ पहली बार आए हैं; ऐसा लगता

है कि अपने असली घर पहुँच गये। नींद के बाद जब जाग्रत में आते हैं तो यह नहीं लगता कि कहाँ आए ! जानते हैं कि स्वप्न में थे, धोखा था । तो ऐसे लगता है कि कुंद अवस्था में थे । वहाँ भूख है, न प्यास, न आलस, न निद्रा । मुझे आश्चर्य लगता है हम एक बात तो कहते हैं कि आत्मा अमर है, पर कहीं व्यवहार में आत्मीयता नज़र नहीं आ रही है, व्यवहार में अनुकरण नहीं कर रहे हैं । शास्त्रों का अनुकरण कर रहे हैं कि आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकता, पानी गला नहीं सकता। ऐसे स्वरूप को प्राप्त करने के लिए हम चेष्ठा क्यों नहीं कर रहे ? जिसने हमारे स्वरूप को ढका, उससे भी सावधान नहीं हैं। ... तो व्यास जी आज्ञा चक्र में ध्यान रोकते थे । ये कोशिकाएँ जगीं तो हमें तुरीया तक ले जा सकती हैं। योगी की पहुँच यहाँ तक है। एक आदमी को चोट लगी तो मैं पास के क्लीनिक में ले गया। डॉ० ने कहा- ज़्यादा चोट है, मैडिकल हास्पिटल में ले जाओ। यानी डॉ० तो वो भी था, पर साधन नहीं थे । यदि कोई रोग वहाँ ठीक न हो तो एम्स में भेज देते हैं, क्योंकि वहाँ साधन बहुत हैं । जिसकी तकलीफ़ ज़्यादा हो, एम्स में भी ठीक न हो तो कहते हैं कि अमेरिका ले जाओ, क्योंकि वहाँ ज़्यादा साधन हैं इस तरह योगी तो ठीक हैं, पर योग से तुरीया तक पहुँच सकते हैं। हज़ारों साल तक चेतना कायम रहेगी, फिर कम हो जायेगी । वहाँ आनन्द है, पर वहाँ से भी नीचे आना होगा। पर साहिब कह रहे हैं कि 'तहँके गये बहुरि न आए, ऐसा देश हमारा है ।।' वहाँ से पुनर्जन्म नहीं होगा । एक मेटाडोर है - बाड़ी ब्राह्मणा की, एक कठुआ की.... वहीं तक जायेगी। महापुरुष कह रहे हैं कि निर्गुण द्वारा निराकार तक ही जा सकते हैं, आगे नहीं। थोड़ा-थोड़ा ऊँचा पद है । ... तो बात बारीक है । योग में भी ऐसी बात है।

सोहंग शब्द अगोचरी मुद्रा, भँवर गुफा अस्थाना ।

शुकदेव ताको पहिचाना, सुन अनहद की ताना ।।

अगोचरी मुद्रा भूचरी से उत्तम है। अब वो जाकर भँवर गुफा में बैठ जाते हैं। चेतना को पूर्ण एकाग्र करके वहाँ ला रहे हैं । सुरति का खेल है । बंकनाल ऐसा बिन्दु है कि वहाँ पहुँचने पर मन की स्फुरना कम हो जाती है ।

वहाँ चेतना खूब है । आनन्द भी खूब है । कुछ शब्द सुरति अभ्यास भी कह रहे हैं । अन्दर धुनें हैं, उनमें खो जाता है । कुछ इसे पराकाष्ठा कह रहे हैं, पर इससे तुरीयातीत से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है । धुनें खुद ख़त्म हो जाती हैं। ‘जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय । सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय ।।' फिर यह कौन सा शब्द हुआ ! यानी धुनात्मक शब्द नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है । साहिब कह रहे हैं— 'सो तो शब्द विदेह ।' आवाज़ रहित धुन है वो। क्योंकि - 'दो बिन होय न अधर अवाज़ा ।' आवाज़ दो के बिना नहीं होती और यहाँ द्वैत आ गया, वहाँ माया है । बंकनाल बड़ी निर्मल अवस्था है । आज भी देश में बहुत लोग यह चीज़ कर रहे हैं । मैंने कुछ लोगों से कहा कि अपनी पुस्तकें छपवानी हैं। मेरे लोगों ने कहा कि 7 लाख की मशीन है, आपको 6 लाख में मिल जायेगी। इतने में मेरे सैक्रेटरी ने कहा कि फलानी जगह भी इतने की मिल रही है, फिर अपने बंदे का क्या फायदा! तो उनसे बात हुई तो कहा कि 5.5 लाख में दे देंगे। मुझे शंका हुई। नीचे आ गये। मैंने जानकारी ली तो एक जगह 5 लाख की मिल रही थी। तो उन्होंने भी कहा कि ठीक है, पाँच में ही दे देना। मैंने तो भी नहीं ली तो आख़िर में 3 लाख तक आ गये। इतने में मेरा एक नामी आया, वो प्रेस में लगा था, उसे जानकारी थी, कहा कि वो नहीं लेना । वो तो आजकल कबाड़ी के भाव बिक रही है, आजकल कम्प्यूट्राइज़ड हलकी मशीने आई हैं, जिसे दो बंदे चला सकते हैं । .... वो 3 लाख वाला फिर आया, कहा कि आपने 3 लाख में भी नहीं ली। मैंने कहा कि तुम तो सात में दे रहे थे ..... वो फिर नहीं आया। आजकल ठगी बहुत है, इसलिए सावधान रहना । भक्ति क्षेत्र में तो पूछो ही मत। महात्मा को अपने कल्याण का पता नहीं है । मैं दिल्ली घूमने गया था। 30-40 साल पहले की बात है । सोचा, एक रेड़ियो ले लेते हैं । चाँदनी चौक पर एक ने 700 रुपये का बताया। मैंने कहा कि ज़्यादा है उसने कहा कि 650 दे दो। मैंने कहा- ज़्यादा लग रहा है । उसने कहा कि बोहनी का समय है, 500 दे दो। मैंने कहा कि तू 4 बजे बोनी कर रहा है । उसने कहा— मैं अभी आया हूँ । हमारी शिफटें होती हैं ।...तो मैंने कहा कि रेट कम कर । उसने कहा कि खुद तो कहो, कितना दोगे ! मुझे शंका

हुई। इतने में उसने कहा कि ठीक है, निकालो 400 रुपये। मैंने तो भी कुछ नहीं कहा, तो कहा कि 250 दे दो। फिर 200, फिर 100 तक आ गया। मैंने सोचा कि पक्का कोई गड़बड़ है, कहा कि कीमत कम करो। उसने कहा— कम करो, कम करो ही बोले जा रहे हो, खुद मुँह से कहो कि कितना देना चाहते हो ! पहले 700 से 20 रुपये बोलने में शर्म आ रही थी। तो कहा कि 20 रुपये दूँगा । उसने कहा—निकालो। मैंने कहा कि पैसे भी ले लो, मुझे रेड़ियो भी नहीं चाहिए, मुझे केवल जानकारी दे दो कि मामला क्या है ! तो उसने कहा कि अभी भी इसमें 8 रुपये का फायदा है। मैंने पूछा- कैसे ? कहा कि यह पाँच मिनट चलेगा, नकली बेकार सेल्स हैं, बेकार मशीनरी है । फिर कोई रिपेयर भी नहीं कर पायेगा। मैंने कहा कि मैंने वापिस आना था। कहा – मैंने कहना था - कि मैंने दिया ही नहीं। मैंने देखा कि उसके पीछे कुछ गुण्डे भी खड़े थे । और भी कई चीजें हैं। तो भाईयो ! भक्ति में भी यही चीज़ें आ गयी हैं । महात्मा की मीठी-मीठी बातों में मत आना । उसके नाच को मत देखना, वो जो कह रहा है, केवल उससे ही संतुष्ट नहीं हो जाना । उसको पहले देखना कि खुद कहाँ तक पहुँचा हुआ है, क्या खुद रुहानी दुनिया में गया है या नहीं ! .. हम योग आदि को नकार नहीं रहे, पर इसके आगे भी कुछ अवस्थाएँ हैं । एक आदमी मेरे पास आया, धुन की महिमा कहने लगा। उसने उदाहरण भी दिये, कहा कि आप कह रहे हैं कि नाशवान हैं । उसका मतलब था कि धुनें ही पराकाष्ठा हैं । नहीं! वो एक पड़ाव है, मुकाम नहीं। वहाँ की अवस्था ऐसी है कि मन को काम, क्रोध नहीं हो पाता, पर वो लक्ष्य नहीं है । हमने सोच लिया कि कबीर साहिब के चार दोहे पढ़कर कबीर को जान लिया। पर सावधान ! क्योंकि-

कबीर का गाया गायेगा। तीन लोक में मार खायेगा ।।

कबीर का गाया बूझेगा । अन्तरगत को सूझेगा ।।

... तो आगे कह रहे हैं— सत् शब्द सो उनमुनि मुद्रा, सोई आकाश सनेही । तामें झिलमिल जोत दिखावे, जाना जनक विदेही ।

शुकदेव को राजा जनक को गुरु धारण करना पड़ा था, क्योंकि उनमुनि मुद्रा के विशेषज्ञ थे ।

ररंकार खेचरी मुद्रा, दसवां द्वार ठिकाना ।

ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, ररंकार को जाना ।।

फिर इन सबसे ऊपर पाँचवीं मुद्रा खेचरी है । इसमें 10वें द्वार को खोल जाना होता है । इसमें पारंगत हैं - त्रिदेव । लोग आलोचना कर रहे हैं, हम कह रहे हैं कि चिंतन करो । मानव तन में दिव्य रहस्य भरे हैं ।

शिव गोरख सो पच-पच हारे, इस काया का भेद ना पाए । ।

इससे सुषुम्ना नाड़ी को खोल महाशून्य तक जाते हैं, महाशून्य क को अनुभव कर सकते हैं । 10वाँ द्वार खुलने से कहीं भी विचरण करने की क्षमता आ जाती है । पर साहिब कह रहे हैं- - सिध साध त्रिदेवादि ले, पाँच शब्द में अटके । मुद्रा साध रहे घट भीतर फिर औंधे मुँह लटके | तो सभी यहाँ तक पहुँचे । औंधे मुँह लटकने का मतलब है, फिर माँ के पेट में आना। यानी फिर जन्म होगा । पुनर्जन्म विद्यते । दुबारा जन्म होगा । माया फिर नीचे पटक सकती है । अन्तर का भ्रमन मीन, पपील, और विहंगम से होता है । योगी मीन, पपील से जाता है, पर विहंगम से नहीं ।

इसके आगे भेद हमारा | जानेगा कोई जाननहारा ।।

कहैं कबीर जानेगा वोही, जापर कृपा सतगुरु की होई । ।

सत्य-भक्ति सद्गुरु के ही चारों ओर घूम रही है। इसमें सद्गुरु के 'नाम' का बड़ा महत्व है । इसमें 11वें द्वार से निकलकर हमारी आत्मा अपने मूल स्थान को लौट जाती है, जहाँ से फिर कभी वापिस इस दुख से भरे संसार में नहीं आना पड़ता । सगुण-निर्गुण भक्ति में जीव कहाँ तक जायेगा, साहिब एक अन्य स्थान पर पुनः समझा रहे हैं । सगुण - भक्ति में त्रिगुण - भक्ति का महत्व है। साहिब कह रहे हैं—

हर हर नाम सदा शिव केरा । तासों दूर न होत भव फेरा।।

बहुत प्रीत सों शिव को ध्यावे । रिद्धि सिद्धि बहुत सुख पावे ।।

मन जिसके निश्चय कर रहीं । गिरि कैलास में बासा करहीं । ।

फिरके काल झपेटे बाहीं । डार देय भवसागर माहीं । ।

यानी कोई लाभ नहीं। रिद्धियाँ, सिद्धियाँ तो मिल जायेंगी, सुख भी मिल जाएगा, पर भवसागर से सदा के लिए छूट नहीं पाएगा। कैलास पर्वत पर भी वास पा लेगा, पर काल - पुरुष पुनः भवसागर में फेंक देगा। तभी कहा- शिवसाधन की यह गति, शिव हैं भव के रूप ।

बिन समझे यह जगत सब, परे महा भ्रम कूप ।।

क्या मनुष्य- जन्म इसलिए मिला था ? नहीं! मनुष्य - तन तो सदा के लिए यहाँ से छूटकर अमर-लोक में जाने के लिए मिला था। पर मनुष्य है कि समझता ही नहीं। आगे कह रहे हैं-

हरि हरि नाम विष्णु को भाखा । शुभ अरु अशुभ कर्म है राखा ।।

इनमें करे कलोल सदाई । करे भोग जीवन भरमाई ।।

बहुत प्रीत सों विष्णु को ध्यावे । सो जीव विष्णु पुरी को जावे ।।

विष्णु पुरी में निर्भय नाहीं । फिरके डार देय भूमाहीं । ।

यानी सुरक्षा तो यहाँ भी नहीं है । भय है । साहिब के सद्गुरु के | अमर लोक के बिना सुरक्षा कहीं भी नहीं है । आगे कह रहे हैं-

हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ । रज गुण व्यापक है सब ठाऊँ ।।

ब्राह्मण को पूजै संसारा । जीव न हो भव ते न्यारा।।

पढ़ पढ़ विद्या जग भर्मावे । भक्ति पदारथ कैसे पावे ।

पोथी पाठ पढ़ें दिन राती । ये केवल भ्रम के उत्पाती ।।

आप भ्रम ते निर्भय नाहीं । बहे जात हैं भ्रम के माहीं ॥।

औरन को शिक्षा सब देही । ताते मिलै न परम सनेही ।।

पाप पुण्य का लेखा करहीं । बिना भक्ति चौरासी परहीं ।

ब्राह्मण की है यह करतूती । ब्राह्मण पूजे होय न मुक्ति ।।

अरे, मुक्ति तो इसमें भी नहीं है । अगर सगुण भक्ति में मुक्ति है ही नहीं तो फिर ज़रूर हमें इससे ऊपर उठना होगा। इससे ऊपर निर्गुण-भक्ति है, पर हमें निर्गुण-भक्ति से भी ऊपर साहिब की, सद्गुरु की भक्ति की ओर जाना होगा । निर्गुण-भक्ति में तो योग का महात्म है, पर साहिब कह रहे हैं—

सुन धर्मदास भक्तिपद ऊँचा । इन सीढ़ी कोई नाहिं पहुँचा । ।

योगी योग साधना करई । भवसागर से नाहीं तरई ।।

यानी निर्गुण-भक्ति से भी कल्याण नहीं होने वाला। इसकी पहुँच भी साहिब बता रहे हैं-

जाय निरंजन माहिं समाई । आगे गम्य न काहू पाई ।।

ऐसे तीन लोक सब अटके । खरे सयाने ते सब भटके ।।

ऋषि मुनि गण गंधर्व अरु देवा । सब मिल करें निरंजन सेवा ।।

साधक सिद्ध साधु जो भयेऊ । इनके आगे कोई न गयेऊ ।।

सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि आदि जितने भी समय-समय पर इस संसार हुए, वे सब निरंजन तक ही गये । उसके आगे कोई नहीं जा पाया। सबने निरंजन की भक्ति की सच्ची भक्ति कोई समझ नहीं पाया।

कहैं कबीर सुनो मम बानी । सार भक्ति मैं कहौं बखानी ।।

आगे भक्त भये बहु भाई । करी भक्ति पर युक्ति न पाई ।।

आदि भक्ति शिव योगी केरी । राखी गुप्त न जग में फेरी ||

तासन मेरी भक्ति नियारी । जाको क्या जाने संसारी ।।

ताको योगेश्वर नहिं पावे । और जीव की कौन चलावे । कहा कि भक्ति का सार बताता हूँ । अब तक बहुत भक्त संसार में हुए; भक्ति तो की, पर युक्ति नहीं आई । हर चीज़ की एक युक्ति होती है। महायोगेश्वर शिवजी आदि भक्ति जानते हैं, जिसमें ररंकार नाम का जाप करना होता है । उस ररंकार से ही जगत की उत्पत्ति है । पर इस भक्ति को गुप्त रखा गया। इसे केवल शिवजी ही जानते हैं, कोई और नहीं जानता, पर मेरी भक्ति इससे परे है । जिस भक्ति की बात मैं कर रहा हूँ, उसे योगेश्वर भी नहीं जानते हैं, फिर आम संसारी किस गिनती में हैं !

सनक सनन्दन सनत्कुमारा । सनकादिक से चारों अवतारा ।।

ध्यान जु करे निरंजन माहीं । निरंजन सों न्यारा कोउ नाहीं । ।

भक्त अनेक भये जग माहीं । निर्भय घर को पावत नाहीं ॥

भक्ति करैं तब भक्त कहावे । भगते रहित न कोई पावे ।।

भग भुगते फिर फिर भग आवे । भगते बच न कोई पावे ।।

चौदह लोक बसैं भग माहीं । भग ते न्यारा कोई नाहीं ॥

मेरी भक्ति युक्ति जाना । ताका आवागमन नशाना।।

सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनकादिक आदि भी निरंजन का ध्यान कर उसी तक पहुँचते हैं, उससे परे कोई नहीं । संसार में अनेक तरह के भक्त हुए हैं, पर उस अमर लोक, जो निर्भय स्थान है, को कोई नहीं पाया । सभी

विषयों में फँसे हुए हैं; विषय भोगकर फिर विषयों में ही आकर समाते हैं । इससे कोई नहीं बच पाया । जो मेरी भक्ति पाकर उसकी युक्ति जानता है, उसका आवागमण मिट जाता है; फिर वो मातृ गर्भ में नहीं आता।

जो तुम पूछो भक्ति प्रकारा । ताका भेद सुनो अब न्यारा।।

भक्ति होय न नाचे गाये । भक्ति होय न घंट बजाये ।।

भक्ति होय न मूरत पूजा । पाहन सेवे क्या तोहि सूझा ।।

विमल विमल गावें अरु रोवें । क्षण एक परम जन्म को खोवें ।।

ऐसे साहब मानत नाहीं । ये सब काल रूप के छाहीं ।।

मन ही गावे मन ही रोवे । मन ही जागे मन ही सोवे ।।

जब लग भीतर लग्न न लागे । तब लग सुरति कबहुँ न जागे ।।

सत्य नाम की खबर न पाई । का कर भक्ति करों रे भाई ||

ठौर ठिकाना जानत नाहीं । झूठे मग्न रहैं मन माहीं।।

कहन सुनन को भक्त कहावें । भक्ति भेद कितहूँ नहिं पावें ।।

अपने साहिब को न जाना । बिन देखे का किया बखाना ।।

ऐसे भूल परे संसारा । कैसे उतरे भव जल पारा ।।

धर्मदास ! जो तुम सच्ची भक्ति पूछ रहे हो तो पहले यह समझ लो कि नाचना, गाना, घंट बजाना, मूर्ति पूजा आदि यह सब भक्ति में नहीं आते। फिर रोना, गाना आदि भी भक्ति नहीं है । इन चीजों से साहिब खुश नहीं होते हैं। ये सब तो काल का जाल है, क्योंकि मन ही रोता है, मन ही गाता है, मन ही जागता है, मन ही सोता है । इसलिए जब तक भीतर लग्न नहीं लगती, तब तक इन बाहरी चीज़ों से सुरति चेतन नहीं हो सकती। जब तक सत्यनाम नहीं मिल जाता, तब तक कौन-सी भक्ति हुई ! सच्चे साहिब के घर का तो पता नहीं है, फिर झूठे ही मन में खुश होते रहने से क्या होता है ! ऐसे तो कहने- सुनने को बहुत सारे भक्त बन जाते हैं, पर सच्ची भक्ति का भेद मालूम नहीं होता। बिना देखे ही उसका बखान करते रहने से कुछ नहीं होता। सारा संसार ऐसे ही बाहरी चीजों में उलझा हुआ है, फिर संसार सागर से पार कैसे पाया जा सकता है !

धर्मदास तुम हो बुद्धिवंता । भक्ति करो पावो सतसंता।।

एक पुरुष है अगम अपारा। ताको नहीं जाने संसारा।

ताकी भक्ति से उतरे पारा। फिर के नहिं ले जग अवतारा ।।

भक्ति ही भक्ति भेद बहु भारी । यही भक्ति जगत ते न्यारी ।।

हे धर्मदास ! तुम बुद्धिमान हो, इसलिए संतों के संग में जाकर सत्य भक्ति को प्राप्त करो। एक पुरुष अगम है; उसको संसार नहीं जानता है । उसकी भक्ति से ही जीव संसार-सागर से पार होकर फिर वापिस नहीं आता । यही सच्ची भक्ति का गुप्त भेद है, जो संसार की सभी भक्तियों से न्यारी है । धर्मदास जी ने पूछा-

धर्मदास कहै सुनो गुसाईं । पूरण पुरुष बसै किहि ठाई ।।

केहि विधि सों सेवा कीजे । कैसे चरण कमल चित दीजे || पूछा कि वो परम पुरुष कहाँ रहता है; कैसे उसकी भक्ति करूँ ? साहिब ने कहा—

पहिले प्रेम अंग मैं आवे । साधु देख सम्मुख होय धावे ।।

चरण धोय चरणामृत लेवे । प्रीति सहित साधु को सेवे ।।

जोई साधु प्रेम गति जाने । ता साधु की सेवा ठाने ।।

परम पुरुष की भक्ति दृढ़ावे । सुरतै नृप कर तहँ पहुँचावे ।।

तासों भक्ति करो चितलाई । छाड़ो दुर्मति औ चतुराई ||

तबही परम पुरुष को पाये । भव तरके जग बहुरि न आवे ।।

कहा कि पहले अंतर में साधु के प्रति प्रेम उत्पन्न करे, उनके चरण धोकर चरणामृत ले, उनकी सेवा करे । जो साधु सच्चे प्रेम की बात जानता हो, उसकी सेवा करो। वो ही परम-पुरुष की भक्ति में लगाकर वहाँ पहुँचा सकता है । उसी की भक्ति करो, तब ही परम-पुरुष को पाकर संसार से पार हो सकते हो। आगे धर्मदास जी ने पूछा-

सगुण भक्ति करे संसारा । निर्गुण योगेश्वर आधारा ।।

इन दोनों के पार बतावा । तुम कैसी विधि तहँ मन लावा ।।

सत्य बात मोहि कहो गुसाईं । केहि विधि सुरति लगाऊँ धाई ||

सतगुरु संशय देहु निवारी । मैं जाऊँ तुम्हरी बलिहारी ।।

सगुण निर्गुण भेद बताऊँ । तीसर न्यार मोहिं लखाऊँ ।।

तुम सत सत्य तुम्हारी बाता। मैं याचक तुम समरथ दाता ।।

कहा, हे साहिब! आम संसारी जीव सगुण भक्ति करता है, योगेश्वर

तक निर्गुण-भक्ति करते हैं, पर आप इन दोनों के पार बता रहे हैं; मुझे समझ नहीं आ रहा है कि वहाँ कैसे ध्यान लगाऊँ, कैसे वहाँ की भक्ति करूँ। मुझे सगुण और निर्गुण का भेद बताकर तीसरी न्यारी भक्ति बताओ। मैं जानता हूँ कि आप सत्य हैं और आपकी सब बातें भी सत्य ही हैं । फिर साहिब ने कहा-

सुन धर्मन समरथ है न्यारा । ताको नहीं जाने संसारा ।।

योगेश्वर वह गति नहिं पाई। सिद्ध साधक की कौन चलाई ||

भक्ति होय जगत में भारी । ध्रुव प्रह्लाद सदा अधिकारी ।।

सतयुग भक्ति करी ध्रुव राजा । पाँच वर्ष आयू तत भ्राजा ।।

निकसे गृह ते बाहर गयेऊ। नारद के उपदेशी भयेऊ ।।

छठें मास प्रकटे हरि आई। राज दिये वैकुण्ठ पठाई ।।

साठ हजार वर्ष दियो राजू । कुटुम सहित वैकुण्ठ विराजू ।।

एक दिवस जब प्रलय आई । तहाँ ते पुनि ये देह गिराई ।।

ऐसे भक्त भये जग माहीं । परम पुरुष गत पावत नाहीं ।।

कहा कि जो परम - पुरुष है, वो सबसे न्यारा है, उसे कोई नहीं जानता । योगेश्वर भी वो गति नहीं पा सकते, फिर सिद्ध, साधक आदि किस गिनती में हैं! संसार में भक्ति करने वाले बहुत हुए, पर परम - पुरुष का भेद किसी ने नहीं पाया, इसलिए संसार के आवागमन का चक्कर नहीं छूटा । धर्मदास जी ने पूछा— धर्मदास बूझे चित लाई | सतगुरु संशय देहु मिटाई || सर्गुण भक्त मुक्त नहिं होई । है वह एकहि या है दोई ||

की सर्गुण को निर्गुण कहिये । भिन्न भिन्न भेद मोहिं कहिये ।।

यह संसार कहाँ से आया । को है ब्रह्म अरु को है माया ।।

भक्ति भेद कहो मोहे स्वामी । तुम सब घट के अंतर्यामी ।।

जीव काज आये जगमाहीं । अब मोको कछु संशय नाहीं ।।

कहा कि क्या सगुण-भक्त मुक्त नहीं होता ! वो सगुण कोई दूसरा है या वही एक परमात्मा है। कृपया मुझे सगुण-निर्गुण का भेद अलग-अलग करके बताओ। यह संसार कहाँ से आया है, ब्रह्म कौन है और माया क्या है ! मुझे भक्ति का सारा भेद समझाकर कहो, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप जीवों का कल्याण करने के लिए ही संसार में आए हैं । तो साहिब ने आगे कहा-

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहो परकाशा ।।

आदि न अंत हती न माया । उत्पति प्रलय हती न काया।।

आदि ब्रह्म नहीं ओंकारा। नहीं निरंजन नहिं अवतारा ।।

दश अवतार न चौवीस रूपा । तब नहिं होता ज्योति स्वरूपा ।।

नहिं तब शून्य सुमेर न भारा । कूर्म न शेष धरे अवतारा ।।

अक्षर एक न ररंकारा । त्रिगुण रूप है नहिं विस्तारा ।।

शक्ति युक्ति न आदि भवानी । एक होय नहिं ज्ञान अज्ञानी ।।

नहीं है बीज नहीं ओंकारा । आदि अमी नहीं चंद न सूरा ।।

कहा कि मैं अपना भेद सुनाता हूँ, समझना । मैं तबसे हूँ जब आदि अंत कुछ भी नहीं था, माया नहीं थी । उत्पति नहीं थी, प्रलय नहीं थी, काया नहीं थी, ओंकार नहीं था, निरंजन नहीं था, उसके दस अवतार नहीं थे, आदि भवानी नहीं थीं, सूर्य-चाँद नहीं थे। परम-पुरुष का भेद देते हुए साहिब आगे धर्मदास को समझाते हैं-

पुरुष कहो तो पुरुषहि नाहीं । पुरुष हुवा आपा भू माहीं ।।

शब्द कहो तो शब्दहि नाहीं । शब्द होय माया के छाहीं ॥।

दो बिन होय न अधर अवाजा। कहो कहा यह काज अकाजा ।।

अमृत सागर वार न पारा । नहिं जानों केतिक विस्तारा ।।

तामें अधर भवन इक जागा । अक्षय नाम अक्षर इक लागा ।।

नाम कहो तो नाम न जाका। नाम धरा जो काल तिहि ताका ।।

है अनाम अक्षर के माहीं । निह अक्षर कोई जानत नाहीं ।।

धर्मदास तहँ बास हमारा। काल अकाल न पावे पारा।।

ताकी भक्ति करै जो कोई । भव ते छूटै जन्म न होई ।।

कहा कि यदि उस सत्ता को पुरुष कहा जाए तो वो पुरुष नहीं है, क्योंकि पुरुष तो स्वयं प्रकृति से हुआ है । फिर यदि उसे शब्द कहा जाए तो वो शब्द भी नहीं है, क्योंकि शब्द भी माया से ही उत्पन्न होता है । दो चीजें आपस में टकराती हैं, तभी शब्द उत्पन्न होता है | आवाज़ दो के बिना नहीं होती, इसलिए जहाँ द्वैत आ गया, वहाँ माया है । पर उस अमृत- सागर का कोई पार नहीं है । वो एक अक्षय लोक है, अक्षय नाम है, कभी मिटता नहीं है । पर यदि उसका कोई नाम कहा जाए तो उसका कोई नाम भी नहीं है, क्योंकि नाम

अक्षर की सीमा में होने से काल का नाम हुआ। वो अनाम है, वो नि: अक्षर है, उसे कोई नहीं जानता है । हे धर्मदास ! वहीं मेरा वास है; वहाँ काल भी नहीं पहुँच

सकता है । उसकी जो कोई भक्ति करता है, उसका फिर कभी जन्म नहीं होता । ।

पर अब यहाँ एक बात और हो गयी। सगुण या निर्गुण भक्त भी अपने को सद्गुरु समझने लग गये हैं । वे साहिब की मोहर लगाकर सांसारिक नाम का व्यापार करने लगे हैं । वे साहिब की वाणी तो ले रहे हैं, पर स्वयं तीन- लोक में ही अटके हुए हैं। लेकिन संतों ने तो इस तीन- लोक से परे एक चौथे अमर-लोक की बात की है। उन्होंने मनुष्य को समझाने का प्रयास किया है कि हे मनुष्य ! यह संसार काल का देश है, इससे ऊपर उठ और अपने देश में चल । वहाँ से फिर कभी भी इस नरक - कुण्ड में नहीं लौटना है । अमर - लोक में जाना ही सच्चे मोक्ष की प्राप्ति है । जो जीव सच्चे सद्गुरु की शरण में आ जाते हैं, वे ही सच्चे मोक्ष के अधिकारी बन पाते हैं जबकि अधिकतर सगुण- निर्गुण में ही उलझकर अपना अमोलक मानव-चोला झूठी मुक्तियों की बलि चढ़ा देते हैं। सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज ।

जीव खोय सब जायेंगे, तिहुँ पर काल का राज ।।

कमाई से परे सद्गुरु कृपा की बात कर रहे हैं

बहु बंधन ते बांधिया, एक विचारा जीव ।

जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥

कह रहे हैं कि जीव खुद अपनी ताक़त से नहीं छूट सकता है। क्योंकि बाँधने वाली ताक़त शक्तिशाली है । आप पढ़ते हैं कि शृंगी ऋषि की तपस्या भंग कर दी गयी। क्रोध ने भृगु ऋषि का तप भंग कर दिया।

क्रोध किये गति मुक्ति न होय ॥

यानी अन्दर में विवश करने वाले शत्रुओं ने तप भंग कर दिया। ये आए कहाँ से? कितनी सहज वाणी है कि जिन शक्तियों ने जकड़ा है, उनसे अपनी ताक़त से नहीं छूट सकता है।

जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥

यह अपनी ताक़त से नहीं छूटने वाला है। कुछ को बुरा लगा। वो कह

रहे हैं कि दान करो, कल्याण हो जायेगा । तीर्थ करो, कल्याण हो जायेगा । नि:संदेह जब उन्हें ठेस लगी तो विरोध हुआ साहिब का । स्वाभाविक भी है। साहिब ने कहा कि निरंजन का पॉवर जो अन्दर में है, वो अपनी ताक़त से पार नहीं होने देगा। आप कथाओं में सुनते भी हैं कि ऋषि-मुनियों ने बड़ी-बड़ी तपस्या की, पर फिर कहीं काम ने वश में कर लिया, कहीं क्रोध के वशीभूत हो गये । अगर इतनी तपस्या करके वो क्रोध से नहीं छूट सके, काम से नहीं छूट सके तो मन-माया के इतने भयंकर जाल से कैसे छूटेंगे ! काम तो मन का एक हाथ ही है । क्रोध तो मन का एक हाथ है। तभी तो कह रहे हैं-

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा ।

गृह छोड़ भय सन्यासी, तऊ न पावत पारा ॥

तो अनुकंपता की बात आई । सद्गुरु की कृपा की बात आई । एक महात्मा ने कहा कि कैसे पार कर देगा सद्गुरु! मेरी समझ से परे है। सच है, उनकी समझ से परे की बात है । क्योंकि उनके पास यह ताक़त नहीं होगी । इसलिए समझ से परे है । साहिब कह रहे हैं-

इसके आगे भेद हमारा | जानाग कोई जाननहारा ॥

क्या गप है? नहीं। यानी योग का सूत्र है - क्रिया । इसलिए गुरु को महात्म नहीं दिया। पर संत महात्म दे रहे हैं । सब पंथों के लोग ये क्रियाएँ बता रहे हैं। पर संत मत नहीं है यह। संत-मत अलग है। भाई, पहले योग था, संत शब्द नहीं मिलता है । अब जो सगुण भक्ति कर रहा है, वो भी संत कह रहा है। संत- मत में सहजे सहज पाइये वाली बात है । वो कह रहा है कि गुरु पार कर देगा। वो कह रहे हैं कि पल में पार कर देगा । क्या किसी ऋषि, मुनि ने कहा एसा ? नहीं कहा। संतत्व गुरु के इर्द- गिर्द घूम रहा है। वो यह नहीं कह रहा कि रास्ता बताएगा; वो तो कह रहा है कि एक मिनट में पार कर देगा । निर्गुण तो कमाई की बात करेगा। यहाँ मतभेद खड़े हो जायेंगे । साहिब कह रहे हैं- कोटि जनम का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥ जो कमाई कह रहे हैं, भ्रमित हैं । हम दो चीज़ कह रहे हैं—गुरु का दर्शन और सेवा । इसलिए दो चीज़ों के इर्द-गिर्द घूम रही है संतों की धारा ।

हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक ।

तिसका पटतर ना तुला, संतन किया विवेक ॥

यह संत-मत लोप होता गया । ये निर्गुण-भक्ति वाले इस पर हावी होते गये। संतों के जाने के बाद कुछ महत्वांकाक्षी लोगों ने और उनके रिश्तेदारों ने अधिकार जमाए। पर संतमत को समझ न पाए। इसलिए अपनी निर्गुण-सगुण को भी मिला दिया, मिश्रित कर दिया। बस, ऐसी बात कर दी कि कोई ग्राहक वापिस न जाए। कोई कह रहा है कि जिसका नाम पहले जप रहे थे, वही जपो । अगर ऐसा ही है तो गुरु किसलिए किया जा रहा है ?

संत-मत पापुलर हुआ। पर उनके पास पारस सुरति नहीं है ।

पारस सुरति संत के पासा ।।

अगर परम-पुरुष से पारस सुरति नहीं मिली तो धोखा कर रहा है गुरु शिष्य से। क्योंकि तब अपने समान नहीं बना पायेगा । पारस में अरु संत में, तू बड़ो अन्तरो मान ।

वह लोहा कंचन करे, वह करिले आप समान ॥

गुरु को कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परणाम ।

कीट न जाने भृंग को, करिले आप समान ॥

ये शब्द बोल रहे हैं कि गुरु बड़ा है। ये गुरु के अस्तित्व को स्थापित कर रहे हैं। वो नाम देकर एक ताक़त आपमें प्रविष्ट कर देता है।

पुरुष शक्ति जब आन समाई । तब नहीं रोके काल कसाई ॥

तो साहिब ने खण्डन तो किया नहीं। वो कह रहे हैं कि जिन साधनों से पार होने की सोच रहे हैं, वो नाकाफ़ी हैं।

बिन सतगुरु बांचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ॥

तब ही काल के जाल से निकल सकोगे। वो ताक़तवर है । तो जो कह रहा है कि कमाई करो, तब परम तत्व की प्राप्ति होगी तो शंका आ जाती है। गोस्वामी जी भी कह रहे हैं-

यह सब साधन से न होई । तुम्हरी कृपा पाय कोई कोई ॥

साहिब भी कह रहे हैं-

अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को ॥

तुम अदा करो, अपने खजाने से। यह जीव अपनी ताक़त से छूटने में

सक्षम नहीं है । क्योंकि बेगाने देश में आकर उसका हंस बहुत बंधनों से बँधा है । और नाम - कमाई से या अपनी ताक़त से जीव कभी भी इन बंधनों से छूटकर उस अमर-लोक में नहीं पहुँच पायेगा। सगुण-निर्गुण दोनों भक्तियों में कमाई की बात है, गुरु का ज़्यादा महत्व नहीं है। इनमें गुरु केवल रास्ता बता देता है। अब साधक जितनी कमाई करता है, उतना ही ऊपर उठ पाता है । 'बेचारे साधन नहीं कर पाते, उनका जीवन बेकार चला जाता है । पर सत्य - भक्ति में कमाई का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि अपनी कमाई से जीव केवल तीन-लोक तक ही घूम सकता है, उससे आगे नहीं जा सकता। महाशून्य में बड़े- बड़े चुंबकीय आकर्षण हैं। जीव वहाँ अपने को भूल जाता है। ऐसे में सद्गुरु उसे होश में लाकर अपने में समाता है और अमर-लोक ले जाता है । अन्यथा करोड़ों जन्म तपस्या करते रहने पर भी वहाँ से पार नहीं हुआ जा सकता है। धीरे-धीरे दूषित होती गयी संतत्व की धारा । विहंगम चाल लोप होती गयी। मीन और पपील ही रह गयीं। पपील चींटी को कहते हैं और मीन मछली को। पपील मार्ग यानी चींटी की चाल से ब्रह्माण्ड की यात्रा करनी और मीन मार्ग यानी मछली की चाल से तीव्रता से ऊपर की ओर बढ़ना । पंच मुद्राएँ हैं । पहली दो मुद्राएँ पपील चाल कहलाती हैं जबकि बाकी तीन मीन चाल । पर विहंगम चाल केवल संत चलते हैं।

कहैं कबीर विहंगम चाल हमारी ।।

ब्रह्माण्डों की यात्रा में भी साधक शरीर से निकलता है; उसे आभास होता है कि चल रहा हूँ..... सपना नहीं होता है । पर गति नहीं होती है। 14 लोकों को भी देखता है। ये साधारण नहीं है यात्रा । पर अमर - लोक की यात्रा अपने बल पर नहीं होती है । लगता है कि कोई साथ चल रहा है। मुहम्मद साहिब कह रहे हैं— चला जब लोक को, शोक सब त्यागिया । हंस का रूप सतगुरू बनाई ।

कीट ज्यों भृंग को, पलट भृंगी करे ।

आप संग रंग ले, ले उड़ाई ॥

यानी यह जीव अपने बल पर नहीं जा सकता है । जब ऐसा होता है तो दसों दिशाओं में एक-साथ दिखता है ।

जिस भी जगह ध्यान लगाएँ, वहाँ का आकर्षण खींचता है। चुंबकीय ताकतों से वो खिंचता है; पर साधक की गुरू से बात नहीं होती है। जबकि विहंगम चाल में गुरु साथ होता है, उससे पूरी-पूरी बात होती है, सब स्थानों को बताते चलते हैं । इच्छा की तीव्र गति से चलना है तो गति तेज़ हो जाती है । इच्छा से ही बल मिलता है । जैसी इच्छा की, वैसे ही होता है । यदि रुकना चाहो तो वो भी हो जायेगा। जितनी गति चाहो, हो जायेगी । यह स्पीड लाजबाव होती है। इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। दसों मुकामों की यात्रा करता हुआ साधक चलता है । ब्रह्माण्ड के अंत में पहुँचता है तो उससे आगे अपनी ताक़त से किसी कीमत पर नहीं जा सकता है । यहाँ तक भी अपने योग से, परिश्रम से जाया जा सकता है। इसी से कहा- ररंकार खेचरी मुद्रा, दसवां ठिकाना । द्वार

ब्रह्मा विष्णु महेशादि ले, ररंकार को जाना॥

ररंकार तक अपनी ताक़त से जाया जा सकता है, आगे नहीं । जो विवरण मैंने दिये हैं, कोई भी नहीं दे सकता है । आप जब भी चाहें, शरीर से निकल सकते हैं। पर—

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

.....तो विहंगम में साधक बड़ी तीव्र गति से चलता है। जब निरंजन स्थान पर पहुँचता है तो वहाँ 4 करोड़ सूर्य का प्रकाश है, जिससे वो अपनी सुधि भूल जाता है। जैसे स्वप्न में मन अवस्था बदल देता है, ऐसे ही अवस्था बदल देता है । तब भूल जाता है। तभी सबने कहा- बेअंत .... बेअंत ..... बेअंत । वहाँ इतना आनन्द है कि सुधि नहीं रह जाती है । इतने गहन प्रकाश का स्रोत है, इसलिए ज्योति-स्वरूप कहा। इसी का वर्णन सब जगह है। यहाँ पर साधक की आत्मा को सद्गुरु अपने में समाविष्ट कर ले चलता है। वो पारदर्शी शरीर है; साधक सब देखता चलता है । जब शून्य पार हो जाता है तो फिर सद्गुरु उसे अपने वजूद से अलग करते हैं । वहाँ आत्मा प्रश्न पूछती है कि एक बात बताओ कि इतनी देर हम साथ-साथ चले, फिर आपने मुझे अपने में क्यों समाया था ? तो सद्गुरु कहते हैं कि वहाँ निरंजन का ज़ोर इतना है कि मेरे साथ होते तो भी वो खींच लेता। वो प्रभावित कर लेता, इसलिए मैं अपने में समाकर ले चलता हूँ। .....तो कोई, जो यह यात्रा किया हो और कोई कहे कि अपनी कमाई से गया तो उसे थोथा झूठ नहीं लगेगा क्या ? साहिब कह रहे हैं—

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गृह छोड़ भये सन्यासी, कोऊ न पावत पारा॥

यानी उन्हें अमर-लोक का कोई भेद नहीं है, जो कह रहे हैं कि अपनी कमाई से जाया जा सकता है । वहाँ तो कोई कृत ही नहीं है । साहिब I कह रहे हैं-

अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को.....॥

न कुछ किया न कर सका, न करने योग शरीर ।

जो कुछ किया सो साहिब किया, भया कबीर कबीर ॥

....तो आगे सुरति का सागर आता है । जो ध्यान आपके शरीर में काम कर रहा है, उसी का सागर है वहाँ । आप सोचें कि पूरी दुनिया का काम ध्यान से हो रहा है और वहाँ इसका सागर है । इस आत्मा को वहाँ स्नान करवाया जाता है। वहीं मन छूटता है । कोई पानी में डुबकी नहीं लगानी है । अत्यन्त प्रकाश का स्रोत है और पल में अरबों बार घूमकर बाहर आए तो कैसा है ! ऐसी क्रिया से मन छूट जाता है और जब वो आत्मा परम-पुरुष के सम्मुख होती है तो उसमें 16 सूर्यों का प्रकाश आ जाता है । फिर वो परम चेतन हो जाती है। ..... तो बाद जब कभी भी वहाँ जाना होता है तो इस तरह से नहीं जाता है। बीच के रास्ते लोप हो जाते हैं। गुरु की ऐसी कृपा ! सोचो, यह अपनी कमाई से हो सकता है ! कभी नहीं । इसलिए साहिब की वाणी बार-बार चेताती हुई कह रही है- -

हरि कृपा जो होय तो, नहीं होय तो नाहिं ।

कहैं कबीर गुरु कृपा बिन, सकल बुद्धि बह जाहिं ।।

अनहद शब्द या 52 अक्षर से परे निःशब्द ( सार नाम )

की बात कर रहे हैं

इस नाम के बिना हृदय शुद्ध नहीं हो सकता है।

नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥

पर यह नाम वो नहीं है, जो संसार के लोगों ने समझ लिया। धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं-

धर्मदास कहै सुनो गोसाई । पुरुष नाम कहऊ समुझाई ॥

सहस्रनाम जो वेद बखाना । नेति नेति कह बहुरि निदाना ॥