करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें तो लोग कहते हैं कि महाप्रज्ञा अवस्था में हैं, पर यह आसान नहीं है । इसमें मन पर कण्ट्रोल होता है बड़ा, पर पूरा नहीं होता है । कुछ अंग कण्ट्रोल में आ जाते हैं । चेतना की बड़ी अवस्थाएँ देख सकते हैं । महायोगेश्वर इसमें पहुँच जाते हैं । मन माया में होता है, पर वो बहुत कण्ट्रोल में होता है । जैसे आदमी कॉमा में पहुँच जाता है तो रक्त तो चलता है, पर बंदा क्रिया नहीं कर पाता है । इस तरह मन उसमें होता है, जीवित हो सकता है फिर । आनन्द आत्मा में है । कहाँ से आता है ! इसमें है ही है स्वतः । मन के आवरण से नहीं मिल रहा है। जिन-2 पदार्थों में आनन्द देख रहे हैं, केवल आत्मा का है । और किसी पदार्थ में नहीं है । आपकी धुन जहाँ लगी, वहीं आनन्द है । आनन्द की अनुभूति मन वहाँ से करवाता है । माँ में सुरति लगती है तो बच्चे को वहीं से आनन्द मिलने लगता है। जब बड़ा होता है तो मन - माया उसकी धुन खेल में लगाते हैं । पहले माँ को छोड़ना नहीं चाहता था, पर अब ज़रूरत के समय ही जा रहा है माँ के पास.....खेलने में लग गया। धुन वहाँ लगी है। बालक का ध्यान खेल में रहता है। मज़ा रहता है । मज़ा उसमें नहीं था । वास्तव में मज़ा आत्मा में था। पूरे जीवन माया घुमाती है । यह दुनिया असार है, नीरस है, इसमें कोई आनन्द नहीं है । 'हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार ।' जिसमें भी धुन लगी, आनन्द लगा। धुन खुद आनन्दमय है । इसी धुन को कहीं न लगाकर अपने में रमा लो तो आनन्द ही आनन्द है । ..... तो बालक की पढ़ाई में धुन लग जाती है। 12-12 बजे तक पढ़ रहे होते हैं बच्चे । यह है धुन । यह धुन जहाँ लगी, वहीं जाओगे। इसलिए संसार में धुन लगी रहने से बार-बार जन्म हो रहा है। जिसकी धुन जहाँ लगी, वो वहीं है। शादी में, विषयों में, फिर बच्चों में, फिर धन में, ना जाने कहाँ - 2 यह धुन लगी रहती है ! वृद्धावस्था में धन में ज़्यादा लोभ होता है । पैसे में बड़ा आनन्द आता है। जिस पदार्थ में आनन्द लगा, वहाँ आनन्द नहीं था । वो तो आपमें था । कहीं आपने आनन्द का ज़रिया खेल बना रखा है, कभी विषय-विकार, कभी धन, कभी मान-मर्यादा । यह ध्यान व्यस्त है । जब स्थिर होंगे तो पता लगेगा कि कितना आनन्द है । पर मन इसे स्थिर नहीं होने देता..... एक पल भी नहीं ।
तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरति निरति थिर होय ।
कहैं कबीर वा पलक को, कल्प ना पावै कोय।।