करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रलय हो गयी, तबका ब्रह्मचारी घूम रहा हूँ । पलटू साहिब भी कह रहे हैं. 'कोटि प्रलय हो गयी, हम न मरण हारा ।' मौत क्या है ! यह चार अवस्थाओं का खेल है— सुषुप्ति, स्वप्न, जाग्रत, तुरीया । हम इन चार में घूमते रहते हैं । सुषुप्ति अत्यंत कुंद अवस्था है । जब भी वहाँ पहुँच जाता है इंसान तो उसकी चेतना कुंद हो जाती है । आपको इन अवस्थाओं में इसलिए भुलाया गया कि आप पिछले जन्मों की सुधि न पा सकें, यह जान न सकें कि क्या थे । सुषुप्ति में आदमी की चेतना जाग्रत से 1000 गुणा कम होती है । इसलिए याददाशत आत्मा नहीं है, मन की अवस्था है। कभी सुषुप्ति में पहुँच जाते हैं । इसे गहरी निद्रा भी कहते हैं । फिर जब उठते हैं तो जानने की कौशिश करते हैं कि कहाँ हूँ ! थोड़ी देर में जब चेतना आज्ञाचक्र में आती है तो मालूम पड़ता है कि यहाँ हूँ । जब आपकी चेतना आज्ञाचक्र में होती है तो आप होश में होते हैं । कभी ऐसे भी किसी को कह देते हैं कि क्या बात है, होश में आओ। वो मानो सोकर उठा है । अब उठकर होश में कैसे आना है ! वो फौरन अपनी सुरति उठाकर आँखों में लाता है । यह है होश में आना । मन आपको सुषुप्ति, स्वप्न आदि में काफी देर घुमाकर बेहोश रखना चाहता है। मृत्यु के समय भी ऐसी अवस्था में ला दिया जाता है । कुछ को पूर्व जन्म याद होता है, क्योंकि सुषुप्ति में भी विस्मृति नहीं हुई। वे चेतन रहे । इसलिए पूर्वजन्म की सुध रहती है । अब जाग्रत में आप देखते हैं, पर सुषुप्ति कुंद थी । जब स्वप्न में जाते हैं तो भी निराली अवस्था होती है । जाग्रत में बैठे हैं तो छल है, दिल दिमाग़ एक नहीं है, पर स्वप्न अवस्था इस दृष्टि से बड़ी ही यथार्थ है, आदमी का दिल दिमाग़ एक होता है । जाग्रत में तो छल है, बनावट है। आप किसी के लिए कह देते हैं कि अच्छा है, पर दिल से नहीं कहते हैं । जाग्रत में हम जो-2 देख रहे हैं, सब सच्चा लग रहा है । यह खेल है अवस्था का। चौथी अवस्था तुरीया स्वाभाविक नहीं है । देवता लोग इसमें रहते हैं । योगी चौथी अवस्था में रहते हैं । वो अच्छे बिन्दु पर हैं। पर यहाँ भी मन रहता है । इसके बाद तुरीयातीत है । पर योगियों ने तुरीया तक की अवस्था प्राप्त की। वो भी कम नहीं है । उसमें 1000 गुणा ज्यादा ज्ञान होता है । इसी पर पहुँचकर वो कहता है कि 'अहं ब्रह्मस्मि ।' पाँचवीं है तुरीयातीत । कहने