भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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यानी तन भी, मन भी, सुरति - निरति भी स्थिर हो तो कल्पांतर की साधना से तुलना नहीं हो सकती है। आत्म अनुभूति कर लेंगे, पर एक पल ऐसा नहीं आता। मन-माया आत्मा को 24 घण्टे भटका रहे हैं । मन हरेक अवस्था में होता है । साधक महाशून्य की सृष्टियों में जाता है तो भी मन में होता है । जो सौर मण्डल को देख रहे हैं, ऐसे अनन्त विराट् एक-एक शून्य में समा जायेंगे। सोचें कि महापुरुष कितने बड़े वैज्ञानिक थे ! इस पिण्ड में बड़े रहस्य हैं। गुरु नानक देव जी भी कह रहे हैं - 'कोटि ब्रह्मण्डा दा तू मालिक... ।' ...... तो तब आदमी कितने भी जन्म लेता है, भूलता नहीं है । पर उससे परे एक अवस्था है, साहिब वहाँ रह रहे थे। वहाँ चेतना कभी नहीं मरती है। ‘तुरीयातीत ताहिं ते पारा। विनती करे तहँ दास तुम्हारा ।।' यह बड़ा विज्ञान है । जब उस अवस्था में पहुँचता है तो कभी भी नीचे नहीं आ सकता है । शरीर में भी रहेगा। तब जहाँ चाहेगा, आ जा सकता है ....... कभी-2 कुछ आत्माएँ मरने के बाद भी मिलने लग जाती हैं, क्योंकि एक ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गया कि शक्ति आ गयी । आत्मा के ऊपर पर्दे हैं । आत्मा के अंदर कुछ नहीं डाला जा सकता, पर इसके ऊपर आवरण डाल दिये गये हैं । ...तो साहिब ने कहा कि तब का ब्रह्मचारी हूँ । कह रहे हैं-करोड़ों बार निरंजन हुआ। ऐसे अनिर्वचनीय आन्नद में रहता है कि उसकी चेतना कभी विचलित नहीं होती । चेतना का कम बड़ा होना समाप्त हो जाता है । वासुदेव ने अर्जुन से कहा कि तेरे-मेरे बड़े जन्म हो चुके हैं, तुझे याद नहीं, पर मुझे याद हैं । हम जानने में भूल करते हैं । तुम्हें याद नहीं, क्योंकि तेरी अवस्था कुंद है । क्योंकि वे परम चेतन अवस्था में थे। काफी जन्मों तक उसकी चेतना रहती है । पर जो पाँचवी में पड़े, फिर कभी भी भूलता नहीं। पर जो छठी में पहुँचा, कभी वापिस ही नहीं आता । कभी हम कम्पोंउण्डर को भी डॉ० बोलते हैं। ऐसे ही हम सबको संत कह रहे हैं। ऐसे हम कहते हैं कि फलाना संत जी । .. तो देवता भी प्रज्ञा अवस्था में रहते हैं। किसी चीज़ को बाहर रखा तो जल्दी ख़राब हो जाती है। फ्रिज में रखा तो देर तक रहती है । कभी बहुत ठण्डी जगह रखें तो ख़राब नहीं होगी। बर्फ में पार्थिव शरीर बहुत देर तक रह जाता है ।