करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीव ब्रह्म और माया सृष्टि चेतना का खेल है । पशु लोग स्वप्न अवस्था में हैं । मनुष्य जाग्रत में, देव तुरीया में, महान योगेश्वर तुरीयातीत में। उसके परे जो चेतना कभी नहीं बदलती, वो संत कहलाता है । 'नानक संत अकाल सदाहिं।।' उसमें विकार नहीं आ सकते हैं । लोहा था तो जंग लग सकती थी, जब पारस के स्पर्श से सोना बन गया तो कीमती हो गया । अब जंग नहीं लग सकती। एक संत ऐसी अवस्था को प्राप्त हो जाता है, फिर मन में नहीं आता। लोहा सोना बन गया तो जंग का ख़तरा हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है । ....तो कह रहे हैं कि करोड़ों निरंजन हो गये । शून्य सृष्टियाँ भी समाप्त हो जाती हैं, महाशून्य की भी समाप्त हो जाती हैं। कहा— मेरे सामने 10 करोड़ बार ब्रह्मा जी जन्म ले चुके हैं, सात करोड़ बार शम्भू हो चुके हैं, पर मेरा एक पल होता है तब । शास्त्रों में भी आता है कि जब मृत्यु लोक का एक वर्ष होता है, पितर लोक का एक दिन होता है । पितर लोक का एक वर्ष होता है तो ब्रह्मा जी का एक पल होता है। ब्रह्मा जी के सो वर्ष विष्णु जी का एक पल होता है । विष्णु जी सो वर्ष शिवजी का एक पल होता है । शिवजी का एक पूरा जन्म माया का एक पल होता है । माया का पूरा जीवन निरंजन का एक पल होता है और निरंजन के कई जन्म होते हैं, तब साहिब कह रहे हैं कि एक पल होता है मेरा। लोग तो लड़ाई करने आ जाते हैं । ...... ..तो कह रहे हैं कि मेरी आयु पूछ रहे हो तो यह है मेरी आयु । यानी इस आत्मावस्था से नीचे नहीं आता हूँ । आत्मा की कोई उम्र नहीं है अमर लोक में । मैं इससे बारीक कहूँगा तो पता नहीं चलेगा, समझ नहीं आयेगा, इसलिए उतना ही कहना है, जितना समझ सको। तो भाईयो ! 'तहाँ नहीं परले की छाया।' वहाँ प्रलय नहीं है । तो साहिब वहाँ से आए थे। वे कह रहे हैं- हाड़ माँस लोहू ना मोरे, हौं सतनाम उपासी ।
तारन तरन अभय पद दाता, कहैं कबीर अविनाशी ॥
सत्य स्वरूप नाम साहिब को, सो हैं नाम हमारा ।
ज्योति स्वरूप अलख निरंजन, सो जपै नाम हमारा ।।
जिस समय यह आत्मा अनन्त ब्रह्माण्डों को चीरते हुए अमर लोक में जाती है तो ऐसा थोड़े लगता है कि हम यहाँ पहली बार आए हैं; ऐसा लगता