भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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है कि अपने असली घर पहुँच गये। नींद के बाद जब जाग्रत में आते हैं तो यह नहीं लगता कि कहाँ आए ! जानते हैं कि स्वप्न में थे, धोखा था । तो ऐसे लगता है कि कुंद अवस्था में थे । वहाँ भूख है, न प्यास, न आलस, न निद्रा । मुझे आश्चर्य लगता है हम एक बात तो कहते हैं कि आत्मा अमर है, पर कहीं व्यवहार में आत्मीयता नज़र नहीं आ रही है, व्यवहार में अनुकरण नहीं कर रहे हैं । शास्त्रों का अनुकरण कर रहे हैं कि आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकता, पानी गला नहीं सकता। ऐसे स्वरूप को प्राप्त करने के लिए हम चेष्ठा क्यों नहीं कर रहे ? जिसने हमारे स्वरूप को ढका, उससे भी सावधान नहीं हैं। ... तो व्यास जी आज्ञा चक्र में ध्यान रोकते थे । ये कोशिकाएँ जगीं तो हमें तुरीया तक ले जा सकती हैं। योगी की पहुँच यहाँ तक है। एक आदमी को चोट लगी तो मैं पास के क्लीनिक में ले गया। डॉ० ने कहा- ज़्यादा चोट है, मैडिकल हास्पिटल में ले जाओ। यानी डॉ० तो वो भी था, पर साधन नहीं थे । यदि कोई रोग वहाँ ठीक न हो तो एम्स में भेज देते हैं, क्योंकि वहाँ साधन बहुत हैं । जिसकी तकलीफ़ ज़्यादा हो, एम्स में भी ठीक न हो तो कहते हैं कि अमेरिका ले जाओ, क्योंकि वहाँ ज़्यादा साधन हैं इस तरह योगी तो ठीक हैं, पर योग से तुरीया तक पहुँच सकते हैं। हज़ारों साल तक चेतना कायम रहेगी, फिर कम हो जायेगी । वहाँ आनन्द है, पर वहाँ से भी नीचे आना होगा। पर साहिब कह रहे हैं कि 'तहँके गये बहुरि न आए, ऐसा देश हमारा है ।।' वहाँ से पुनर्जन्म नहीं होगा । एक मेटाडोर है - बाड़ी ब्राह्मणा की, एक कठुआ की.... वहीं तक जायेगी। महापुरुष कह रहे हैं कि निर्गुण द्वारा निराकार तक ही जा सकते हैं, आगे नहीं। थोड़ा-थोड़ा ऊँचा पद है । ... तो बात बारीक है । योग में भी ऐसी बात है।

सोहंग शब्द अगोचरी मुद्रा, भँवर गुफा अस्थाना ।

शुकदेव ताको पहिचाना, सुन अनहद की ताना ।।

अगोचरी मुद्रा भूचरी से उत्तम है। अब वो जाकर भँवर गुफा में बैठ जाते हैं। चेतना को पूर्ण एकाग्र करके वहाँ ला रहे हैं । सुरति का खेल है । बंकनाल ऐसा बिन्दु है कि वहाँ पहुँचने पर मन की स्फुरना कम हो जाती है ।

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