करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुम्बई में प्रोग्राम हुआ तो मैंने पूछा कि जो माँस खाता है, हाथ खड़ा करे। एक ने खड़ा किया। मैंने पूछा कि क्यों खा रहे हो ? कहा कि खाने की चीज़ है; सभी खा रहे हैं। मैंने कहा कि यह खाने की चीज़ तो नहीं है। उसका तर्क था कि 90 प्रतिशत लोग माँस खा रहे हैं; केवल 10 प्रतिशत लोग नहीं खा रहे हैं। मैंने तर्क दिया, कहा- सुनो ! सच में यह खाने की चीज़ नहीं है । माँस खाना ईश्वरीय अपराध है; माँस खाना I वैज्ञानिक अपराध भी है । माँस खाना बहुत बड़ा अपराध है । ईश्वरीय अपराध इसलिए हुआ कि धर्म कह रहा है कि सभी प्राणियों में एक आत्मा है। तो सोचो कि आपको कोई टुकड़े-2 करके खाए तो कैसा लगेगा! वैज्ञानिक अपराध इसलिए है कि संसार में शाकाहारी और माँसाहारी जीवों की अपनी - 2 पहचान है । माँसाहारी जीवों की आँखों में ऐसा सिस्टम है कि रात को रोशनी बहुत बढ़ जाती है, अपना शिकार देख लेते हैं। दिन में उनकी आँखें जलती हैं; फिर वो पानी जीभ से उठाकर पीते हैं; उनके नाख़ून गोल होते हैं, ताकि शिकार पर अपने नाख़ून गाड़ सकें; उनके दाँत भी गोल और नुकीले होते हैं; उनमें ज़हर होता है। लेकिन दूसरी ओर शाकाहारी जीवों की आँखें दिन में जलती नहीं हैं; पानी भी निगल पर पीते हैं, नाख़ून भी गोल न होकर चौड़े होते हैं; दाँत भी चौड़े होते हैं, ज़हरीले नहीं होते । जैसे चीता, बिल्ली, शेर, सियार, नेवला आदि माँसाहारी जीव हैं । ये सब अपने नियम पर चल रहे हैं । कोई शेर किसी की गोभी लेकर भाग गया हो.... मैंने नहीं देखा । कोई कुत्ता किसी के आलू खा रहा हो.... मैंने नहीं देखा। ये नियम पर हैं। वनस्पति जगत इनका विषय नहीं है । मैंने 60 साल में नहीं देखा कि कोई बंदर किसी पक्षी को खा रहा हो । कभी नहीं देखा है कि कोई भैंस किसी मुर्गी को खा रही हो । आपने भी नहीं देखा होगा। वो शिष्ट हैं। फिर इंसान अपने नियमों से बाहर क्यों जा रहा है ! इसके नाख़ून भी चौड़े हैं, ज़हर भी नहीं है इसमें । क्यों अपने नियम पर नहीं चल रहा है!
माँसाहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जान ॥
ठीक ही तो कहा। अब वैज्ञानिक अपराध इसलिए कहा कि इंसान का पाचन-तंत्र ऐसा