करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ें....तो चोरी भी बहुत बड़ा पाप है। पाप कर्मों से है रहता जिसका मन मलीन,
उसको सपने में भी परमात्म नजर आता नहीं ।।
इसलिए आपसे पाप छुड़वाए। यदि एक समय की रोटी मिले तो उसी में संतुष्ट रहना, पर धर्म न छोड़ना । साहिब खुद देख लेगा। आपके साथ दिव्य शक्तियाँ काम कर रही हैं ।
खेलना हो तो खेलिये, पक्का होके खेल।।
चरित्रवान् रहना मुझे चरित्रवान् बड़े प्रिय हैं। महाराजा दिलीप सिंह राम जी की पीढ़ी के थे। एक दिन वे कहीं जा रहे थे। बड़ी तेज धूप थी.... परेशान हुए । उनके सारथी ने प्रकृति से कहा कि ये रघुवंश के प्रतापी राजा हैं, हवा चलाओ, इन्हें गर्मी लग रही है। हवा नहीं चली। फिर उसने कहा कि ये बड़े ज्ञानवान हैं, छाया करो। पर नहीं हुई छाया । फिर सारथी ने कहा कि इन्होंने बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी हैं, छाया करो। पर नहीं हुई। फिर कहा कि इनके पुरखे बड़े प्रतापी हैं, छाया करो। पर नहीं हुई छाया । फिर कहा कि ये बड़े चरित्रवान् हैं। बस, ऐसा कहा तो बादल भी आ गये और हवा भी चलने लगी। आप अपनी स्त्री से जितना चाहे प्रेम करना, पर दूसरी स्त्री को माँ, बहन, बेटी समान मानना । बालब्रह्मचारी होना तो और भी अच्छी बात है, पर आपके लिए यह नियम नहीं बनाया है । केवल दूसरी स्त्री की तरफ नहीं जाना है आपको। जिसमें चरित्र नहीं है, सत्य भी नहीं होगा । सत्य नहीं है तो चरित्र भी नहीं होगा। जैसे तपश और रोशनी एक-दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते, इसी तरह सत्यता और चरित्रता भी एक-दूसरे के पूर्वक हैं । जुआ न खेलना जुए के कारण देखो पाण्डवों का क्या हाल हो गया ! इसलिए जुआ भी मना किया।