भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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शीतल होय।' आपका कोई बैरी नहीं है । सिर्फ अहंकार को ठीक कर लो।

नियमों पर चलने से वैसे ही आत्म-शक्ति बढ़ जायेगी, चेतन हो जायेगी आत्मा । आत्मा में बड़ी शक्तियाँ हैं, पर पाप कर्मों के कारण मनुष्य में ये शक्तियाँ कम हो गयीं। पहले मनुष्य इच्छा करता था तो वर्षा हो जाती थी; इच्छा करता था तो सूर्य निकल आता था । लोग सत्य बोलते थे, पाप नहीं करते थे, इसलिए ये आत्म-शक्तियाँ जाग्रत थीं । भक्ति करने से पहले आपको एक अच्छा इंसान बनना है । जो भक्ति भी कर रहा है और गंदे काम भी कर रहा है, वो कोई भक्त नहीं है । जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं, ऐसे ही पाप-कर्मों के आवरण से आत्मा ढक गयी है । उसका बोध नहीं हो पा रहा है । पाप आत्मा परमात्मा के बीच में आवरण है । यह आवरण हट जाए तो वो दूर नहीं है । 'जहँ जाना तहँ निकट है ..........।।' अगर आदमी किसी को कष्ट नहीं दे तो समाज कैसा हो जायेगा ! कष्ट तीन तरह से दिया जाता है - कर्म से, बचन से, मन से । किसी को मारा तो कष्ट दिया। हमारी संस्कृति कह रही है कि यह आत्मा सब जीवों में एक है; किसी को कष्ट मत दो। यह अपराध है । कुछ लोग किसी को कष्ट नहीं देना चाहते हैं । ध्यान रहे कि आपसे किसी को कष्ट न मिले। जैसा व्यवहार आप अपने प्रति नहीं चाहते हैं, वैसा दूसरों के प्रति भी मत करो। आप नहीं चाहते हैं कि कोई आपको गाली दे, तो किसी को गाली दो भी नहीं। किसी पर गुस्सा करते हो तो उसे पीड़ा देने के लिए गाली देने लग जाते हो । एक आदमी था; उसने क्रोध में कुत्ते को लाठी मारी। वो लंगड़ाकर चलता था। उसने क्रोध को नहीं किया। यह था क्रोध । अब वो जीवन - भर परेशान रहा। किसी को कष्ट मत दो। सबमें एक आत्मा ही है। एक मूल अवस्था है हमारी, एक मूल सुरति है । यह, चाहो नींद में जाओ, तो भी रहती है, चाहो सुषुप्ति में जाओ, तो भी रहती है, चाहे सत्लोक में जाओ, तो भी रहती है। अगर यह मूल अवस्था नहीं होती, मूल सुरति नहीं होती तो हम सत्लोक से आकर कैसे बताते कि एक सत्लोक भी है, परम- पुरुष भी है। इसका मतलब है कि कुछ बाकी रहता है। जैसे दूध का मूल रूप रहता है, ख़त्म नहीं होता । चाहे उसका दही बना दो, चाहे पनीर, पर उनमें भी