करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूध का मूल रूप नष्ट नहीं होता; एक स्वाद रहता है । वो कभी समाप्त नहीं होता । आप किसी भी शरीर में जाओ, मूल सुरति ख़त्म नहीं होती है । चाहे कुछ भी हो जाए, नहीं होती है । यह मूल सुरति, यह बेसिक कॉन्शियस ही आत्मा है। हालांकि इसमें मन मिल गया । चाहे पानी में खटाई डाली । खट्टा हुआ, पर मूल स्वाद ख़त्म नहीं हुआ । एक महात्मा सबमें मूल सुरति को देखता है । यह मूल सुरति सभी जीवों में भी है। यही परम-पुरुष का कण है; यही उसका अंश है। सबके अंदर छः शरीर भी हैं । वे निराले हैं। सभी शरीरों का स्वभाव है, तासीर है। जैसे आपके पास बड़े सूट हैं। एक सूट है, जो आप गर्मी में पहनते हैं, एक है जो आप सर्दी में पहनते हैं, एक है, जिसे आप बहुत सर्दी होने पर निकालते हैं। इस तरह सात सुरति हैं, जिनमें मूल सुरति प्रमुख है। यह रानी सुरत है। यह मूल सुरति सबमें है। चाहे चींटी है, उसमें भी मूल सुरति है । उसके नन्हें रूप को देखकर भ्रमित नहीं होना । धरती पर ऐसे भी जीव हैं, जिनकी उम्र मात्र 3 घण्टे है । वे भी जवान होते हैं, शादी करते हैं, बच्चे होते हैं, बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं। उनके पास भी मूल सुरति है । मैं एक बगीचे में लड्डू खा रहा था। बचपन से ही मैं एकांतप्रिय रहा हूँ; कभी मिट्टी भी नहीं खाई। बच्चों से बड़ा डरता था, उनसे दूर ही रहता था; उनकी हरकतें बेवक़ूफ़ों वाली लगती थीं। बड़ा गंभीर था । एक पहाड़ था; मैं वहाँ चला जाता था एकांत में। तो मैं बगीचे में लड्डू खा रहा था; एक टुकड़ा उसका नीचे गिर पड़ा। एक चींटी आई; उसने देखा, हिलाना चाहा, पर नहीं हिला। वो चली गयी। मैं जानता था कि चींटी बड़ी हिम्मती होती है । मैं भी उसके पीछे-पीछे गया, सोचा, देखता हूँ कि कहाँ जाती है, क्या करती है। वो कुछ दूर तक गयी; उसे 1-2 मिनट लग गये वहाँ तक जाने में। वहाँ एक बिल था; वो उसमें चली गयी। 20-25 सैकेंड बाद वो बाहर आई तो बड़ी स्पीड में पीछे-पीछे कई चींटियाँ उसके साथ आ गयीं। वो स्पीड में उन्हें लेकर वहाँ पहुँची। सबने मिलकर उसे उठाया। उनका कॉन्शियस कैसा था ! उठाने की उनकी टाइमिंग भी बड़ी प्यारी थी । उनके लिए वो पहाड़ से कम नहीं था। कुछ की टाँगें सिकुड़ गयीं तो फिर पोजीशन चेंज की और घसीटते - घसीटते