भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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जो भी खाना हो, खिला दूँगा । वहाँ एक बात होती है कि पार्टी करवानी पड़ती है । आपपर मुसीबत आए तो आप कमज़ोर पड़ जाते हैं। पक्के रहें । तो वो खाते भी राक्षस की तरह हैं। मैं मीट, शराब की पार्टी नहीं दे रहा था। कुछ शांति में अशांति का सृजन कर देते हैं और कुछ अशांति में भी शांति ढूँढ़ लाते हैं। मैंने बड़ा कहा कि कुछ भी खाओ, खिला दूँगा, पर यह नहीं । वो नहीं माने। मैंने भी नहीं खिलाया। वैसे 10-15 दिन के अंदर ही करवानी होती है। वे बड़े लोगों के हवाले देने लगे कि वो भी नहीं खाता था, उसने भी करवाई..... उसने भी करवाई। पर मैं अड़ गया कि नहीं दूँगा यह सब । कुछ उत्तेजित करने के लिए कहने लगे कि कंजूस है। मैंने कहा कि 7 हज़ार की पार्टी करवा रहा हूँ। वो नहीं माने। समय निकलता गया । 6 महीने निकल गये; मैंने नहीं करवाई पार्टी । बाद में कहा कि दो । मैंने कहा कि अच्छा, जिस दिन मुर्गे वाला दिन होगा, उस दिन चबा लेना हड्डी। वो नहीं माने। कहा कि किसी दूसरे दिन । मैंने आख़िर कहा कि अच्छा, दारू पी लो; सोचा कि पीकर नाली में ही गिरेंगे, पाप तो नहीं होगा, जीव हत्या तो नहीं होगी। अंत में तय हुआ कि पैसे दे दिये जाएँ, वो जो करना है, कर लें। शाम को छः बजे एक लड़का 5-7 मुर्गे लाया। टाँगें पकड़ा हुआ, धड़ नीचे की ओर । वो चिल्ला रहे थे, कां - कां कर रहे थे । मैं रात को लेटा तो 12 बजे सभी मुर्गे मेरे सामने आए, इंसान की भाषा में कहा कि इंसाफ करो। मैं जो कह रहा हूँ, सच्चाई है। कहा कि आप जिम्मेदार हैं। वो दो डिमाण्ड रखे, कहा—या तो हमें मानव-तन दो या फिर मुक्ति। मुझे उनमें से एक बात माननी पड़ी उनकी । मैं साँप मारना भी मना करता हूँ । राँजड़ी से 100-150 साँप निकाले हैं। कंडी एरिया है; बड़े साँप निकल आते हैं। एक दिन शाम के समय नाली में साँप लेटा हुआ था । आधा नाली में था, आधा बाहर । जैसे गर्मी - सर्दी आपको लगती है, उसे भी लगती है। गर्मी लगे तो आप पंखे के नीचे आ जाते हैं । वो नाली में बैठ गया था। किसी ने कहा कि वहाँ साँप है । मैंने सबको वहाँ से भगा दिया। एक लड़के को कहा कि लंबा बाँस लाओ । 5-6 उछाल दी ; तब जाकर वो ढीला पड़ा। मारा नहीं; चोट भी नहीं पहुँचाई; कहा कि बोरे में डालकर दूर फेंक आओ। ऐसे 100-150 अकेले राँजड़ी से निकाले हैं। जो भी शरीरधारी है, अपने शरीर से प्रेम कर रहा है। किसी भी जीव को न मारो। जीभ के स्वाद

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