करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंभव नहीं, क्योंकि हमने उसे नहीं देखा । अत: हमें सब संशय छोड़कर गुरु
ही भक्ति, गुरु का ही ध्यान करना चाहिए।
देवी देवल जगत में, कोटिन पूजत कोय।
सतगुरु की पूजा किये, सबकी पूजा होय।।
सद्गुरु की पूजा करने से पूरे ब्रह्माण्ड की पूजा हो जाती है। वास्त गुरु परमात्मा का प्रतिनिध है । धर्म - शास्त्रों में बड़ा सुन्दर कहा है-
ध्यान मूलम् गुरु रूपम्, पूजा मूलम् गुरु पादकम् ।
मंत्र मूलम् गुरु वाक्यम्, मोक्ष मूलम् गुरु कृपा।।
परमात्मा का ध्यान करने को नहीं कह रहे हैं। गुरु क ध्यान करने को कह रहे हैं । कह रहे हैं कि गुरु के ध्यान से बढ़कर कोई ध्यान नहीं है, गुरु की पूजा से बढ़कर कोई पूजा नहीं है, गुरु वाक्य से बढ़कर कोई मंत्र नहीं है और फिर गुरु की कृपा से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है । कितनी बड़ी बात हमारे धर्म-शास्त्र कह रहे हैं ! परमात्मा की कृपा की बात नहीं कर रहे, गुरु की कृपा को महत्व दे रहे हैं। संतों की तो बात ही निराली है । हरि कृपा जो होय तो, नहीं होय तो नाहिं |
कहैं कबीर गुरु कृपा बिन, सकल बुद्धि बह जाहिं ।।
गुरु की कृपा बड़ी ज़रूरी है । ऐसा क्यों ? जैसे समुद्र है। उसका पानी खारा है । उसका जल पीने के लायक नहीं। पर जब वही जल बाष्पीकृत होकर बादलों द्वारा नीचे आता है तो सबके लिए हितकारी बन जाता है । वही जल मीठा हो जाता है । वही जल खेतों के लिए उपयोगी है । जल तो उसी समुद्र का है, पर अन्तर केवल इतना है कि जब बादलों द्वारा नीचे आता है तो बड़ा हितकारी बन जाता है। समुद्र का जल वैसे एक तो हितकारी नहीं, पर दूसरों तक अपना जल पहुँचाने में भी समुद्र सक्षम नहीं। इस तरह एक चंदन का पेड़ है । उसकी बड़ी महक है, पर वो स्वयं अपनी महक को दूसरों तक पहुँचाने में सक्षम नहीं है। समीर (वायु) उसकी महक को अपने में समेटती है और दूर-दूर तक ले जाती है । ठीक इसी तरह गुरु और परमात्मा का अन्तर है । जैसे बादल द्वारा जो जल आया, वो समुद्र के जल का संशोधित रूप था, इसी तरह गुरु परमात्मा का