करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुमिरन करना है। यदि सुमिरन नहीं चल रहा है तो समझो कि मन ने भटका दिया है। यह सुमिरन मन को बाँधने के लिए है।
सुमिरन मन की रीत है, भावे जहाँ लगाय ।
भावे गुरु की भक्ति कर, भावे विषय कमाय ॥
यह फ्री नहीं रह सकेगा । जैसे आँख खुली है तो कुछ-न-कुछ दिखेगा। ऐसे ही मन कहीं-न-कहीं लगेगा । इसलिए-
चिंता तो गुरु नाम की, और न चितवे दास।
जो कछु चितवे नाम बिनु, सोई काल को फाँस ॥
3. ध्यान-भजन में बैठे हुए हिलना-डुलना नहीं है।
4. मन पर नज़र रखनी है। मन की कोशिश होगी कि किसी तरह से आपकी
सुरति को घुमाकर ले जाए। क्योंकि वो जानता है कि एकाग्र होने पर आत्मा
अपने को जान लेगी और तब मेरी बात नहीं मानेगी । मन कोई भेड़, बकरी
नहीं है जो नज़र रखो। इसके चार रूप हैं । जब यह इच्छा करता है तो इसे मन
कहते हैं। यदि कोई भी इच्छा हुई तो समझो कि यह मन है। मन उन्हीं
इच्छाओं में घुमा देगा। मन ने इच्छा की तो आपकी सुरति घूमने लगी । बड़ी
चालाकी से घुमाता है। मान लो, मन ने इच्छा की कि घर बनाना है। अब वहीं
घुमाता रहेगा। मिस्त्री, बट्टे, सीमेंट में ही घूमते रहोगे । अब ध्यान में बैठने का
क्या लाभ! यह काम मन का है । यदि इच्छा को कण्ट्रोल कर लो तो मन
का दूसरा रूप सामने आता है । फिर मन कुछ पुरानी बातें याद दिलाने लगेगा।
किसी ने आपको गाली दी थी तो वहीं ले जायेगा । 10 साल पहले किसी ने
आपको कुछ कहा था तो वहाँ ले जाकर पटक देगा। आप सोचने लग जायेंगे ।
मनवा तो दस दिस फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं ॥
यह नज़र गहरी रखनी पड़ेगी। इससे यह लाभ होगा कि पता चल जायेगा कि यह मन किस तरह से भ्रमित कर रहा है ।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
कहैं कबीर गुरु पाइये, मन ही की परतीत ॥
मन से हमेशा सावधान रहना । अगर चित्त को रोक दोगे तो फैसला लेने लगेगा। यह मन का तीसरा रूप बुद्धि है । मन चाहता है कि आप किसी भी तरह से अपने आप को न जानें। यदि आपने अपनी आत्मा को जान लिया तो