करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंक्योंकि पहले मैं लेटे - 2 भी ध्यान - भजन के लिए बोल देता था । पर अब नहीं बोलता हूँ । यह तो मैंने उनके लिए कहा कि जो बैठकर न कर सकें । पर जवान आदमी को तो बैठकर करना चाहिए । तो यह शौक से होना चाहिए । बैठने की फार्मेलिटी नहीं हो । जब भी ध्यान में बैठें तो कोई हरकत न हो। अगर हरकत हो रही है तो वो ध्यान नहीं है फिर । साहिब ने सरल शब्दों में कहा - मन की तरंग मार लो, हो गया भजन.... । इसलिए ध्यान - सूत्र का दूसरा सिद्धांत है कि मन एकाग्र रहे। आपकी सोच होगी कि इसे वश में कैसे करें ! मन के चार रूप हैं - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का निग्रह ही ध्यान है; क्योंकि इनके बाद जो बचा, वही आत्मा है। मन की तरंग मार लो हो गया भजन....... कोई भी इच्छा नहीं करना, इच्छा मन का रूप है। इसलिए दूसरा काम यह हो। यह मन इच्छाओं में घुमाना चाहेगा, पर नहीं करना । कभी कहेगा कि बच्चों को इस स्कूल में ले जाना है, कभी कहेगा कि उसके पास जाना है, कभी कहेगा कि कुछ खा लेते हैं, कभी इच्छा होगी कि कुछ और काम कर लेते हैं । ध्यान में बैठे हुए किसी इच्छा पर चिंतन नहीं करना । तीसरा कोई भी निर्णय नहीं लेना। इच्छा होती है तो आप उसपर कुछ निर्णय लेने लगते हैं। नहीं लेना । कोई फैसला करना ही नहीं है, चाहे कितना भी कहे मन । गुरु को समर्पित होना भी यही है। फिर चौथा कुछ भी याद नहीं करना । यह मन बहुत कुछ याद करायेगा। यह चित का काम है । इस चित को पकड़ना । कुछ याद नहीं करना, गुरु के अलावा। बस, आप गुरु को समर्पित हो रहे हैं । यह गुरु की तोहीन समझो कि उनके अलावा कुछ और याद आ रहा है। फिर पाँचवाँ कोई क्रिया नहीं करना। हिल-डुल नहीं हो । कभी टाँगें कहेंगी कि थक गयी हैं, कभी शरीर कहेगा कि आराम कर लेते हैं । नहीं मानना । इच्छा पर नियंत्रण करो तो बुद्धि आ जाती है। बुद्धि पर नियंत्रण करो तो चित्त आ जाता है । कहीं किसी का चेहरा सामने आ जाता है; उसकी आकृति दिखने लगती है । उसने कहीं 2 महीने पहले आपको गाली दी, वो याद आने लगता है, क्रोध उत्पन्न होने लगता है, बुद्धि प्लैनिंग करने लगती है